Thursday, 27 October 2016

मैं अभी ज़िंदा हूँ
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लेखक और साहित्यकार
सरगना होता है
पुरस्कार वापसी का
बेइमान बन जाता है
झूठी आलोचना कर
कुख्यात हो जाता है
सत्य से मुंह मोड़कर
दलाल भी बन जाता है
सत्ता से चिपककर।
एक अपराधी के सभी गुण।
सही लेखक तो वह होता है
जो पसीने से अच्छर को
गढ़ता और बनाता है।
हथोड़े से शब्दों को
एक नया आकार देता है।
हर वाक्य होते हैं
खेतों की पगदंडी और मेढ़।
लेखक तो मजदूर होता है।
किसान होता है।
उसे सरकारें पुरस्कार नहीं देंती
सिर्फ परोपकार करतीं हैं।
फिर भी मर जाता है भूख से
मैं अभी ज़िंदा हूँ।
कुछ चोट खाने के लिए
कुछ चोट देने के लिए।।


अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर



मैं क्या हूँ...
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झूठ की दीवार ही नहीं
झूठ का महल होता है।
सच तो महल के सामने
चाय बेचता मिल जाएगा।
महल के गेट पर पहरेदार
और भीतर पालतू कुत्ते
दिन रात ड्यूटी में मुस्तैद
 सच अंदर जाने न पाए।
अगर इजाजत है तो
सिर्फ झूठ को
बेइमान है तो भी चलेगा
रोक है तो सिर्फ इमानदार को
सत्य कहना पिछडापन है।
वरना अपनी कुर्सी खो जाने
के डर से अफसर और मंत्री
कबूतर की आवाज में
कभी गुटर- गू नहीं करता।
एक झूठ है-दूसरा सच है
तो आखिर मैं क्या हूँ?
लो जान लो तुम भी
डंके की चोट पर बता देता हूँ।
मैं तो नियत का कुल्हड़ हूँ
चाय कोई पीये, टूटना मुझे ही है।


अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर


Monday, 11 July 2016

मेरा सुहवल: सूत पुत्र *****5 जुलाई की रात काम ख़त्म करने के बा...

मेरा सुहवल: सूत पुत्र *****
5 जुलाई की रात काम ख़त्म करने के बा...
: सूत पुत्र  ***** 5 जुलाई की रात काम ख़त्म करने के बाद नई सड़क जा रहा था। वहां इसलिए कि ईद से एक दिन पहले पूरी रात मार्केट खुली रहती है। ल...

Sunday, 10 July 2016

सूत पुत्र 

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5 जुलाई की रात काम ख़त्म करने के बाद नई सड़क जा रहा था। वहां इसलिए कि ईद से एक दिन पहले पूरी रात मार्केट खुली रहती है। लोग ईद की खरीदारी करते हैं। लोग कहते हैं कि आज के दिन सभी सामान बहुत कम रेट पर उपलब्ध रहता है। आज के दिन का बहुत से हिन्दू भाइयों को भी इन्तजार रहता है।
ऑफिस से आगे बढ़ते ही लहुरावीर के पास गोरखपुर के साथी इंद्रभूषण दुबे जी मिल गये। उन्होंने अपनी गाडी एक होटल के सामने खड़ी कर दी। हम दोनों एक ही बाइक पर हो गये। भीड़ तो लहुरावीर से ही शुरू हो गई थी। हम लोग नई सडक पहुंचे जरुर पर अब वहां से निकलना मुश्किल हो गया। जाम की स्थिति बन गई थी। सडक की पटरियों पर ही पूरा बाजार। एक दुकान से दाम पूछकर दूसरे दुकान की ओर भागते लोग। जहाँ सबसे सस्ता सामान मिला वहां खरीदारी कर ली। दुबे जी ने कहा, इस बाजार में दिख रहे सभी लोग लोग भारत माँ के सूत पुत्र हैं। इस देश की सरकारों के सूत पुत्र हैं। बाजार में खरीदारी करने वाले सभी कामगार वर्ग से लग रहे थे। सातवाँ वेतन आयोग वाले कर्मचारी या व्यापारी वर्ग के लोग तो माल या शो रूम में दिन में ही ईद की खरीदारी कर लिए होंगे। अब रात में चैन की नींद सो रहे होंगे। इस लेख को पढकर कोई पाठक यह न समझे कि लेखक किसी आयोग का विरोध कर रहा है। सूत पुञों को भी पुञ का दर्जा मिला इसका समर्थन जरूर कर रहा हूं।
आज की सरकारें महाभारत की कुंती को अपना आदर्श मानती है। सूत पुत्रों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार क्यों। सातवाँ वेतन आयोग का लाभ पाने वाले कर्मचारी 20 से 40 हजार रूपये वेतन बढ़ने के बाद भी धरने पर जाने को कह रहे हैं। देश के सूतपुत्र प्राइवेट नौकरी-पेशा वाले और कामगार तो 500 से दो हजार रूपये बढ़ा हुआ वेतन पाकर भी खुश हैं। उन्हें पता है "कुंती" (सरकारें) उन्हें सूत पुत्र ही मानती आयी है।
वापस लौटने के बाद लहुरावीर के उस होटल के पास इंद्रभूषण जी दुबे जी को छोड़ दिया जहाँ उनकी गाड़ी खड़ी थी। वहां से मैं तेलियाबाग के रास्ते कैंट आया। जाम बहुत थी। ओवरब्रिज का निर्माण कार्य प्रगति पर होने के कारण कैंट -लहरतारा रोड पर अक्सर जाम की स्थिति बन जाती है। बाइक धीरे-धीरे आगे सरक रही थी। तभी एक शख्स ने लिफ्ट मांगी। एक हाथ में झोला व दूसरे में कुछ डब्बों में बंधे जूते और चप्पल। समझते देर न लगी कि खरीदारी कर वापस घर जा रहा है। मैं पूछ दिया, कहाँ जाना है। उसका जवाब था लोहता। तभी पीछे से एक बाइक वाला हार्न बजाया। जैसे ही मैं पीछे मुड़कर देखा उसने जोर से चिल्लाया, अरे भाई साहब आगे बढिए। हम लोग जाम में फंसे हैं और आप आराम से बातें कर रहे हैं। अब मैं किनारे हो गया।। पीछे वाला व्यक्ति मुझे कोसते हुए आगे निकल गया। लिफ्ट मांगने वाले शख्स से मैंने कहा, बौलिया तक आपको ले जा सकता हूँ। थैंक्स भाई कहते हुए बाइक पर बैठ गये।
अब में जाम के बीच धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा। बाइक पर पीछे बैठने वाला युवक खुद ही अपने बारे में बताने लगा। नाम राहुल पटेल। वह किसी प्राइवेट कंपनी में काम करता है। वैसे तो ईद मुस्लिम का त्योहार है। वह खदीदारी करने इसलिए गया गया था ईद के एक दिन पहले रात में लगने वाले हाट में सामान सस्ता मिल जाता है। इस दिन का राहुल पटेल जैसे हजरों को इंतजार रहता है। उसकी बातें ठीक से न सुन पाने के कारण अब मैनें अपना हेलमेट उतार कर बाइक की हैंडिल में लटका लिया। राहुल बोले जा रहा था--- सरकार ने बैंकों में खाता तो खोलवा दिया अब क्या कर्ज लेकर बैंक में पैसा जमा करें? सरकारी कर्मचारियों के लिए वेतन आयोग। व्यापारियों के लिए निति व कानून। कर्ज में दबे हर साल सैकड़ों किसान आत्महत्या करते हैं। इनके लिए सरकारें क्या कर रही है। सफाई देने वाले कहेंगे किसानों के लिए सरकर बहुत कुछ कर रही है। अगर करती तो आत्म हत्या क्यों करते। कोई सरकारी कर्मचारी, व व्यवसायी आत्महत्या क्यों नहीं करते? राजनितिक पार्टियाँ कहतीं हैं सबका साथ सबका विकास। जब सरकार में आतीं हैं तो हमें भूल जाती हैं। हम सूत पुत्र जो ठहरे। मुझे लगा वाकई सरकारें न पहले इमानदार थी न अब है।
घर पहुंचा तो चिंतन में डूब गया। एक ओर विदेशी नश्ल के कुत्ते हैं जिन्हें आम आदमी से भी बेहतरीन जिन्दगी नसीब है। दूसरी और सडक के वे कुत्ते हैं जिन्हें मार देने का ख्याल लगभग हर खाते-पीते नागरिक, नगर पालिका और हर नगर निगम को आता है। कई बार रात की भयानक ठण्ड में कुत्ते बार - बार भौंकते हैं। ये शायद कहना चाहते हैं कि हे मनुष्यों, हो सके तो हमें मरने से बचा लो लेकिन उनकी सुनता कौन है? वे भौंकते-रोते रात काट देते हैं या नहीं काट पाते तो मर जाते हैं। ठीक यही जिन्दगी सूत पुत्रों की है। ये पहले सरकार को फिर समाज को कोसते हैं। जब इनकी कहीं नहीं सुनीं जाती तो खुद को कोसते हैं। यैसे करते-करते इनकी भी मौत हो जाती है। ये रोज मरते हैं और रोज पैदा होते हैं। ये आज की कुंती (सरकार) के सूत पुत्र जो हैं।
कैंट स्टेशन से बौलिया तक मेरे साथ सफर करने वाले राहुल पटेल का व्यक्तित्व क्या है यह तो मैं नहीं जानता पर उनके साथ अंतिम संवाद किसी दर्शन से कम नहीं। महाभारत के कर्ण की भाति जब जीवन के रंगमंच पर हमारी भूमिका क्या होनी चाहिए यह तय नहीं कर पाते तो महाभारत में अपनों के खिलाफ ही जंग-ए-मैदान में उतर जाते हैं। हमें नहीं पता होता कि जिसके खिलाफ मुझे लड़ाया जा रहा है वह अपना ही है। यह याद भी कुंती ही दिलाती हैं लेकिन अंत में मारा जाता है सूतपुत्र। त्याग के बाद भी आज सूत पुत्र कर्ण की वीरता को कितने लोग याद करते हैं। सभी अर्जुन को याद करते हैं। वीर अर्जुन। यही वर्तमान है और यही भविष्य। यह एक इमानदार स्वीकारोक्ति है। यह एक कडवा सत्य है। एक और सत्य से रूबरू करवाने के लिए आपको इतिहास की ओर ले चलते हैं।
यूरोपियन इतिहास में सबसे लम्बे समय तक शासन करने वाला लुइस चौदह था। 72 वर्ष से ज्यादा समय तक राजगद्दी सम्हाला। जनता उसे अविनाशी मानती थी। अब लुइस कमजोर हो चला था। ठीक से चल फिर भी नहीं पाता था। उसकी यह हालत देखकर जनता रोने लगी। लुइस चौदह ने कहा, क्यों रोते हो क्या तुम मुझे अविनाशी समझ बैठे थे। लुइस भी नहीं रहा, कुंती और सूत पुत्र कर्ण भी नहीं रहे। फिर आज की कुंती और अर्जुन को इतना अभिमान क्यों? क्या तुम अविनाशी हो? मैं तो नहीं क्योंकि सूत पुत्र जो हूँ।
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

Wednesday, 6 July 2016

इस पंजाब को क्या नाम दूँ

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वीरेंद्र श्रीवास्तव जी और मैं एक ही ऑफिस में साथ काम करते हैं। सयोग से हम दोनों एक ही गाँव सुहवल के रहने वाले हैं। ऐसा सौभाग्य कम ही लोगों को मिलता है। काम भी एक। ख़बरों को माजना। उनके साथ मित्रवत सम्बन्ध लेकिन बड़े भाई का दर्ज देता हूँ। आज बहुत ही सरल लहजे में उन्होंने मुझसे पूछ दिया। अजय जी आप साहित्य के किस मुकाम तक पहुंचना चाहते हैं। मेरा जवाब स्पष्ट था। मैं चाहे जिस मुकाम पर रहूँ पर ऐसा समय कभी न आये कि पुरस्कार लौटाने वालों की भीड़ में मुझे शामिल न होना पड़े। मेरी अपनी कोई पहचान न हो। मेरी पहचान मेरे पाठक हों। यही मेरा मुकाम हो। यही मेरी उपलब्धि हो। मुझे कोई साहित्य का मठ नहीं बनाना। अपना कोई कमाल नहीं दिखाना। किसी को मात भी नहीं देना। मुझे तो खुद से खुद को मात देना अच्छा लगता है। यहाँ मैं अपनी तारीफ़ नहीं आपको पढ़ा रहा हूँ। राजनीति से भी गंदी हो चुकी साहित्यकारों की दुनियां के प्लास्टर की एक परत नाख़ून से खुरचने भर का एक साहस भर किया है। कारण साहित्यकार के साथ एक पत्रकार भी हूँ।

