उड़ता गाजीपुर
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मेरे शुभ चिन्तक व बड़े भाई जैसा सुधीर कुमार जी के साथ आज रात करीब 12.30 बजे बनारस कैंट पर चाय पी रहा था। सुधीर जी बनारस हिन्दुस्तान टाइम्स के ब्यूरो चीफ हैं। वे मुझे अपने साथ बरेली घुमाने को कह रहे थे। मैंने धीरे से मुस्कुराकर हाँ में जवाब दे दिया। अब उन्हें कैसे बताऊँ कि मैं बनारस में रहता ही नहीं बनारस में जीता हूँ। एक तरह से समाहित हो चुका हूँ। जो समाहित है उसे कहीं ले जाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। पाठकगण मैंने यहाँ यह बातें क्यों लिखी आप भले न समझें पर मेरे अग्रज सुधीर जी समझ गये होंगे।
बचपन में एक खेल हम लोग खेला करते थे। इस खेल के लिए न बैट बाल की जरूरत थी न ही फ़ुटबाल की। स्टेडियम और ग्राउंड की भी जरूरत नहीं। बस चार मित्रों के साथ जहाँ बैठ गये वहीं खेल शुरू। चिड़िया उड़.... तोता उड़.... मैना उड़.... भैंस उड़.... भैंस जैसे ही उड़ाया की फंस गये। सजा के तौर पर सभी मित्रों के हाथों मार खानी पड़ती। आज उल्टा है। चाहे जितनी भैंस उड़ा लो कोई सजा नहीं। हाँ रामपुर की भैंस मत उड़ाना। भैंस तो क्या मुर्गी भी नहीं। अनुराग कश्यप ने तो पूरा पंजाब ही उड़ा दिया। सेंसर बोर्ड समझा रहा है कि भाई पंजाब के पंख नहीं है कि उड़ेगा। अब पूरा बालीबुड एकजुट। पंजाब उड़ेगा। वह भी तय समय 17 जून को। इस उड़ने उड़ाने के खेल में दिल्ली के मुख्यमंत्री भी कूद पड़े हैं। पंजाब के पास नशे का पंख है। पंजाब नशे में उड़ रहा है। यह मैं नहीं अनुराग कश्यप कह रहे हैं।
बचपन में एक खेल हम लोग खेला करते थे। इस खेल के लिए न बैट बाल की जरूरत थी न ही फ़ुटबाल की। स्टेडियम और ग्राउंड की भी जरूरत नहीं। बस चार मित्रों के साथ जहाँ बैठ गये वहीं खेल शुरू। चिड़िया उड़.... तोता उड़.... मैना उड़.... भैंस उड़.... भैंस जैसे ही उड़ाया की फंस गये। सजा के तौर पर सभी मित्रों के हाथों मार खानी पड़ती। आज उल्टा है। चाहे जितनी भैंस उड़ा लो कोई सजा नहीं। हाँ रामपुर की भैंस मत उड़ाना। भैंस तो क्या मुर्गी भी नहीं। अनुराग कश्यप ने तो पूरा पंजाब ही उड़ा दिया। सेंसर बोर्ड समझा रहा है कि भाई पंजाब के पंख नहीं है कि उड़ेगा। अब पूरा बालीबुड एकजुट। पंजाब उड़ेगा। वह भी तय समय 17 जून को। इस उड़ने उड़ाने के खेल में दिल्ली के मुख्यमंत्री भी कूद पड़े हैं। पंजाब के पास नशे का पंख है। पंजाब नशे में उड़ रहा है। यह मैं नहीं अनुराग कश्यप कह रहे हैं।
उड़ता पंजाब के बाद अनुराग कश्यप को उड़ता दादरी, उड़ता मुजफ्फरनगर और उड़ता मथुरा का जवाहर बाग़ पर भी एक फिल्म बनाना चाहिए। अगर गलती से किसी ने मेरी सलाह मानकर यह फिल्म बना भी डाली तो क्या केजरीवाल उसे रिलीज कराने के लिए उतना ही समर्थन करेंगे जितना कि उड़ता पंजाब के लिए हाथ पाँव मार रहे हैं।