बैसाख की पहली तिथि पंजाबी पंचांग के अनुसार नव वर्ष के रूप में मनाई जाती है। इसी दिन 13 अप्रैल, 1978 को जरनैल सिंह भिंडरा वाले ने पंजाब के रंग मंच पर पदार्पण किया। इससे पंजाब ही नहीं पूरा देश अशांत हो गया। उसने पंजाबियों को नफरत का पाठ पढ़ाया।
" धरम जावे ताँ जावे,
मेरी कुर्सी किथे ना जावे।"
उनके इरादे साफ़ थे। पंजाब में कुछ हिन्दुओं का कत्ल करो ताकि पंजाब से बाहर रहने वाले सिखों पर हिन्दुओं की हिंसा भड़के।

 पंजाब में भिंडरावाले का प्रभाव बढ़ता गया। खुलेआम क़त्ल और लूट हो रहे थे। भिंडरवाले को अकालियों का समर्थन था। बाद में कई अकाली नीली पगड़ी छोड़ सफ़ेद पगड़ी पहनने लगे। जनमानस में नीली पगड़ी के प्रति घृणा होने लगी। कई अकाली नेता खुलेआम कहा करते थे अब उन्हें पार्टी का बिल्ला पहनते हुए शर्म महसूस हो रही है। जिस तरह गांधी टोपी कभी इमानदारी और साधुता का प्रतीक मानकर साम्मानित होती थी आज भर्ष्टाचार का प्रतीक बन कर रह गई है। उसी तरह अकालियो का नीला रंग भी सम्मान खोता जा रहा था।
6 जून 2984 को अमृतसर में जो कुछ घटित हुआ वह 400 वर्षों में न कभी देखा गया न सुना गया। बन्दुक और टैकों की मदद से स्वर्ण मंदिर में खून खराबा किया गया। सरकार ने इसे आपरेशन ब्लू स्टार का नाम दिया। इससे खालिस्तान का विरोध करने वाले सिख भी भड़क गये। कारण यह उनके आस्था पर चोट था। इस घटना में औरत और बच्चे भी मारे गये थे।
एक हिन्दुस्तानी मुहावरा है। ज़रा सी गलती का फल सदियों भुगतना पड़ता है। अक्तूबर माह में कई त्यौहार पड़ते हैं। मानसून की बारिश ख़त्म हुई होती है। धान की फसल को काटने को कुछ ही दिन बचे होते हैं। दिवाली तक एक के बाद एक त्यौहार आते हैं। कार्यवाई से आहत हो सिखों ने दिए नहीं जलाए।इसी 31 अक्तूबर की सुबह 10 बजे इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गयी। यह भारत के लिए बहुत बड़ी क्षति थी। इससे भड़की हिंसा में हजारों सिख मार दिए गये। दुकाने लुट ली गई। इस घटना पर राजीव गांधी ने कहा था जब बड़ा पेड़ गिरता है तो कम्पन होता है।


 बुधवार 24 जुलाई 1985 को  प्रधानमंत्री राजीव गांधी और संत हरचंद सिंह लोगोंवाल के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए। यह देश की एकता और अखंडता के विजय का दिन था। राजीव ने राष्ट्रपति, गृह मंत्री बूटा सिंह और पंजाब के सीएम दरबारा सिंह से भी सलाह नहीं ली थी।
जनसामान्य के जीवन में एक समय आता है जब वह खुद को बीच चौराहे पर खड़ा पाता है।  जब उनका लिया हुआ एक गलत निर्णय विनाश के मार्ग पर ले जा सकता है। सिखों के लिए एक ऐसा मौक़ा 1887 में आया। बरनाला ने एक सभा बुलाई।

 जब सिखों को अखंड भारत की राह और खालिस्तान की राह में से किसी एक को चुनना था। उस सभा में सिखों ने खालिस्तान का विरोध किया। 1992 के बाद बसपा नेपंजाब में बसे गैर सिखों को भड़काना शुरू किया। अपनी राजनितिक जमीन तैयार करने के लिए अकालियो के खिलाफ मंचो से नारे लगवाये गये। बसपा कुछ जगहों पर इससे मजबूत जरुर हुई पर एक बार फिर से वहां तनाव की स्थिति पैदा हुई। बाद में जल्द ही लोगों ने जब बसपा की चाल को समझ लिया तो बसपा फिर से वहां करीब-करीब ख़त्म हो गई। उसी गैर पंजाबियो के सहारे आम आदमी पार्टी पंजाब में अपना पाँव पसार रही है। पंजाब के कट्टर पंथी सिख अकाली के साथ और बाकी के भाजपा और कांग्रेस में बंटे हुए है। गैर पंजाबी भी कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस को वोट देते रहे हैं। इंदिरा गांधी द्वारा स्वर्ण मंदिर में चलाये गये आपरेशन ब्लू स्टार के कारण कट्टर पंथी सिख आज भी कांग्रेस को पसंद नहीं करते।

 जलता पंजाब के बाद आज पूरा देश एकता और अखंडता के धागे में गुथा हुआ एक ऐसा पंजाब देख रहा है जो देश के लिए मरता है और जीता है।
25 फरवरी को दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल पंजाब दौरे पर थे। पंजाबियों व सिखों ने "गो बैक" का नारा दिया। सिखों का कहना था कि जेएनयू में भारत विरोधी नारे लगाने वालों का केजरीवाल ने समर्थन किया। यैसे लोगों को हम पंजाब में घुसने नहीं देंगे। आज 4 जुलाई को केजरीवाल फिर पंजाब के दौरे पर हैं। कलरकोटला में उन्होंने इफ्तार पार्टी रखी। आज भी इफ्तार पार्टी के दौरान ही केजरीवाल "गो बैक" और मुर्दाबाद के नारे लगे। लोगों का कहना था कि पवित्र कुरान शरीफ की बेअदबी के मामले में उनकी पार्टी के एक विधायक का नाम सामने आ रहा है। यैसे लोगों को पंजाब में घुसने नहीं देंगे। यह है आज का पंजाब। राज द्रोही और धर्म विद्रोही को नकारने वाला पंजाब। इस पंजाब से कश्मीर, यूपी सहित उस बिहार को भी सीख लेनी चाहिए जिसने कन्हैया जैसे कपूत को पैदा किया। यूपी के मुजफ्फरनगर और कैराना को भी आज के पंजाब से सीख लेनी चाहिए जहाँ एक दूसरे के धर्म का अपमान करते हैं। आज के पंजाब से कश्मीर के अलगाववादियों को सीख लेनी चाहिए जो बात-बात में भारत विरोध की बात करते हैं। यह है आज का पंजाब। अनुराग कश्यप जी अब आप ही बताएं कि इस पंजाब को क्या नाम दूँ?

अजय पाण्डेय

सुहवल, गाजीपुर

मेरी तो अपनी माँ है

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यात्रा वृतांत

एक मेरे कांग्रेसी मित्र हैं। वर्तमान में वे अमर उजाला में कार्यरत हैं। कांग्रेसी इसलिए कि कांग्रेस से वे एक बार विधानसभा का चुनाव लड़ चुके हैं। चुनाव हार गये तो पत्रकारिता करने लगे। तीन साल पहले जब वे बनारस थे तो सुबह का चाय, दोपहर का खाना व रात का भोजन हम लोग साथ करते थे। उन्होंने मेरे साथ कई वादा किया। हर वादा तोड़ते रहे। इसके बाद भी उनका साथ नहीं छोड़ा। कारण मुझे देखना था कि आखिर कांग्रेसी होते कैसे हैं। रोज नया अनुभव। बनारस से एक सप्ताह की यात्रा पर निकला था। अमर उजाला के कांग्रेसी पत्रकार मित्र से फोन पर मिलने के लिए बात हुई। उनका जवाब था, अभी कुछ देर में आपसे मिलने आ रहा हूँ। मिलना तो दूर फोन भी उनका नहीं आया। आज और भी नजदीक से देखने को मिला कि आखिर कांग्रेसी होते कैसे हैं। यहाँ एक बात साफ़ कर दूँ। एक और मेरे कांग्रेसी मित्र हैं। 2010 में गोरखपुर कांग्रेस के महासचिव हुआ करते थे। नाम है आलोक शुक्ला। इनका नाम इसलिए लिया कि ये भद्र पुरुष हैं। ये कांग्रेस में इसलिए हैं कि सरदार पटेल इनके आदर्श हैं। यही कारण है कि ये आज राजनीति के फर्श पर हैं। संयोग से अब ये भी पत्रकारिता करते हैं। कई बार आलोक जी से कहा भी कि कांग्रेस के एक भी गुन (गुण) आपमें नहीं है। हर बार मुस्कुराकर उन्होंने मुझसे यही कहा, अजय जी मैं झूठ नहीं बोल पाता।
इसी साल जून माह में बनारस से एक सप्ताह के लिए घुमने निकला था। देहरादून शहर से करीब 15 किलोमीटर दूर सिटी बस से जैतुनबाला पहुंचा। दिन के करीब डेढ़ बज रहे थे। सुबह से सिर्फ एक चाय और नमकीन खाया था। भूख बहुत तेज लगी थी। मैं अकेला था। देहरादून तक दो और मित्र थे पर वे आराम करने के मुड में थे। एकला चलो की तर्ज पर मैं घुमक्कड़ी करने जैतुनबाला तक आ गया। यहाँ कई चलता-फिरता होटल सडक के किनारे लगे थे। चार पहिया वाहन में पूरा होटल। शुद्ध शाकाहारी अन्नपूर्णा होटल। गाड़ी के नजदीक पहुंचा। हर थाली का रेट लिखा था। जनरल थाली 40 रुपया। सेवा इतना फास्ट कि 40 रूपये का कूपन पकड़ाते ही भोजन से भरी थाली मेरे हाथ में। खाना खाने के बाद टहल रहा था। दो ऑटो वाले आपस में बात कर रहे थे।
पहला : कितनी कमाई हुई।
दुसरा : क्या कमाई होगी। सुबह से एक भी पर्यटक नहीं मिला। बस घुमक्कड़ों को ढो रहा हूँ। यहीं से मुझे अनुभव हुआ। 40 रूपये का जनरल थाली खाने वाला पर्यटक नहीं कोई घुमक्कड़ ही हो सकता है।

यह दुनियां है या कोई किताब? कितनी मिट्टी के आखर हैं। कितने पर्वत, कितनी नदियाँ... अगर इन पन्नों से होकर गुजरना है...धरती को नापना है तो देहरादून का सैर एक बार जरुर करें। उससे भी ज्यादा अगर माँ के मर्म को समझना है तो सान्ताला देवी दर्शन जरुर करें। जैतुनबाला से ऑटो पकड़ कर पंजाबीवाला पहुंचा। यहाँ से करीब 2 किलोमीटर चलकर हमें सान्ताला देवी मंदिर पहुंचना था। सैकड़ों की संख्या में भक्त माँ की जयकारा लगाते हुए जा रहे थे। उनकी टोली में मैं भी शामिल हो गया।
जोर से बोलो, जय माँ सान्ताला
सबकी माँ हैं सान्ताला
जुवां से माँ शब्द आते ही लगा जैसे सभी थकान कपूर की टिकिया की भांति काफूर हो चुका है। मन में शान्ति इतनी जैसे चिंतन, एकांत और साधना के संगम में हम सभी डुबकी लगा रहे हों। इस तरह से दो किलोमीटर का सफर कब ख़त्म हुआ पता ही नहीं चला। इस पैदल यात्रा में एक अलग प्रकार का रोमांच था। यात्रा महज क्रिया भर नहीं है। एक कला है। एक जीवन दृष्टि, जो भूगोल के नक़्शे से बाहर निकलकर बहुत कुछ समेटती है.... सहेजती है इतिहास के पन्नों को...फिर शब्दों में ढलकर एक किताब का रूप धारण करती है। मेरे इस यात्रा में माँ सान्ताला देवी शब्दों के साथ दिल में भी ढल गईं। मंदिर के छोटे से बरामदे में बैठकर ध्यान लगा रहा था। आँख खुली तो बगल में एक बुजुर्ग हाँथ जोड़कर बैठे थे। उनकी आँखों में आंसू देखकर लगा जरुर बहुत कष्ट में होंगे। कुछ देर बाद मेरी उनसे बातें होने लगी। रोने का कारण पूछा तो उनका उत्तर अजीब सा था। जो बालक जितना अधिक दुखी होता है माँ की उस पर उतना ही अधिक कृपा होती है। मैं अपनी सभी दुखों को याद कर इसलिए रो रहा था कि माँ की कृपा बनी रहे।

तब मुझे लगा कि जब किसी तरह का दुःख आने वाला है तो समझूँ कि मेरे ऊपर जरुर किसी रहबर की कृपा होने वाली है। यही तो है दुःख का अंत। जब दुःख आयेगा तो मेरे भीतर किसी प्रकार की अकड़ नहीं बल्कि आखों में आंसू होगा। किसी के कृपा की चाहत होगी। जब यह सभी गुण सुख में भी बना रहे तो दुःख आयेगा ही नहीं। माँ की कृपा के लिए आंसुओं की नहीं समर्पण की जरूरत होती है। बचपन में चुहानी घर में बैठकर माँ के हाथों से बनी गर्मागर्म रोटियां खाने में जो स्वाद था आज मख्खन लपेटी हुई रोटियों में नहीं। आज पता चला स्वाद रोटी में नहीं था। स्वाद तो माँ के हथेलियों में था। मीठी रोटियों वाली माँ की वह हथेलियाँ आज भी प्यार व आशीर्वाद बरसाती है जब खुद को समर्पण कर देता हूँ। जब मैं रोता हूँ तो इस माँ को अच्छा नहीं लगता। रसोई में बैठकर रोटियां खिलाने वाली माँ कहती है, अपने बेटों को खुश देखकर दिल बाग़-बाग़ हो उठता है। मैं किसी माँ के दर पर जाकर कयों रोऊँ। मेरी तो अपनी माँ है जो मुझे सदा खुश देखना चाहती है।
           
       अजय पाण्डेय

       सुहवल, गाजीपुर

मेरी तो अपनी माँ है

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यात्रा वृतांत

एक मेरे कांग्रेसी मित्र हैं। वर्तमान में वे अमर उजाला में कार्यरत हैं। कांग्रेसी इसलिए कि कांग्रेस से वे एक बार विधानसभा का चुनाव लड़ चुके हैं। चुनाव हार गये तो पत्रकारिता करने लगे। तीन साल पहले जब वे बनारस थे तो सुबह का चाय, दोपहर का खाना व रात का भोजन हम लोग साथ करते थे। उन्होंने मेरे साथ कई वादा किया। हर वादा तोड़ते रहे। इसके बाद भी उनका साथ नहीं छोड़ा। कारण मुझे देखना था कि आखिर कांग्रेसी होते कैसे हैं। रोज नया अनुभव। बनारस से एक सप्ताह की यात्रा पर निकला था। अमर उजाला के कांग्रेसी पत्रकार मित्र से फोन पर मिलने के लिए बात हुई। उनका जवाब था, अभी कुछ देर में आपसे मिलने आ रहा हूँ। मिलना तो दूर फोन भी उनका नहीं आया। आज और भी नजदीक से देखने को मिला कि आखिर कांग्रेसी होते कैसे हैं। यहाँ एक बात साफ़ कर दूँ। एक और मेरे कांग्रेसी मित्र हैं। 2010 में गोरखपुर कांग्रेस के महासचिव हुआ करते थे। नाम है आलोक शुक्ला। इनका नाम इसलिए लिया कि ये भद्र पुरुष हैं। ये कांग्रेस में इसलिए हैं कि सरदार पटेल इनके आदर्श हैं। यही कारण है कि ये आज राजनीति के फर्श पर हैं। संयोग से अब ये भी पत्रकारिता करते हैं। कई बार आलोक जी से कहा भी कि कांग्रेस के एक भी गुन (गुण) आपमें नहीं है। हर बार मुस्कुराकर उन्होंने मुझसे यही कहा, अजय जी मैं झूठ नहीं बोल पाता।
इसी साल जून माह में बनारस से एक सप्ताह के लिए घुमने निकला था। देहरादून शहर से करीब 15 किलोमीटर दूर सिटी बस से जैतुनबाला पहुंचा। दिन के करीब डेढ़ बज रहे थे। सुबह से सिर्फ एक चाय और नमकीन खाया था। भूख बहुत तेज लगी थी। मैं अकेला था। देहरादून तक दो और मित्र थे पर वे आराम करने के मुड में थे। एकला चलो की तर्ज पर मैं घुमक्कड़ी करने जैतुनबाला तक आ गया। यहाँ कई चलता-फिरता होटल सडक के किनारे लगे थे। चार पहिया वाहन में पूरा होटल। शुद्ध शाकाहारी अन्नपूर्णा होटल। गाड़ी के नजदीक पहुंचा। हर थाली का रेट लिखा था। जनरल थाली 40 रुपया। सेवा इतना फास्ट कि 40 रूपये का कूपन पकड़ाते ही भोजन से भरी थाली मेरे हाथ में। खाना खाने के बाद टहल रहा था। दो ऑटो वाले आपस में बात कर रहे थे।
पहला : कितनी कमाई हुई।
दुसरा : क्या कमाई होगी। सुबह से एक भी पर्यटक नहीं मिला। बस घुमक्कड़ों को ढो रहा हूँ। यहीं से मुझे अनुभव हुआ। 40 रूपये का जनरल थाली खाने वाला पर्यटक नहीं कोई घुमक्कड़ ही हो सकता है।

यह दुनियां है या कोई किताब? कितनी मिट्टी के आखर हैं। कितने पर्वत, कितनी नदियाँ... अगर इन पन्नों से होकर गुजरना है...धरती को नापना है तो देहरादून का सैर एक बार जरुर करें। उससे भी ज्यादा अगर माँ के मर्म को समझना है तो सान्ताला देवी दर्शन जरुर करें। जैतुनबाला से ऑटो पकड़ कर पंजाबीवाला पहुंचा। यहाँ से करीब 2 किलोमीटर चलकर हमें सान्ताला देवी मंदिर पहुंचना था। सैकड़ों की संख्या में भक्त माँ की जयकारा लगाते हुए जा रहे थे। उनकी टोली में मैं भी शामिल हो गया।
जोर से बोलो, जय माँ सान्ताला
सबकी माँ हैं सान्ताला
जुवां से माँ शब्द आते ही लगा जैसे सभी थकान कपूर की टिकिया की भांति काफूर हो चुका है। मन में शान्ति इतनी जैसे चिंतन, एकांत और साधना के संगम में हम सभी डुबकी लगा रहे हों। इस तरह से दो किलोमीटर का सफर कब ख़त्म हुआ पता ही नहीं चला। इस पैदल यात्रा में एक अलग प्रकार का रोमांच था। यात्रा महज क्रिया भर नहीं है। एक कला है। एक जीवन दृष्टि, जो भूगोल के नक़्शे से बाहर निकलकर बहुत कुछ समेटती है.... सहेजती है इतिहास के पन्नों को...फिर शब्दों में ढलकर एक किताब का रूप धारण करती है। मेरे इस यात्रा में माँ सान्ताला देवी शब्दों के साथ दिल में भी ढल गईं। मंदिर के छोटे से बरामदे में बैठकर ध्यान लगा रहा था। आँख खुली तो बगल में एक बुजुर्ग हाँथ जोड़कर बैठे थे। उनकी आँखों में आंसू देखकर लगा जरुर बहुत कष्ट में होंगे। कुछ देर बाद मेरी उनसे बातें होने लगी। रोने का कारण पूछा तो उनका उत्तर अजीब सा था। जो बालक जितना अधिक दुखी होता है माँ की उस पर उतना ही अधिक कृपा होती है। मैं अपनी सभी दुखों को याद कर इसलिए रो रहा था कि माँ की कृपा बनी रहे।

तब मुझे लगा कि जब किसी तरह का दुःख आने वाला है तो समझूँ कि मेरे ऊपर जरुर किसी रहबर की कृपा होने वाली है। यही तो है दुःख का अंत। जब दुःख आयेगा तो मेरे भीतर किसी प्रकार की अकड़ नहीं बल्कि आखों में आंसू होगा। किसी के कृपा की चाहत होगी। जब यह सभी गुण सुख में भी बना रहे तो दुःख आयेगा ही नहीं। माँ की कृपा के लिए आंसुओं की नहीं समर्पण की जरूरत होती है। बचपन में चुहानी घर में बैठकर माँ के हाथों से बनी गर्मागर्म रोटियां खाने में जो स्वाद था आज मख्खन लपेटी हुई रोटियों में नहीं। आज पता चला स्वाद रोटी में नहीं था। स्वाद तो माँ के हथेलियों में था। मीठी रोटियों वाली माँ की वह हथेलियाँ आज भी प्यार व आशीर्वाद बरसाती है जब खुद को समर्पण कर देता हूँ। जब मैं रोता हूँ तो इस माँ को अच्छा नहीं लगता। रसोई में बैठकर रोटियां खिलाने वाली माँ कहती है, अपने बेटों को खुश देखकर दिल बाग़-बाग़ हो उठता है। मैं किसी माँ के दर पर जाकर कयों रोऊँ। मेरी तो अपनी माँ है जो मुझे सदा खुश देखना चाहती है।
           
       अजय पाण्डेय

       सुहवल, गाजीपुर

Sunday, 12 June 2016

18 अप्रैल 2014 की रचना। जब बनारस से केजरीवाल व नरेंद्र मोदी लोकसभा के प्रत्याशी थे। 


हे भाजपाइयों 



हे भाजपाइयों
केजरीवाल का क्यों
विरोध कर रहे हो।
फूलों की पंखुडिय़ों के बदले
टमाटर फेंक रहे हो।
इस तरह तो तुम
बाबा विश्वनाथ की नगरी
को बदनाम कर रहे हो।
पहले गांधी का और अब
गांधीगीरी का विरोध कर रहे हो।
क्या मान लूं कि नाथूराम गोडसे
की राह पर चल रहे हो।
कांग्रेस और सपा प्रत्याशियों का
विरोध क्यों नहीं करते
शायद तुम्हें मालूम है वहां
फूल नहीं कुछ और मिलेगा।
मेरे लाल एेसा क्यों किया
पूर्वजों को भी खलेगा।
मार इतनी पड़ेगी कि पिचके टमाटर
और फूटे अंडों सा तुम
सड़क पर बिखर जाओगे
फिर तो नमो-नमो नहीं
बाप-बाप चिल्लाओगे
मैं तो कहता हूं यह
लहर नहीं जहर है।
नीलकंठ को समर्पित कर दो।
दो शब्द प्रेम का
काशी में भी रहने दो।
-अजय पांडेय