60 के दशक का एक गीत- चल उड़ जा रे पंक्षी की अब ये देश हुआ वीराना.. यह देश वीरान हो चुका है इमानदारी से... यह देश वीरान हो चुका है वफादारों से... यह देश वीरान वीरों से। कोई कांग्रेस मुक्त भारत की बात कर रहा है तो कोई आरएसएस और भाजपा मुक्त भारत की बात कर रहा। भ्रष्टाचार मुक्त और गरीबी मुक्त भारत की बात करने वाला कोई नहीं। क्या फिल्म बनाने के लिए यह एक विषय नहीं हो सकता। यह सीधा और सपाट सा विषय है। बालीबुड को विवादित विषय चाहिए। अगर इसी तरह का विषय चाहिए तो यूपी के गाजीपुर में अनुराग कश्यप जैसे लोगों का स्वागत है। गाजीपुर उड़ रहा। सत्ता के नशें में उड़ रहा है। झूठ के पंखों से उड़ रहा है। इसे उड़ा रहे हैं यहाँ के जनप्रतिनिधि। इसे उड़ा रहें हैं कुछ तथाकथित समाजसेवी।
60 के दशक का एक गीत- चल उड़ जा रे पंक्षी की अब ये देश हुआ वीराना.. यह देश वीरान हो चुका है इमानदारी से... यह देश वीरान हो चुका है वफादारों से... यह देश वीरान वीरों से। कोई कांग्रेस मुक्त भारत की बात कर रहा है तो कोई आरएसएस और भाजपा मुक्त भारत की बात कर रहा। भ्रष्टाचार मुक्त और गरीबी मुक्त भारत की बात करने वाला कोई नहीं। क्या फिल्म बनाने के लिए यह एक विषय नहीं हो सकता। यह सीधा और सपाट सा विषय है। बालीबुड को विवादित विषय चाहिए। अगर इसी तरह का विषय चाहिए तो यूपी के गाजीपुर में अनुराग कश्यप जैसे लोगों का स्वागत है। गाजीपुर उड़ रहा। सत्ता के नशें में उड़ रहा है। झूठ के पंखों से उड़ रहा है। इसे उड़ा रहे हैं यहाँ के जनप्रतिनिधि। इसे उड़ा रहें हैं कुछ तथाकथित समाजसेवी।
पंजाब से ज्यादा तबाह है गाजीपुर। यहाँ के कितने युवाओं को नौकरी मिली? कितनी सड़कें चमचमा रही है? किसका विकास हुआ? कितना विकास हुआ? अब यहाँ पंजाब और गाजीपुर के दो विपरीत सिरों को यहाँ जोड़ने की सिर्फ कोशिश भर नहीं है। यह एक प्रश्न है उनसे जिसने यूपी के साथ गाजीपुर का चमका दिया? यह प्रश्न है उनसे जो रोज नारे गढ़ रहे हैं। वादे हुए पूरे...। जब भयावह, कांटेदार, बदसूरत काला पंजा यहाँ के युवाओं के कैरियर को बर्बाद करता चला जा रहा है। टूटी-फूटी सड़कें खूनी हो चुकी है। फिर भी कोई आहट नहीं है... सन्नाटा नहीं टूट रहा। इस सन्नाटे को तोड़ने के लिए उड़ता गाजीपुर को कोई पर्दे पर लाएगा? कोई कहेगा यह लेख असीम उलझाव से एक धारदार मुठभेड़ है, पर इस मुठभेड़ की पहचान के लिए हम एक दूसरे क्षेत्र में जाना चाहेंगे। अश्वेत लेखिका टोनी मारियन ने अपने उपन्यास "बिलवेड" में लिखा है कि जहाँ शिक्षा का अभाव है... जहाँ के लोग जागरूक नहीं हैं सिर्फ नारों से प्रभावित होकर वहां की जनता सरकारें बना देती है... और राजनितिक पार्टियाँ सत्ता में आने के बाद खुद को मजबूत करती है। जनता के हिस्से टूटी-फूटी सड़कें और बेरोजगारी भत्ता। यहाँ रोजगार के लिए नहीं भत्ता के लिए सरकारें बनती है। यहाँ कोई अनुराग कश्यप भी नहीं आयेंगे। दिल्ली, बिहार, यूपी और गाजीपुर को न उड़ाने के लिए उन्हें भत्ता मिलता है... और पंजाब को उड़ाने के लिए भत्ता मिलता है।
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर
इस लेख को पांच जुलाई 2016 तक कुल लोगों ने पढी पढी। कमेंट किसी का नहीं आया।
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