सुहवल, गाजीपुर

ये नेता हैं 

=====
ये नेता हैं वोट के लिए
विष बो रहे हैं 
अब तो सेना को भी
बांटने की बात कर रहे हैं
किसका कितना योगदान है देश के लिए
हमें क्यों समझाते हो .
तुम अपना योगदान बता दो
जनता को क्यों मूर्ख बनाते हो
पहले दिलों को बांटते थे
अब देश को भी बाटने की
बात कर रहे हैं
तभी तो अपनी जुबा से बस
ज़हर उगल रहे हैं
ये जनता है समझती है
जो भाषा तुम बोल रहे हो
हमें क्या आज़म खां की
भैस समझ रहे हो
अपनी जनसभाओं में
जनता को भड़काने की
बात कर रहे हैं
इस तरह वो हमारी भावनाओं
से खेल रहे हैं
चुनाव आयोग की कार्यवाही पर
हाथ मल रहे हैं
बूथों पर वोटो की चोरी
कैसे की जाएगी
कार्यकर्ताओं को समझा रहे हैं
फिर भी खुद को शाह कह रहे हैं 
24 अप्रैल 2्14 की यह रचना। काशी में नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल लोकसभा चुनाव में सांसद प्रत्याशी थे। एक कार्यक्रम के दौरान भाजपा कार्यकर्ताओं ने केजरीवाल पर टमाटर व अंडों से हमला किया था। उसके एक दिन बाद केजरीवाल की जनसभा में उनके पार्टी के नेता सोमनाथ भारती के साथ मारपीट  की थी। 

हे भाजपाइयों 


हे भाजपाइयों
पहले टमाटर-अंडे फेंकते थे
अब खून भी बहाने लगे
तुम तो महमूद गजनवी
के रास्ते पर चलने लगे 
गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया
तुमने सोमनाथ भारती पर
उसने दौलत लूटने के लिए
और तुम वोट के लिए
अंतर सिर्फ इतना है
वह मंदिर था
यह मानुष है
तुम्हारी क्या गारंटी
कि तुम कहाँ के हो
तुम न काशी के हो
न कावा के
यकीन न हो तो इतिहास देख लो
किसी बड़े बजुर्गों से पूछ लो
लेकिन सोमनाथ सौ फ़ीसदी भारतीय है भारतीय है भारतीय है
काम से भी नाम से भी...
-अजय पाण्डेय

छोटा ही सही कलमकार बन गया


मुझे आज भी याद है वह दिन 
जब दूसरी, तीसरी कक्षा में था 
शाम को छुट्टी की घंटी बजती 
बहुत खुश होता.घर जाता 
नीम के पेड़ पर चढ़कर 
दोस्तों संग ओलापाती खेलता
सभी त्यौहार याद रहता
ऐसा नहीं की पढ़ने में तेज था
इसलिये कि उस दिन छुट्टी रहती
किताब छोड़ गुल्ली डंडा खेलता
पाठ भले न याद हो
अगली छुट्टियाँ जरुर याद रहती
बड़ा होता गया आठवी, नवी
फिर दसवीं में पहुंच गया
अब झूठ बोलकर छुट्टियाँ लेने लगा
कभी खुद बीमार होता तो कभी
माँ को भी बीमार कर देता
मामा, बुआ के यहाँ जाकर
मस्ती करता, पकवान तोड़ता
इस छुट्टी की आदत ने
पढाई में कमजोर कर दिया
गुरुजनों के निगाह से भी गिरा दिया
छोटा भाई प्रथम तो मै
मैं सेकंड से पास हुआ
ग्यारहवीं, बारहवीं और
बीए तक यही हाल रहा
अगर कोई सवाल फंसता तो
पिताजी कहते छोटे भाई से पूछ लो
अब तो घर में छोटे भाई की ही पूछ थी
पहनने, खाने की खूब छूट थी
पिताजी का सपना था
की मैं अध्यापक बनूं
पर पत्रकार बन गया
छोटा ही सही कलमकार बन गया
यहाँ भी छुट्टियां पीछा नहीं छोड़ रही
यह कैसी क़यामत ढा रही
यह मेरा साथ नहीं छोड़ती
या मैं खुद बंधा हूँ इस डोर से
अगर हाँ तो काटूँगा इस डोर को
काशी के लल्लापुरा में कुछ शोहदों ने एक लड़की को जला दिया थाा ।  27 दिसंबंर 2014  को उसकी मौत हो गई। गई थी। काशी की इस बेटी को समर्पित उसी दिन मैंने यह कविता लिखी थी। आज इसे यहां पोस्ट कर रहा हूं।  

कोई है जो यह कह सकेगायह मेरी काशी है।


आज रो रहा मैं, अश्कों के बगैर
कतरा-कतरा मेरे आंखों से टपक रहा
काशी की बेटी जला दी गई सरे मुहल्ले में
चीखती मगर जुबा पर आवाज न थी
मौत लहरा रही थी उसके चेहरे पर
वो जल्लाद अट्टहास भर रहा था
वह हर चेहरे को खुदा मान
जिंदगी की गुहार लगा रही थी
पर सभी अंगद के पांव की भांति जम गये
किसी के दिल से आह भी न निकली
आखिर आठ दिन बाद उसने
दुनियां को अलविदा कह दिया
आज से आठ दिन पहले
इसी काशी के आंगन में
धूप भरे दामन में
वह चहकती थी, खिलखिलाकर हंसती थी
पर रात में मौत का पैगाम आया
उसे अपनों ने हिलाया-डुलाया
अब वह एक लाश थी
वह अपना मृत शरीर छोड़ गई
नोचने को, खेलने को, उन जल्लादों के लिए
जो कभी उसके जज्बातों से खेलते थे
अपनी मौत के साथ एक प्रश्न छोड़ गई
आखिर यह काशी किसकी है।
जहां हैवानियत का नंगा नाच होता है
लोग दूसरे के जज्बातों से खेलते हैं
लड़कियां जलाई जातीं हैं
कोई है जो इसका श्रेय लेगा
कोई है जो यह कह सकेगा
यह मेरी काशी है, यह मेरी काशी है।
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

घर में रहकर किसे ज्ञान मिला


भूकंप ने महल वालों को भी भागना सीखा दिया, 
कुछ पल के लिए सही, आसमान के नीचे 
रहना सीखा दिया। 
मैदान में धूप के बीच युवक और युवतियां 
खडे हो माथे से पसीना पोछ रहे थे। 
न एसी, न पंखा और न ही कूलर
अगर कुछ था तो सूरज की तपिश
और साथ में भूकंप का डर
एक ने बोला, भूकंप ने भेदभाव मिटा दिया
जीवन का अर्थ समझा दिया
यहां न कोई छोटा न बडा
ईश्‍वर जब कहर बरबाता है तो
सभी उसके आगोश में होते हैं
अब उसे कौन समझाए
ज्ञान के लिए बाहर भागना पडता है
महल में रहकर अब तक किसे ज्ञान मिला
भाग-भाग कर ही तो सभी को ज्ञान मिला
चाहे वह गांधी हाें या गौतम बुद़ध।


अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

गांधी जी के साथ अखलाक को भी नमन 

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मजहब के नाम पर बने देश में इंसानों की जिन्दगी दर्दनाक अंत की ओर बढ़ने लगती है। जैसे जंगल के जीव अपने से कमजोर जीव-जंतु का शिकार कर अपनी भूख मिटाते हैं ठीक इसी प्रकार धरती के मजहबी प्राणी अपने मजहब को ज़िंदा रखने के लिए मनुष्य के साथ इंसानियत का भी कत्ल कर देते हैं।
आपके मन में भी शायद येसा विचार कभी जरुर आया होगा। दादरी में जो कुछ हुआ सारी सीमाएं तोड़ दी। इंसानियत की दीवार ढह गई। हमाम में सभी नंगे हो गये। हद तो तब हो गई जब बजीर ने कहा-यह एक हादसा था। उन्मादी मजहबी भीड़ यैसे बयान देने वाले बजीर को 24 कैरेट का नेता मानती है।
अब मंदिरों में ईश्वर भी कलंकित हो रहे हैं। मंदिर में प्रार्थना सभा नहीं इंसान को इंसान का खून पीने के लिए उकसाया जा रहा है। दादरी में जिस अखलाख की ह्त्या कर दी गई उसका गवाह वह मंदिर भी है जहां से गाय का मांस पकने का अफवाह फैलाया गया। बजीर साहब यह हादसा नहीं आतंक है। बाहरी दुनिया में तो आतंकबाद पर अच्छा बोल लेते हैं पर जब घर में होता है तो हादसा बता देते हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की आज जयंती है। यै मानवता खून करने वालों तुम्हारे कृत्यों को जानकार अहिंसा का यह पुजारी आज राजघाट पर बैठ आंसू बहा रहा होगा। अगर तुम गाँधी को माला पहनाने राजघाट जाना तो वही पर दो फूल अखलाक को भी चढाकर पश्चाताप के दो आंसूं जरुर बहा लेना। इससे तुम्हारा पाप शायद कुछ कम हो जाय।
राम हों या रहीम अगर मनुष्य में भेद पैदा करें तो दोनों ही हमारे आदर्श नहीं हो सकते। अगर मंदिर-मस्जिद से देश में अशान्ति फैलाने और खून करने की साजिश रची जाती हो तो वहां ईश्वर-अल्ला नहीं हो सकते।
गाँधी जी ने मुक्तिदूत में मनुवाद पर प्रहार करते हुए कहां था-
अगर हरिजन के छू लेने से मंदिर का है कल्याण नहीं, तो मैं कहूंगा मंदिर में सब पत्थर है भगवान नहीं।
मनुवाद पर प्रहार करने वाले गांधी अगर जाने होते कि उसी पत्थर के मंदिर से मनुष्य का खून बहाने का आह्वान किया जाएगा तो कुछ और ही लिखे होते। मनुष्य से भेदभाव करने वाले जानवरों में भी भेद कर रहे हैं। बीफ़ के मांस का तो विरोध करते हैं पर होटलों में बैठकर चिकेन और बिरयानी खाते हैं। जीव तो जीव होता है। क़त्ल तो कत्ल होता है। चाहे वह मनुष्य, गाय, सुअर, बकरी, मुर्गी और ऊंट ही कयों न हों। यह हम नहीं कह रहे गांधी जी के अहिंसा के पाठ में हमें बताया गया है।

 अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

असहिष्णु हुआ मौसम

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यह मौसम भी असहिष्णु हो गया
इतना कुहरा 
इतनी ठण्ड
इस मौसम को न गरीब की फ़िक्र
न मेरी
पुरस्कार न सही
कुछ गर्म कपडे ही लौटा दो
सरकार को नहीं
उन गरीबों को
लाचार और जरुरतमंदों को
जिनके बदन पर कपडे नहीं
काशीनाथ सिंह हों या
मुनव्वर राणा
तुम मेरे आह्वान को
अभियान बना दो
तब समझूंगा
तुम भी सहिष्णु हो गए।
अजय पाण्डेय, सुहवल गाजीपुर

हे ! नारी तुम महान हो

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बचपन में पढ़ाई के समय " इलाहाबाद के पथ पर तोड़ती पत्थर ....." कविता पढ़ा था। तभी मेरे जेहन में एक ही सवाल बार-बार कौंध रहा था। हे नारी तुम कितनी महान हो। अपने बेटे को पालने के लिए भरी दोपहरी में दो रोटी की जुगाड़ में इलाहाबाद के पथ पर पत्थर तोड़ रही थी। अब आज डाक्टर ओपी के इस चित्र को देख यह लगा कि इतने दिनों बाद भी नारी वहीँ है जहाँ पहले थी। बारिश और कीचड़ के बीच सिर पर टोकरी का बोझ .... यह रोटी का ही तो जुगाड़ है।
आज मैं लखनऊ में था। एक सज्जन मिले किसी बात पार उन्होंने एक ज्ञान की बातें कह डाली। अब आप भी सुन लीजिये। उन्होंने कहा, जब औरतों का नाक न हो तो वे मैला भी खा जायेंगी। वहां दो-तीन महिलायें भी थीं। खैर यह उनकी महानता थी कि इस बात का ज़रा सा विरोध नहीं किया। कहा भी गया है, नारी का दूसरा नाम सहनशीलता है। मुझसे रहा नहीं गया। लगा यह तो नारी दिवस पर नारी का अपमान है। मैंने अपना तर्क रखा। हाँ नारी पर कही गयी उक्त विद्वान की बात तो सही है, पर पुरुष तो नाक रहते हुए मैला खा लेता है। नारी नाक का सही उपयोग तो कर रही है। इस बात की गारंटी तो है की जब तक नाक सही सलामत है मैला नहीं खाएगी। पुरुष की क्या गारंटी?? क्या आपको नहीं लगता कि जिस नारी को शक्ति का रूप कहा गया है। जिस नारी को दुर्गा का रूप कहा गया है ... उसे हम मैला खाने की बात कह रहे हैं।। उसका हम अनादर कर रहे हैं। उसका अपमान कर रहे हैं। जिस नारी ने इलाहाबाद के पथ पर भरी दोपहरी में पत्थर तोड़कर .... पसीने से सना आंटे की रोटी खिलाकर तुम जैसा मर्द तैयार किया। तुम जैसा पौरुष तैयार किया .... और तुम... और तुम्हारी सोच ... और तुम्हारा नजरिया यह?? सौ साल पहले भी एक नारी एक अबोध बच्चे को मर्द बनाने के लिए मजदूरी करती थी। आज भी कर रही है। अबोध बालक से मर्द बन जाने के बाद सौ साल पहले नारी के बारे में पुरुष " नारी और मैला" का उदाहरण देता था। आज अब भी दे रहा है ... और इसकी क्या गारंटी कि आने वाले सौ साल बाद नहीं देगा?
हे पुरुष वर्ग अगर एक नारी के प्रति तुम्हारी यही नजरिया है। तो तुम नारी को दुर्गा कहना छोड़ दो। एक नारी को आदि शक्ति कहना छोड़ दो। एक नारी को माँ कहना छोड़ दो।
नहीं छोड़ सकते न। मैं जानता हूँ कि पुरुष वर्ग में दोहरा चरित्र होता है। एक तरफ नारी का दूध पीकर पौरुष बनते हो। नारी शक्ति का पूजा कर खुद का कल्याण चाहते हो... पर जब उसी नारी को " नाक और बिष्टा" जैसा शब्द कहकर अपमान करते हो। यही कारण है कि आज भी नारी शक्ति के बाद भी अबला है... और तुम सबला। आज भी अबला के आंचल में दूध और आँखों में पानी है। आंचल का दूध तो तुम पी जाते हो पर आंसू नारी के हिस्से छोड़ जाते हो। अब तुम ही बताओ महान किसे कहें। नारी को या तुम्हे.... हे! नारी तुम महान हो।
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

Saturday, 11 June 2016

जिंदगी जहर नहीं

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जिंदगी जहर नहीं, दुखों का कहर सही
अगर तुम्हारा साथ हो, सर पे मेरे हाथ हो
हर क्लेश छोड दूं, विरह से मुख मोड लूं
दुखों का रेला तोड दूं, सुखों का मेला जोड लूं
खुशियों का गुबार दूं, अगर तुम्हारा साथ हो ----
वक्त भले ठहर जाए, रोशनी बिखर जाए
गमों के आखियानें में, जिंदगी का अंधेरा हो
दिल जला के रोशनी दूं, अगर तुम्हारा साथ हो ---
लूटा के मैं अपनी खुशी गीत बांटता चलूं
आंसूओं के समंदर से संगीत लूटाता चलूं
नफरत को नया नाम दूं, अगर तुम्हारा साथ हो ---
कांटों का अगर माला हो, जीवन जहर का प्याला हो
दिल के कोरे कागज पर, आंसूओं की वर्णमाला से
लिखूंगा किताब तेरी, अगर तुम्हारा साथ हो ----
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

ठगते लोग बनारस को

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बहुत बार देखा है मैंने
ठगते लोग बनारस को
सबके पथ यह फूल बिछाते
इसके पथ कांटे और खार
सड़कें टूटीं, गलियां उदास हैं
कूड़ों का अंबार बहुत है
हिस्से आया खोटा सिक्का
फिर भी मन में बहुत हुल्लास है
बहुत बार देखा है मैंने, ठगते लोग बनारस को...
सखियां, सधवा, पास पड़ोसी
निर्धन, निर्मम या जग उपहासी
सबकी पूजा का व्रत है मन में
नहीं चिंता क्या होगा अग्निपथ में
बहुत बार देखा है मैंने, ठगते लोग बनारस को...
संत तुलसी हों या पंथ कबीरा
गौतम बुद्ध या कृष्ण की मीरा
सुबह-ए-बनारस सबने देखा है
दिये संग जलते किसने देखा है?
बहुत बार देखा है मैंने, ठगते लोग बनारस को...
'काशी' की थाती गंगा का आंचल
उसको भी मैला कर जाते
पुण्य लाभ का डुबकी लगाकर
इनके हिस्से पाप छोड़ जाते
बहुत बार देखा है मैंने, ठगते लोग बनारस को...
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

सो गई है सरकार जगा दो

भारत मां के वीर सपूतों
सो गई है सरकार जगा दो
सीमा के शैतानों को 
उसकी तुम औकात दिखा दो।
गाजीपुर की धरती वीरों की
अब्दुल हमीद रणधीरों की
सौ सौ प्राण गवाएं हैं
तब जाकर लाज बचाए हैं
एक और लाल शहीद हो गया
अब तो मां की लाज बचा दो
भारत मां के वीर सपूतों
सो गई है सरकार जगा दो
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

नहीं आये अच्छे दिन


दिन गये, साल गये
नहीं आये अच्छे दिन
वह जो तट को छू
चाय की प्याली में 
लहर को उछाल गया था
सिर्फ चुनावी हवा थी
मंचों से किये गये वादे
अब भूली बिसरी
कथा बन गई
किसी अकथ व्यथा की तरह
अपनों से लड़कर-भिड़कर
बूथों पर कमल खिलाई
हमें नहीं पता था उसकी तरुणाई
अब तो अच्छे दिन के इंतजार में
आंखें भी पथराई
हम जिसे समझ लिये थे मोती और मूंगा
वह निकला शंख और घोंघा
पीछे से फूंको तो तेज आवाज
अंदर से खोखला
रात में सोये तो
सपने में गांधी जी बोले
मत उदास हो बालक
अब तो तेरे शहर में दौड़ेगी मेट्रो
शहर का विकास भी उसी रफ्तार में होगा
मैंने साहस कर पूछ लिया
गांधी जी आप को गुजरात के साबरमती में रहते हो
फिर यूपी में कहां भटक रहे हो
गांधी जी बोले-नाथूराम के भक्तों से खतरा है
गुजरात से महराष्ट्र तक
हरियाणा से झारखंड तक में
इनकी ही चलती है
एक यूपी ही बचा है
जहां गांधी सुरक्षित हैं
जो मैने 'मुक्तिदूत' में कहा था
वही आज 'पीके' कह रहा है
बवाल तब भी मचा था
बवाल अब भी मचा है
अब अपनों से मत लड़ना-भिड़ना
गोडसे नहीं, गांधी के ही रास्तों पर चलना
अच्छे दिनों के चक्कर में मत पड़ना
मुझे यूपी में रहने देना, मुझे यूपी में रहने देना।
अजय पाण्डेय

बेटी ही बचाएगी

अगर न होती घर में बेटी
चंचल मन आवारा होता
ईश्वर तक अपराधी होता
अपराध बोध का मारा होता
रामायण न होती घर-घर में
गीता अबुझ पहेली होती
प्यार न होता इस धरती पर
हर-एक मन बंजर होता
अपराध बोध का मारा होता
अगर न होती घर में बेटी
गोद न भरती किसी किरण की
सारा जहां निरबंशी होता
डोली रहती बिन दुल्हन की
हर घर में बस रुदन होता
अपराध बोध का मारा होता
अगर न होती घर में बेटी
जो बात समझ जाए इतना सा
हर जवाहर के घर इंदिरा होती
सर कलम न होता जवानों का
पाक का कई बंटवारा होता
अपराध बोध का मारा होता
अगर न होती घर में बेटी
सरस्वती न खोती संगम तट पर
यमुना भी यौवन में होती
बेटा-बेटी का भेद मिटता तो
गंगा जल नहीं काला होता
अपराध बोध का मारा होता
अगर न होती घर में बेटी
कली न खिलती किसी चमन में
बगियों में बस पतझड़ होता
बेटी ही बचाएगी
कभी नहीं यह शीर्षक होता
अपराध बोध का मारा होता
अगर न होती घर में बेटी

अजय पाण्डेय
रेहाना की घर वापसी

काशी का पुराना अस्सी घाट बिजली की दूधिया रोशनी से नहा रहा था। गंगा आरती खत्म होने के बाद पंडित नीलमणि अभी कुछ आगे ही बढ़े थे कि बगल में पेड़ के पास चबूतरे पर बैठी एक महिला की ओर नजर गई। वह ठिठक गए। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह वही रेहाना है, जिससे वर्षों पहले प्रेम करता था। माथे पर सिंदूर और हिन्दू महिला के परिधान में उसे देखकर कुछ शक भी हुआ। उस महिला की गोद में एक बच्ची भी थी। बगल में हट्ठा-कट्ठा बैठा एक नौजवान पुरुष रेहाना से बातें कर रहा था। अब घाट से अधिकतर लोग जा चुके थे। इक्का-दुक्का ही लोग बैठे थे। वह साहस कर जिस चबूतरे पर रेहाना थी, जाकर बैठ गया।
रेहाना भेलपूरी खा रही थी। बगल में बैठे युवक पर जब नजर गई तो उसके हाथ कांपने लगे। वह घबरा सी गई। उसकी आंखों में जैसे धुआं भर गया हो। इसके बाद उसकी आंखें भर आईं। शायद वह अतीत की यादों को इन आंसुओं से श्रद्धांजलि दे रही थी। दोनों एक दूसरे को कभी तिरछी नजर से देखते तो कभी आंखें नीचे कर लेते। नीलमणि से बातें करने के लिए रेहाना उत्सुकथी। पास में बैठा उसका पति और किसी अनहोनी की डर से वह साहस भी नहीं जुटा पा रही थी। नीलमणि उसका पहला प्यार जो था। कभी उसके सुख-दुख का साथी था।
रेहाना का मन अब उड़ रहा था। जैसे जिंदगी इतनी कभी खूबसूरत नहीं थी जितनी आज। हवा में एक अजीब सी छुवन थी, एक अजीब सा दर्द भी। साहस करके उसने पूछ दिया। कहीं तुम नीलमणि तो नही?
हां मैं नीलमणि हूं... और तुम रेहाना?
रेहाना ने सिर हिलाकर हामी भर दी।
पास में बैठा रेहाना का पति मुकेश उसकी तरफ देखने लगा। अभी वह कुछ कहता कि इससे पहले ही रेहाना ने नीलमणि का परिचय देते हुए कहा कि यह मेरे बचपन का दोस्त है। हम एक ही मुहल्ले में रहते थे। कक्षा एक से आठवीं तक साथ पढ़े। बाद में अब्बू ने मुझे आगे नहीं पढ़ने दिया।
नीलमणि अब पंडित नीलमणि बन चुका था। उसने मुकेश को अपना विजटिंग कार्ड देते हुए कहा, कभी मेरे यहां भी जरूर आना।
मुकेश ने सिर हिलाते हुए - क्यों नहीं, जरूर आउंगा।
रेहाना अपने पति मुकेश के साथ वहां से जाने लगी। नीलमणि बहुत ध्यान से रेहाना को निहार रहा था। वह भी पीछे मुड़कर तब तक नीलमणि को देखती रखती रही, जब तक कि वह आंखों से ओझल नहीं हो गया।

मुकेश भी उधर डरा सहमा हुआ था। वह मन में ही सोच रहा था कि नीलमणि इन चार वर्षों में उससे कभी नहीं मिला था। छुट्टियों में वह रेहाना के साथ अक्सर अस्सी घाट पर जाता था। फिर अचानक आज कैसे मुलाकात हो गई। गाजीपुर के जमानियां से यहां आए हुए चार साल हो गए। यह चार साल कब गुजर गया पता ही नहीं चला। घर पर किसी की कोई खोज खबर नहीं। आखिर घर वाले कैसे होंगे। कमरे पर पहुंचने के बाद मुकेश रेहाना से नीलमणि के बारे में पूछने लगा। रेहाना भी मुकेश को अपना सब कुछ दे बैठी थी। मुकेश ने भी तो दूसरे धर्म का होते हुए भी उसे अपनाया। अब ऐसे में वह मुकेश से झूठ कैसे बोल सकती। उसने फैसला किया कि वह नीलमणि के बारे में मुकेश से सब कुछ बता देगी।
रेहाना चाय का प्याला लेकर आई। दोनों चाय पीने लगे। वह घबड़ाए हुए थी। उसके होंठ कांप रहे थे। चाय की चुश्कियों के साथ उसने अपनी बात रखनी शुरू कर दी। मुकेश भी उसकी बातों को ध्यान से सुन रहा था। नीलमणि व रेहाना में खूब दोस्ती थी। तब यह भी ज्ञान नहीं था कि लड़का और लड़की में दोस्ती का मतलब कुछ और भी होता है। कई बार जब नीलमणि के घर जाती थी तो उसके पिताजी व बड़े भाई डांट कर भगा देते थे। कहते थे कि यह ब्राह्मण का घर है। तुम मुस्लिम वर्ग से हो। मेरे घर मत
आया करो। नीलमणि का साथ भी छोड़ दो। तब मैं घर जाकर बहुत रोई थी। जब मां को यह बात पता चला तो उसने भी नीलमणि को मेरे घर आने पर प्रतिबंध लगा दिया। कहा, यह ब्राह्मण होते बड़े खतरनाक हैं। इनका टीका लंबा जरूर होता है पर विचार बहुत छोटा। ये जोड़ने की नहीं तोड़ने की बात करते हैं। अगर अल्लाह ने मुस्लिम बना ही दिया तो इसमें मेरा कौन सा पाप। पहले मैं भी तो हिन्दू परिवार से ही थी। मुस्लिम से शादी हो जाने के बाद आज मुस्लिम हूं। अल्लाह न ऐसा करे लेकिन अगर कल को रेहाना का किसी हिन्दू परिवार के साथ संबंध जुड़ जाए तो क्या यही ब्राह्मण परिवार वाले उसे अपने घर नहीं आने देंगे। उसे नकार देंगे। तब तो कहेंगे कि रेहाना की घर वापसी हुई है। पहले इसकी मां हिन्दू थी। अब उसकी बेटी फिर से हिन्दू परिवार से जुड़ गई।
रेहाना ध्यान से अपनी मां की बातंे सुन रही थी। उसने प्रण किया कि कुछ भी हो जाए वह नीलमणि का साथ कभी नहीं छोड़ेगी। अब घर की बजाय स्कूल में वह नीलमणि से मिलती रही। दोनों को जैसे घरवालों की परवाह ही नहीं। आखिर एक दिन इन दोनों के घरवालों को इस बात का पता चल ही गया कि दोनों अब घर की बजाय स्कूल में मिलते-जुलते हैं। रेहाना के घर वालों ने उसे स्कूल जाने से ही रोक दिया। उसके घरवालों का यह फैसला उसके माथे पर लगे कलंक से भी बड़ा था। आज के समय में जहां लोग बेटियों को पढ़ाने की बात करते हैं। वहीं उसे स्कूल से बेदखल कर दिया गया। उधर, नीलमणि के घर वालों ने उसे काशी में संस्कृत की पढ़ाई के लिए आश्रम में भेज दिया। बनारस आने के बाद नीलमणि यहां एक आचार्य की देखरेख में संस्कृत की पढ़ाई करने लगा।
नीलमणि के काशी आ जाने के बाद रेहाना तनहाई में रहने लगी। वह अक्सर उदास सी रहती थी। उसे लगता जैसे अब उसकी जिंदगी खत्म। अभी वह खुले आकाश में उड़ना ही चाह रही थी की उसके पंख कतर दिए गए। उसे नहीं पता था कि इस बेमेल दोस्ती की इतनी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। उसे हर वक्त लगता जैसे नीलमणि यही कहीं है। उसकी आवाज कानों में गूंज रही है। फिर वह परेशान होकर इधर-उधर देखने लगती। जब नीलमणि नहीं दिखता तो उसकी आंखों से आंसू बह उसकी गालों को धपकी देती। मानों उसे कह रही है कि रेहाना अब तुम उसे भूल जाओ। नीलमणि और तुम्हारी दोस्ती इतने ही दिनों के लिए थी। वह अपने दुपट्टा से आंसू पोछकर लंबी सांस खिंचती जैसे इस जमाने से उसे बहुत शिकायतें हों पर सुनने वाला कोई नहीं। इसी बीच उसके मन में कई विचार उमड़ घुमड़ रहे थे। अगर उससे कोई बात भी करता तो लगता कि वह उसे काट खाने को दौड़ रहा है।
रेहाना के मुहल्ले में ही एक गरीब ब्राह्मण परिवार रहता था। ब्राह्मण होते हुए भी मुस्लिम रेहाना के घर उनके परिवार के सदस्यों का आना जाना लगा रहता था। रेहाना खाते-पीते घर से थी। उसके पिता लेखपाल थे। वेतन के अलावा ऊपर से भी कुछ झटक लेते थे। वैसे झटका मुसलमान में हराम है पर झटकने में कोई पाप नहीं। गरीब ब्राह्मण परिवार से तीर्थराज तिवारी पहले पुरोहित का कार्य करता था। जब इससे तंगी दूर नहीं हुई तो पान का दुकान खोल ली। इस दुकान से भी उतनी आमदनी नहीं हो पाती कि उसके परिवार का ठीक से गुजर बसर हो जाए। जब कभी भी किसी चीज की जरूरत होती तो रेहाना के घर से मांग कर काम चलता। रेहाना की मां भी कोमल हृदय की महिला थी। मुहल्ले में किसी के घर कोई परेशानी होती तो वह तुरंत पहुंच जाती। यही रिश्ता तीर्थराज तिवारी के घर से भी था। चावल आटा से सौ- दो सौ रुपये नकदी की भी जरूरत पड़ती थी रेहाना की मां के घर तीर्थराज अपनी पंडिताइन को भेजता। वैसे भी गरीबों की कोई जाति या धर्म नहीं होती, जहां उसकी जरूरतें पूरी हों वहीं उसके लिए काबा और काशी। तीर्थराज तिवारी का साला मुकेश अपने दीदी व जीजा के घर आया -जाया करता था। इस दौरान रेहाना के संपर्क में वह आया। दोनों छुप-छुप कर मिलने लगे। इसमें मुकेश की दीदी भी उसका साथ देती थी। लेकिन उसे भी नहीं पता था कि मुकेश और रेहाना के संबंधों को वह जिस तरह से अपनी मौन स्वीकृति दे रही है उसका अंजाम उसके लिए सिरदर्द हो जाएगा। हुआ भी यही। मुकेश काशी में रहने वाले अपने एक दोस्त से बात करके रेहाना को भगा ले गया।
दूसरे दिन दोनों नीलमणि से मिलने बताये पते पर गए। रेहाना ने नीलमणि से सबकुछ बता दिया। कहा कि कोर्ट में हम लोगों ने शादी भी कर ली है। नीलमणि भी रेहाना के चेहरे की खुशी को बिखरने नहीं देना चाहता था। नीलमणि ने मुकेश और रेहाना को मंदिर में हिन्दू रीति रिवाज से शादी करने की सलाह दी। रेहाना भी तैयार थी। मुकेश ने भी गरदन हिलाकर अपनी हामी भर दी। इसके साथ ही उसने एक सलाह दी। जीवन जीने के लिए सिर्फ किसी धर्म के रिवाज की जरूरत नहीं होती। किसी रिवाज को धारण कर लेने से अस्तित्व का बोध नहीं होता। इसके लिए आश्वक्तिबोध ज्यादा जरूरी है। यह मिलेगा आभास होने में।

काशी के अस्सी घाट पर रेहाना और मुकेश के विवाह की तैयारियां शुरू हुई। कुछ हिन्दू धर्म वालों को पता चला तो वहां अपना बैनर व पोस्टर भी लगवा दिया। रेहाना की धर्म वापसी हो रही है। मुस्लिम होकर हिन्दू लड़के के साथ शादी कर रही है। यहीं से शुरू हो जाता है दोनों की हंसती-खेलती जिंदगी को बर्बाद करने का खेल। जब यह बात मुस्लिम वर्ग के लोगों को पता चली तो इसका विरोध शुरू कर दिया। दोनों के प्यार पर पहरा लग गया। इनकी पहचान वायरल न हो जाय इसके लिए दोनों ने बनारस से कहीं और भागने की योजना बनायी। हिन्दी-मुस्लिम संगठनों ने किराये के मकान की तरह इनकी जिंदगी भी किराये की बना दी। उधर, नीलमणि भी परेशान था। मामला इतना बिगड़ जाएगा इसका उसे जरा सा भी आभास नहीं था। वह मन ही मन सोच रहा था कि शायद मुकेश सच ही कर रहा था कि जीवन जीने के लिए सिर्फ किसी धर्म के रिवाज की जरूरत नहीं होती।

मुकेश और रेहाना किसी दूसरे शहर जाने के लिए घर से निकल लिए। कैंट रेलवे स्टेशन के लिए आटो रिक्शा किया। उधर, पुलिस भी किसी अनहोनी के डर से दोनों के पीछे पड़ी थी। आखिरकार पुलिस ने दोनों को हिरासत में ले लिया। यह बात शहर में आग की तरह फैल गई। धर्म के ठेकेदारों ने शहर में जुलूस निकाला। पत्थरबाजी की। हिन्दू वर्ग के लोग इस शादी को करवाने पर आमादा थे। मुसलिम वर्ग के लोग चाह रहे थे कि यह शादी न हो। भीड़ बेकाबू हो गई। इसी भीड़ में से किसी ने पत्थर मारा और मुकेश के सिर पर जा लगी। वह जख्मी हो वहीं गिर पड़ा ...। जख्म से वह जमीन पर पड़ा कराह रहा था। रेहाना दहाड़े मार रोने लगी। कभी धर्म के ठेकेदारों को कोसती तो कभी खुद को। वह चिल्ला रही थी। डॉक्टर को बुलाओ। कोई इसे अस्पताल ले चलो। हमें नहीं करनी शादी लेकिन मेरे मुकेश को तो बचा लो। रेहाना के अश्कों का उस भीड़ पर कोई असर नहीं था। तभी किसी ने एक और पत्थर मारी मुकेश के सिर पर। मुकेश के मंुह से आह की आवाज निकली। उसने जोर से चिल्लाया। मैं फिर आउंगा। एक और मजहबी दंगे का मुझे इंतजार रहेगा। मुझे कितनी बार मारोगे। एक मुकेश मारोगे कई मुकेश पैदा होंगे। एक रेहाना विधवा हो जाएगी। उसे अपनाने के लिए हजारों नीलमणि आगे आएंगे। मुकेश ने नीलमणि की ओर आशा भरी निगाह से देखा। रेहाना को अपनाने का आश्वासन चाहता था। देखो नीलमणि यह रेहाना तुम्हारी थी। तुम्हारी रहेगी। मैं तो सिर्फ एक माध्यम बनकर आया था। अब जा रहा हूं। अगर तुम इसे अपना लोगे तो समझुंगा रेहाना की अब असली घर वापसी हुई है। नीलमणि भी तैयार हो गया। मुकेश की बेटी को उसने गले लगा लिया। तपती दुपहरी की चादर ढलती शाम के आईने में एक जीवंत सच्चाई को उजागर कर रही थी। एक उड़ता परिंदा सदा के लिए खामोश होना चाह रहा था। इस दुनिया को अलबिदा कहना चाह रहा था। इतने में मुकेश के बदन ढीले पड़ गए। रेहाना और नीलमणि फूट-फूट कर रोने लगे। अब भीड़ भी वहां से छट गई थी।

अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

गौरेया तुम कहां हो

गाय चराने गई मीरा अभी आधा रास्ता ही तय कर पाई थी। उसे कोई ख़ास जल्दी नहीं थी। वह कई दिनों से घर में कैद थी। आज जब वह गाँव के सिवान में निकली तो लगा कि सारा जहाँ उसका अपना था। वह खुद से बार-बार सवाल करती, अभी वह सातवीं में ही तो पढ़ रही थी। बापू ने आखिर उसे स्कूल जाने से क्यों रोक दिया। माँ कहती कि तुम्हारी बुआ तो सिर्फ चौथी तक ही पढ़ी हैं, तुम पढ़कर क्या कलक्टर बनोगी। अब माँ-बापू को कौन समझाए कि भैया तो बीए पास कर लिए। वो कलक्टर तो नहीं बन पाए। भैया को तो बीए करा दिया और मुझे सातवीं भी नहीं। पास के तालाब में गाय पानी पीने के लिए रुक गई। पेड़ों पर गौरेया की चूं-चूं करती आवाज को सुनकर वह आकर्षित हो आगे बढ़ने लगी। दिनभर की उड़ान के बाद घोंसलों की ओर लौटते पक्षी और इन्तजार करते बच्चों बच्चों का शोर ….. मीरा का नन्हां सा दिल ख़ुशी से जोर-जोर से धड़कने लगा। उसका भी मन हुआ उनके इस खेल में शामिल हो जाय। गहरी होती साँझ ने उसने अपना कदम वापस मोड़ लिए। जब मीरा सिवान से गाय लेकर वापस आ रही थी तो उसकी सहेलियां निर्मला, गीता और नीलम स्कूल से किताबों का बस्ता लेकर घर की ओर। मन ही मन वह सोच रही थी इनके बापू कितने अच्छे। मेरी सहेलियां पढ़ लिखकर मास्टर बनेंगी। कोई डाक्टर बनेंगी और मैं गैया चराउंगी। ना ऐसा मैं होने नहीं दूंगी। मीरा ने मन ही मन प्रण कर लिया कि जब तक बापू स्कूल नहीं भेजेंगे वह अन्न का एक दाना ग्रहण नहीं करेगी।…..
घर पहुँचते ही वह अपनी माँ पर बिफर पड़ी। यह लो अपनी गैया व डंडा। हमें चरवाहा नहीं बनना। मीरा की माँ रामकली उसे सीने से लगा पुचकारने लगी, क्या हो गया मेरी दुलारी को। माँ का प्यार पा मीरा गदगद हो गई। उसे लगा जैसे सपनों से भरी मीठी नींद उसे शुभकामनाएं दे रही थी। तभी दादी उसके लिए खाना लेकर आई। मीरा ने थाली को आगे खिसका दिया। बोली-मुझे भूख नहीं। लगता है मेरी लाडली थक गई है। ठीक है चल तुझे आज मैं अपनी हाथों से खिला देती हूँ। मीरा ने अबकी साफ़-साफ़ कह दिया जबतक उसे स्कूल नहीं भेजा जाएगा वह नहीं खाएगी। अचानक! एक महीन सीटी की आवाज उसकी कानों से टकराई। माघ के महीने में उसके भीतर पूस जैसी ठंडी लहर दौड़ गई। यह किसी गौरेया की आवाज नहीं थी। यह उसकी सहेली निर्मला थी। मीरा उसके सामने नहीं पड़ना चाह रही थी। वह ताना मारेगी। पूछेगी मीरा तुम स्कूल क्यों नहीं जा रही हो। अभी वह कहीं भाग पाती कि निर्मला आंगन में दाखिल हो गई। बोली-मीरा कल से मुझे भी तुम्हारे साथ गैया चराने जाना है। काहें क्या हुआ स्कूल नहीं जाओगी? मीरा ने उत्सुकता बस सवाल किये नहीं कि सखी निर्मला का आज से स्कूल जाना बंद। बापू कह रहे थे चिठ्ठी-पत्री लिखना सीख गई। अब स्कूल जाकर क्या करोगी। घर का चौका बर्तन संभालो। एक गाय है उसे सिवान में चराने ले जाया करो। निर्मला की बातों को सुनकर मीरा जैसे शून्य में चली गई। वह कभी अपनी माँ को तो कभी दादी को निहारती। आगे बढ़कर उसने निर्मला का हाथ कसकर पकड़ लिया, फिर उसकी आँखों में आँखे डालकर – हम लड़कियों की जिन्दगी दूसरों के रहमों-करम पर आश्रित है। जब हमारे अवसरों व सपनों को माँ बाप ही मार दे रहे हैं तो आगे किसपर भरोसा करें। आज भी लड़की लड़का में इतना भेद। हे भगवान! अगले जन्म मुझे गौरेया बना देना पर लड़की नहीं। चूं-चूं करने से तो कोई नहीं रोकेगा। आसमान में जी भर के उड़ तो सकूंगी। बगैर बाल हठ किये उसे भरोसा हो गया था कि वह कभी स्कूल नहीं जा पाएगी।
दूसरे दिन चिड़ियों की चहचाहाहट बढ़ती जा रही थी। सूरज अपनी पूरी चमक के साथ सर पर चढ़ आया। मीरा घर के आंगन में बैठकर चिड़ियों को गौर से देख रही थी। इधर से उधर फुदकतीं नन्हीं सी पैरों के बल चीं-चीं की आवाज सुनने की बाद और कुछ देखने और सुनने की हसरत नहीं थी। मगर बगीचे में गौरेया के परिवार को वह कैसे भूल सकती। मीरा की पहली संवेदना तो वहीं से जगी थी। अब निर्मला भी आ चुकी थी। दोनों अपनी-अपनी गैया लेकर सिवान की और निकल गई। बगीचे में गिरे सूखे पत्ते को अपनी पैरों से दबाते हुए दोनों आगे बढ़ रही थीं। दोनों के हाथ में गाय की रस्सियाँ थीं और पीछे-पीछे गाय। गौरेया के घोसले वाले पेड़ के पास आकर मीरा के कदम ठिठक गये। उसने एक पेड़ के जमीन के ऊपर निकले एक सोर से गाय को बाँध दिया। आज चूं-चूं की आवाज उसे सुनाई नहीं दे रही थी। उधर से एक आदमी बागीचे से होकर गुजर रहा था। मीरा को घबड़ाया हुआ देखकर पूछ लिया। बेटी- तुम क्या ढूंढ रही हो। मीरा बोली-चाचा इस पेड़ पर गौरेया का घोसला है। रोज उनकी चहचहाहट से बगीचा गुलजार रहता था। आज उनकी आवाज नहीं सुनाई दे रही। बेटी तुम भी तो गौरेया ही हो। तुम्हारी भी आवाज किसी गौरेया से कम मीठी नहीं। हाँ अंकल, आप सही कह रहे हो, मैं गौरेया ही हूँ पर उड़ नहीं सकती। मैं उड़ना सीखूं उससे पहले ही मेरे पर कतर दिए गए। अब मैं सिर्फ चल सकती हूँ। आकाश नहीं नाप सकती।
आखिर गौरेया नहीं मिली। उसकी आवाज भी नहीं सुनाई दी। निर्मला बोली-मीरा हमें तो लगता है कि तुम पिछले जन्म में इन्हीं घोसले में रहती थी। तभी तो इनके लिए तुम्हारे भीतर इतनी छटपटाहट है। निर्मला तुम भूल रही हो। हम सभी लड़कियां गौरेया ही तो हैं। अगर महसूस करो तो। जब घर के आँगन में महिलायें पथार डालेंगी तभी ये दाना चूंग सकती हैं। यही हाल हमारा है। घर में रखा चीज कुछ खाने जाओ तो माँ कहेगी यह भैया के लिए रखा है। जब हाथ पर मिले तभी खा सकती हैं। …. आखिर इसे क्या कहेंगे। पथार ही तो है हम बेटियों के हिस्से।
धीरे-धीरे शाम होने को थी। दोनों सहेलियां गायों को लेकर घर आ गयीं। थका होने के बाद भी मीरा को नींद नहीं आ रही थी। और मुझे (अजय) को भी नहीं। इस कहानी को आज ही पूरी करने की जिद जो थी। गौरेया तुम कहाँ हो … कहानी की नायिका और लेखक साथ-जग रहे थे। मीरा को गौरेया की चिंता थी तो मुझे कहानी पूरी करने की। गौरेया मीरा की रोम-रोम में बस गई थी। जब भोर हुई तो मीरा दरवाजा की कुण्डी धीरे से खोली और बाहर निकल गई। सड़क, खेत पार कर कच्चे रास्ते पर सन्नाटे को चीर कर बीच-बीच में गौरेया की आवाज को थामे। ( काश! की क्षणिक और उदास जीवन में उठी ये पहली लहर सब कुछ बहा ले जाती। बागीचे की इस सूनेपन में एक ह्रदय, दूसरे ह्रदय की आहटें सुन और समझ पाता…)
चांदनी अभी भी कहीं-कहीं छितराई हुई थी। पेड़ भी नींद में थे और और पगली मीरा नंगे पैर, नसों में दौड़ते हुए गर्म-खून और दिल की कंपकंपाहट को काबू में कर पेड़ की टहनियों को पकड़े चिड़ियों की तरह ऊपर और ऊपर चढ़ती चली जा रही थी। शायद वह गौरेया के घोसले को ढूंढ रही थी। ओस में नहाई गहरी हरी पत्तियां और अलसाई टहनियां। एक चिड़िया बेवक्त मेहमान की आहट सुन फड़फाड़ाने लगी। गिलहरी सरपट नीचे दौड़ गई। कोयल सहेली को पहचानकर दूसरी टहनी पर सरक गई। मीरा के लिए सब कुछ पहचाना हुआ था। इस टहनी पर से उसने कई बार छलांग लगाई थी। उसे पता था कि यह टहनी ऊपर की शाखाओं से जाकर मिलती है। कुछ ही देर में वह गौरेया के घोसला के पास पहुँचने वाली थी।
असली कहानी अब शुरू होती है। धीमे और सधे क़दमों से आखिर वह मंजिल तक पहुँच ही गई। लेकिन यह क्या उस घोसले में तो गौरेया थी ही नहीं। घोसले में गौरेया की निशानी सिर्फ उसके पंख थे। आखिर ये कहाँ गई। मीरा घोसले में हाथ डालना चाही कि अन्दर कुंडली मार बैठा सांप ने लपक कर उसे डंस लिया। अब मीरा समझ चुकी थी कि गौरेया को खा लिया होगा। वह दर्द के मारे चीख रही थी। उसके हाथ ठीले पड़ रहे थे। कुछ ही देर बाद टहनी उसके हाथ से छुट गई। वह धरती की गोंद में जा गिरी। सांप का विष धीरे-धीरे उसके शरीर में फ़ैल रहा था। वह बेहोश हो गई। अब उसका शरीर नीला पड़ने लगा था।
अब सुबह हो चुकी थी। मीरा को घर में न देखकर उसकी मां किसी अनहोनी से घबड़ा गई। काफी खोजबीन के बाद भी उसका पता नहीं चला। निर्मला भी आ चुकी थी। घर के लोग भागे-भागे सिवान की ओर गये। साथ में निर्मला भी थी। बगीचे में पेड़ के पास उसे पड़ा देख सभी चीख पड़े। उसके शरीर में कोई कंपन भी नहीं थी। वह समाधि में लीन किसी योगी की तरह लेटी हुई थी। उसका नब्ज भी स्थिर हो गया था। उसे स्कूल जाने की जिद नहीं थी। अब उसे अपने बापू से भी कोई शिकायत नहीं थी। निर्मला उसके शरीर को झकझोर कर सवाल कर रही थी, गौरेया तुम कुछ बोल क्यों नहीं रही। तुम अपने निर्मला को अकेली छोड़कर क्यों चली गई। आखिर मैं गैया चराने किसके साथ जाउंगी। पर जो सवाल मीरा छोड़कर इस दुनिया से विदा हो गई उसका जवाब किसी के पास नहीं था। लोगों का शोरगुल सुनकर सांप घोसले से जैसे भगा। घोसला मीरा के बदन पर आ गिरा। लोगों ने देखा उसमें भी गौरेया नहीं थी।
अजय पाण्डेय, सुहवल
गाजीपुर

थपकी

***
किसी भी तस्वीर को देखकर लोग अलग-अलग तरह से विचार व्यक्त करते है। हर विचार व्यक्तिगत होता है। अगर किसी को पसंद आ जाए तो अपना लेता है। हर किसी का सपना होता है कि उसकी जिन्दगी सूरज की तरह हो। दुःख हो या सुख एकरूपता बना रहे। मेरे साथ उल्टा है। मेरे लिए तो जिन्दगी ही सबसे बड़ा सपना है। सबसे बड़ा प्रेरणाश्रोत है। इसके सामने रात में आने वाले सपने भी बहुत छोटे हैं.... अधूरे हैं....।
महज तीन साल की उम्र में थपकी की माँ नहीं रही। अब उसका देखभाल कौन करता। बाप भी शराबी। थपकी की मौसी रंजना उसे अपने साथ जबलपुर लेते गई। उसका लालन-पालन अब रंजना ही कर रही थी। धीरे-धीरे थपकी बड़ी होने लगी। वह रंजना को ही अपनी माँ समझती। रंजना कहती कि मैं तो तेरी मौसी हूँ। तब मेरी माँ कहाँ है- बता न मौसी। 
तुम्हारी माँ आसमान में है। चाँद-तारों के साथ। 
वह वहां क्या कर रही है। मेरे साथ क्यों नहीं है। 
वह वहीं से तुझे देख रही है। तेरा देखभाल करने के लिए मेरे पास छोड़ गई है। 
पर उस माँ को मैं तो नहीं देख सकती न। वह मेरे पास कब आएगी। मेरी माँ को जल्दी बुलाओ न मौसी। उससे कह देना कि अगर वह नहीं आई तो मैं खुद उसके पास जाउंगी। थपकी के इस तरह के सवालों से रंजना घबडा जाती। उसे समझाने का प्रयास करती। रंजना की बातों से संतुष्ट हो थपकी फिर अपने कामों में लग जाती।
रंजना काफी धार्मिक महिला थी। पूजा-पाठ किये बगैर अन्न का एक दाना भी मुंह में नहीं डालती। एक दिन घर के आंगन में वह सूर्य देव को जल दे रही थी। थपकी भी वहीं पास कड़ी था। रंजना को जल गिराते देख थपकी भी सूर्य देव की और मुंह कर जल गिराने लगी। थपकी की चंचलता देख रंजना का भी बाल मन उमड़ने घुमड़ने लगता। 
रंजना ने थपकी से पूछा की सूर्य देव से तुमने क्या माँगा है। यही सवाल थपकी ने रंजना से किया। रंजना ने तपाक से कहा-तुम्हारी और तुम्हारी माँ की सलामती। अबोध थपकी में मन में यह बात अन्दर तक समा गई। अब वह प्रतिदिन सूर्य देव को जल देने लगी। सूरज को प्रणाम करते हुए कहती मेरी माँ आकाश में चाँद तारों के पास है। उसे सलामत से रखना। मेरी माँ से कहना थपकी तुम्हे बहुत याद करती है। उसे मेरे पास कब भेजेंगे। माँ तुम बहुत याद आती हो। अब तो थपकी को पूर्ण विश्वास हो चूका था कि सूर्य देव एक दिन उसकी माँ से जरुर मिलवा देंगे। 
धीरे-धीरे थपकी बड़ी होती गई। इसके साथ ही समझदारी भी आने लगी। 16 वसंत देख चुकी थपकी आत्म विश्वास से भरी थी। थपकी की माँ नहीं आई पर उसने सूर्य को जल देना नहीं छोड़ा। 
थपकी को बड़ा होता देख उसकी मौसी रंजना भी शादी को लेकर परेशान रहती। समय से कोई अच्छा लड़का मिल जाय बस झट से हाथ पीले कर दूँ। वह मन ही मन सोच रही थी। जब रंजना दसवीं में थी तभी शादी हो गई थी। इसके बाद वह बनारस से जबलपुर आ गई। थपकी तो 12वीं में पढ़ रही है। रंजना ने अपने अध्यापक पति अनिल से थपकी के लिए लड़का ढूंढने के लिए बोली। अनिल इसके लिए तैयार नहीं था। वह चाहता था कि थपकी आगे की पढ़ाई जारी रखे। जब उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद पैरों पर खड़ी हो जायेगी तब शादी करना ठीक रहेगा।
रंजना की जिद के आगे अनिल को झुकना पडा। क्या सच में लड़कियां बोझ होती है? क्या लडकियों को पढने का कोई अधिकार नहीं? अगर थपकी की माँ होती तो क्या उसे पढ़ाई पूरी करने नहीं देती?तमाम तरह के सवाल अनिल के मन में उमड़-घुमड़ रहा था। आखिर उसका बाप तो है। इतने दिन हो गये। अबतक थपकी की खोज खबर भी लेने नहीं आया...और हाँ थपकी भी उसे कभी याद नहीं करती। याद करती भी कैसे रंजना ने उसे सब बताया था कि उसके बापू उसकी माँ को जरा सी बातों पर कैसे पिटाई करते थे। उसकी माँ ने बहुत जुल्म सहे। हे भगवान! किसी महिला को यैसा बेरहम पति मत देना। 
थपकी को जब पता चला कि उसकी शादी के लिए लड़का देखा जा रहा है तो वह परेशान हो गई। वह रंजना के कमरे में गई। अनिल भी वहीँ बैठा हुआ था। 
थपकी तपाक से बोली-मौसी क्या मैं तुम्हारी बेटी नहीं हूँ इसलिए मुझे जल्दी से विदा कर देना चाहती हो। क्या मेरी माँ के आने का इन्तजार नहीं करोगी। क्या तुम नहीं चाहती कि मेरी माँ इस आंगन से मुझे ख़ुशी-ख़ुशी विदा करे। थपकी ने रंजना के सामने सवालों की झड़ी लगा थी। उसकी इन बातों पर रंजना को जैसे काठ मार गया। थपकी की तरफ देखी तो बस देखती रह गयी। इन सवालों का उत्तर न पाकर थपकी की आँखों में आंसूं आ गये। थपकी को रोता देख रंजना और अनिल की आँखे भी नम हो गई। रंजना ने दौड़कर थपकी को गले से लगा लिया। उसे समझाने का प्रयास करती। हम औरतों की किस्मत ही यैसी है। अपना कोई घर नहीं। बचपन में माँ और बापू का घर। जब थोड़ी समझदारी आई तो पति का घर... और बुढापे में .. अब बस भी कर मौसी। तपाक से थपकी बोल उठी। मुझे ज्ञान की बातें न बता। अगर मैं तेरे लिए बोझ हो गई तो जल्दी से कर दे मेरी शादी।
मौसी मुझे अब पता चला कि लड़कियां पराई होतीं हैं। मैं कितना मूर्ख कि 21वीं सदी में जी रही हूँ।। मैं सचमुच घर से निकालने योग्य हो गयी हूँ। मुझे पढ़ा-लिखाकर क्या करोगी। अब कर दो मुझे दूसरे के हवाले।। मुझे अब यह भी पता है कि मेरी माँ नहीं है। अगर रहती भी तो क्या करती। वही करती जो आज तुम कर रही हो। 
किसी मृत अपनों से अटूट भावनात्मक संबंधों को जीने के भाव पर भी थपकी प्रहार करती है। उसका विवेक रंजना के तर्कसंगत को पूरी तरह नकार नहीं पाता। 
अनिल थपकी को समझाते हुए कहता है-तुम एक लड़की होने से पहले मनुष्य हो। मनुष्य न तो सिर्फ पुरुष है और न सिर्फ स्त्री ही... दोनों मिलकर एक होते हैं। 
लेकिन मैं अबतक माँ के सहारे ज़िंदा थी। बचपन में जैसा की मौसी ने बताया था कि मेरी माँ आकाश में चाँद-तारों के साथ है। बड़ी हुई तो यह एहसास हुआ कि कोई मनुष्य चाँद-तारों पर कैसे रह सकता है। माँ शब्द से मेरा भावनात्मक लगाव हो गया। अब वह माँ मेरे ह्रदय में, मेरी साँसों में भावनातमक रूप से रहने लगी। मौसी ने भी माँ का प्यार दिया....पर ज़िंदा रही आशा के सहारे। वह आशा भी मुझे मौसी ने ही दी। माँ के आने की आशा। 
असमय अगर बादलों की ओट में सूर्य अस्त हुआ सा लगे तो क्या अन्धकार ही सत्य हो जाएगा? अगर प्रभात में, आकाश में अरुण प्रकाश छा जाए तो क्या आँखों को बंद कर हम कह सकेंगे कि अब भी अन्धकार है? मैं तो प्रभात पर ही विश्वास कर अबतक रातें बिताते आई हूँ। 
अब अपने जीवन का फैसला मौसी और मौसा पर छोडती हूँ।
आखिर वह दिन आ ही गया। जिसका रंजना को इन्तजार रहा। थपकी के लिए लड़का मिल गया। सुन्दर, सुशील के साथ प्राइवेट नौकरी वाला। वेतन इतना कि एक परिवार का गुजर-बसर आराम से हो जाय। दान-दहेज़ की कोई माग भी नहीं। बस क्या था। रंजना यह मौक़ा खोना नहीं चाहती थी। बस चट मंगनी पट विवाह। दोनों तरफ विवाह की तैयारियां होने लगी। घर में मंगल गीत की गूंज थी। इधर थपकी के आँखों के आंसूं रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था। विवाह के हर रश्म पर उसे माँ की याद आती। मुंह से गर्म सांस भरते हुए.... बापू को माँ से झगड़ा था। आखिर मैं उनकी ही तो बेटी हूँ। मुझे उन्होंने क्यों भुला दिया। माँ तो इस दुनियां में नहीं है। बापू रहते हुए भी नहीं हैं। आज मैं अनाथ और दुनियां की सबसे अभागिन लड़की। आखिर जब दूसरों के हालत पर ही छोड़ना था तो पैदा क्यों किया? 
31 मई को शादी का दिन था। मई के अंतिम दिन साल के सबसे लम्बे दिन होते हैं। बैंड बाजों के साथ बरात आ गई। पहले मंत्रोचार के बीच द्वारपूजा फिर शादी की रश्म पूरी हुई। सुबह जब विदाई का समय हुआ तो लड़का एक शर्त रख दी। पहले वह थपकी से मिलेगा फिर विदाई होगी। थपकी के मौसा-मौसी परेशान हो गये। आखिर बात क्या है। अगर पहले से कोई शर्त थी तो शादी के पहले लड़के (मनीष) ने बताया क्यों नहीं?
थपकी को मनीष उसके जीवन का सबसे बड़ा उपहार देना चाहता था। वह चाहता था कि जब उसकी थपकी यहाँ से विदा हो तो उसे लगे कि वह ससुराल नहीं बल्कि अपने घर जा रही है। 
वह थपकी से मिलने उसके कमरे में गया। वह लाल जोड़े में सिर झुकाए बैठी थी। मनीष के साथ रंजना और अनिल भी था। उसके पीछे मनीष के माता-पिता। 
मनीष अपनी माँ का हाथ पकड कर थपकी के पास ले आया। थपकी खड़ी हो गयी। मनीष ने अपनी माँ की तरफ इशारा करते हुए कहा- थपकी यही तुम्हारी माँ है। समझो तुम्हारी माँ चाँद तारों को छोड़कर तुम्हारे पास आ गई। सूर्य देव ने तम्हारी सुन ली। इसलिए तो तुम्हारी माँ को वापस तुम्हारे पास भेज दिया। इस आंगन से तुम्हारी माँ तुम्हे विदा करेगी। यह माँ अब सदा तुम्हारे साथ रहेगी। थपकी का हाँथ पकड कर अपने बापू के हाँथ में देते हुए मनीष ने कहा... और ये हैं तुम्हारे बापू।
फिर क्या था, थपकी अपनी माँ से लिपट कर रोने लगी। माँ तुम मुझे छोड़कर क्यों चली गई थी? मैंने 16 साल बिना माँ के कैसे बिताये तुम्हे क्या पता। थपकी की माँ भी रो रही थी। बेटी थपकी अब मैं कभी तुम्हे अपनों से दूर नहीं होने दूंगी। एक माँ और बेटी का बिरह मिलन देख वहां मौजूद सभी की आँखे भर आई।
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर