रेहाना की घर वापसी
काशी का पुराना अस्सी घाट बिजली की दूधिया रोशनी से नहा रहा था। गंगा आरती खत्म होने के बाद पंडित नीलमणि अभी कुछ आगे ही बढ़े थे कि बगल में पेड़ के पास चबूतरे पर बैठी एक महिला की ओर नजर गई। वह ठिठक गए। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह वही रेहाना है, जिससे वर्षों पहले प्रेम करता था। माथे पर सिंदूर और हिन्दू महिला के परिधान में उसे देखकर कुछ शक भी हुआ। उस महिला की गोद में एक बच्ची भी थी। बगल में हट्ठा-कट्ठा बैठा एक नौजवान पुरुष रेहाना से बातें कर रहा था। अब घाट से अधिकतर लोग जा चुके थे। इक्का-दुक्का ही लोग बैठे थे। वह साहस कर जिस चबूतरे पर रेहाना थी, जाकर बैठ गया।
रेहाना भेलपूरी खा रही थी। बगल में बैठे युवक पर जब नजर गई तो उसके हाथ कांपने लगे। वह घबरा सी गई। उसकी आंखों में जैसे धुआं भर गया हो। इसके बाद उसकी आंखें भर आईं। शायद वह अतीत की यादों को इन आंसुओं से श्रद्धांजलि दे रही थी। दोनों एक दूसरे को कभी तिरछी नजर से देखते तो कभी आंखें नीचे कर लेते। नीलमणि से बातें करने के लिए रेहाना उत्सुकथी। पास में बैठा उसका पति और किसी अनहोनी की डर से वह साहस भी नहीं जुटा पा रही थी। नीलमणि उसका पहला प्यार जो था। कभी उसके सुख-दुख का साथी था।
रेहाना का मन अब उड़ रहा था। जैसे जिंदगी इतनी कभी खूबसूरत नहीं थी जितनी आज। हवा में एक अजीब सी छुवन थी, एक अजीब सा दर्द भी। साहस करके उसने पूछ दिया। कहीं तुम नीलमणि तो नही?
हां मैं नीलमणि हूं... और तुम रेहाना?
रेहाना ने सिर हिलाकर हामी भर दी।
पास में बैठा रेहाना का पति मुकेश उसकी तरफ देखने लगा। अभी वह कुछ कहता कि इससे पहले ही रेहाना ने नीलमणि का परिचय देते हुए कहा कि यह मेरे बचपन का दोस्त है। हम एक ही मुहल्ले में रहते थे। कक्षा एक से आठवीं तक साथ पढ़े। बाद में अब्बू ने मुझे आगे नहीं पढ़ने दिया।
नीलमणि अब पंडित नीलमणि बन चुका था। उसने मुकेश को अपना विजटिंग कार्ड देते हुए कहा, कभी मेरे यहां भी जरूर आना।
मुकेश ने सिर हिलाते हुए - क्यों नहीं, जरूर आउंगा।
रेहाना अपने पति मुकेश के साथ वहां से जाने लगी। नीलमणि बहुत ध्यान से रेहाना को निहार रहा था। वह भी पीछे मुड़कर तब तक नीलमणि को देखती रखती रही, जब तक कि वह आंखों से ओझल नहीं हो गया।
मुकेश भी उधर डरा सहमा हुआ था। वह मन में ही सोच रहा था कि नीलमणि इन चार वर्षों में उससे कभी नहीं मिला था। छुट्टियों में वह रेहाना के साथ अक्सर अस्सी घाट पर जाता था। फिर अचानक आज कैसे मुलाकात हो गई। गाजीपुर के जमानियां से यहां आए हुए चार साल हो गए। यह चार साल कब गुजर गया पता ही नहीं चला। घर पर किसी की कोई खोज खबर नहीं। आखिर घर वाले कैसे होंगे। कमरे पर पहुंचने के बाद मुकेश रेहाना से नीलमणि के बारे में पूछने लगा। रेहाना भी मुकेश को अपना सब कुछ दे बैठी थी। मुकेश ने भी तो दूसरे धर्म का होते हुए भी उसे अपनाया। अब ऐसे में वह मुकेश से झूठ कैसे बोल सकती। उसने फैसला किया कि वह नीलमणि के बारे में मुकेश से सब कुछ बता देगी।
रेहाना चाय का प्याला लेकर आई। दोनों चाय पीने लगे। वह घबड़ाए हुए थी। उसके होंठ कांप रहे थे। चाय की चुश्कियों के साथ उसने अपनी बात रखनी शुरू कर दी। मुकेश भी उसकी बातों को ध्यान से सुन रहा था। नीलमणि व रेहाना में खूब दोस्ती थी। तब यह भी ज्ञान नहीं था कि लड़का और लड़की में दोस्ती का मतलब कुछ और भी होता है। कई बार जब नीलमणि के घर जाती थी तो उसके पिताजी व बड़े भाई डांट कर भगा देते थे। कहते थे कि यह ब्राह्मण का घर है। तुम मुस्लिम वर्ग से हो। मेरे घर मत
आया करो। नीलमणि का साथ भी छोड़ दो। तब मैं घर जाकर बहुत रोई थी। जब मां को यह बात पता चला तो उसने भी नीलमणि को मेरे घर आने पर प्रतिबंध लगा दिया। कहा, यह ब्राह्मण होते बड़े खतरनाक हैं। इनका टीका लंबा जरूर होता है पर विचार बहुत छोटा। ये जोड़ने की नहीं तोड़ने की बात करते हैं। अगर अल्लाह ने मुस्लिम बना ही दिया तो इसमें मेरा कौन सा पाप। पहले मैं भी तो हिन्दू परिवार से ही थी। मुस्लिम से शादी हो जाने के बाद आज मुस्लिम हूं। अल्लाह न ऐसा करे लेकिन अगर कल को रेहाना का किसी हिन्दू परिवार के साथ संबंध जुड़ जाए तो क्या यही ब्राह्मण परिवार वाले उसे अपने घर नहीं आने देंगे। उसे नकार देंगे। तब तो कहेंगे कि रेहाना की घर वापसी हुई है। पहले इसकी मां हिन्दू थी। अब उसकी बेटी फिर से हिन्दू परिवार से जुड़ गई।
रेहाना ध्यान से अपनी मां की बातंे सुन रही थी। उसने प्रण किया कि कुछ भी हो जाए वह नीलमणि का साथ कभी नहीं छोड़ेगी। अब घर की बजाय स्कूल में वह नीलमणि से मिलती रही। दोनों को जैसे घरवालों की परवाह ही नहीं। आखिर एक दिन इन दोनों के घरवालों को इस बात का पता चल ही गया कि दोनों अब घर की बजाय स्कूल में मिलते-जुलते हैं। रेहाना के घर वालों ने उसे स्कूल जाने से ही रोक दिया। उसके घरवालों का यह फैसला उसके माथे पर लगे कलंक से भी बड़ा था। आज के समय में जहां लोग बेटियों को पढ़ाने की बात करते हैं। वहीं उसे स्कूल से बेदखल कर दिया गया। उधर, नीलमणि के घर वालों ने उसे काशी में संस्कृत की पढ़ाई के लिए आश्रम में भेज दिया। बनारस आने के बाद नीलमणि यहां एक आचार्य की देखरेख में संस्कृत की पढ़ाई करने लगा।
नीलमणि के काशी आ जाने के बाद रेहाना तनहाई में रहने लगी। वह अक्सर उदास सी रहती थी। उसे लगता जैसे अब उसकी जिंदगी खत्म। अभी वह खुले आकाश में उड़ना ही चाह रही थी की उसके पंख कतर दिए गए। उसे नहीं पता था कि इस बेमेल दोस्ती की इतनी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। उसे हर वक्त लगता जैसे नीलमणि यही कहीं है। उसकी आवाज कानों में गूंज रही है। फिर वह परेशान होकर इधर-उधर देखने लगती। जब नीलमणि नहीं दिखता तो उसकी आंखों से आंसू बह उसकी गालों को धपकी देती। मानों उसे कह रही है कि रेहाना अब तुम उसे भूल जाओ। नीलमणि और तुम्हारी दोस्ती इतने ही दिनों के लिए थी। वह अपने दुपट्टा से आंसू पोछकर लंबी सांस खिंचती जैसे इस जमाने से उसे बहुत शिकायतें हों पर सुनने वाला कोई नहीं। इसी बीच उसके मन में कई विचार उमड़ घुमड़ रहे थे। अगर उससे कोई बात भी करता तो लगता कि वह उसे काट खाने को दौड़ रहा है।
रेहाना के मुहल्ले में ही एक गरीब ब्राह्मण परिवार रहता था। ब्राह्मण होते हुए भी मुस्लिम रेहाना के घर उनके परिवार के सदस्यों का आना जाना लगा रहता था। रेहाना खाते-पीते घर से थी। उसके पिता लेखपाल थे। वेतन के अलावा ऊपर से भी कुछ झटक लेते थे। वैसे झटका मुसलमान में हराम है पर झटकने में कोई पाप नहीं। गरीब ब्राह्मण परिवार से तीर्थराज तिवारी पहले पुरोहित का कार्य करता था। जब इससे तंगी दूर नहीं हुई तो पान का दुकान खोल ली। इस दुकान से भी उतनी आमदनी नहीं हो पाती कि उसके परिवार का ठीक से गुजर बसर हो जाए। जब कभी भी किसी चीज की जरूरत होती तो रेहाना के घर से मांग कर काम चलता। रेहाना की मां भी कोमल हृदय की महिला थी। मुहल्ले में किसी के घर कोई परेशानी होती तो वह तुरंत पहुंच जाती। यही रिश्ता तीर्थराज तिवारी के घर से भी था। चावल आटा से सौ- दो सौ रुपये नकदी की भी जरूरत पड़ती थी रेहाना की मां के घर तीर्थराज अपनी पंडिताइन को भेजता। वैसे भी गरीबों की कोई जाति या धर्म नहीं होती, जहां उसकी जरूरतें पूरी हों वहीं उसके लिए काबा और काशी। तीर्थराज तिवारी का साला मुकेश अपने दीदी व जीजा के घर आया -जाया करता था। इस दौरान रेहाना के संपर्क में वह आया। दोनों छुप-छुप कर मिलने लगे। इसमें मुकेश की दीदी भी उसका साथ देती थी। लेकिन उसे भी नहीं पता था कि मुकेश और रेहाना के संबंधों को वह जिस तरह से अपनी मौन स्वीकृति दे रही है उसका अंजाम उसके लिए सिरदर्द हो जाएगा। हुआ भी यही। मुकेश काशी में रहने वाले अपने एक दोस्त से बात करके रेहाना को भगा ले गया।
दूसरे दिन दोनों नीलमणि से मिलने बताये पते पर गए। रेहाना ने नीलमणि से सबकुछ बता दिया। कहा कि कोर्ट में हम लोगों ने शादी भी कर ली है। नीलमणि भी रेहाना के चेहरे की खुशी को बिखरने नहीं देना चाहता था। नीलमणि ने मुकेश और रेहाना को मंदिर में हिन्दू रीति रिवाज से शादी करने की सलाह दी। रेहाना भी तैयार थी। मुकेश ने भी गरदन हिलाकर अपनी हामी भर दी। इसके साथ ही उसने एक सलाह दी। जीवन जीने के लिए सिर्फ किसी धर्म के रिवाज की जरूरत नहीं होती। किसी रिवाज को धारण कर लेने से अस्तित्व का बोध नहीं होता। इसके लिए आश्वक्तिबोध ज्यादा जरूरी है। यह मिलेगा आभास होने में।
काशी के अस्सी घाट पर रेहाना और मुकेश के विवाह की तैयारियां शुरू हुई। कुछ हिन्दू धर्म वालों को पता चला तो वहां अपना बैनर व पोस्टर भी लगवा दिया। रेहाना की धर्म वापसी हो रही है। मुस्लिम होकर हिन्दू लड़के के साथ शादी कर रही है। यहीं से शुरू हो जाता है दोनों की हंसती-खेलती जिंदगी को बर्बाद करने का खेल। जब यह बात मुस्लिम वर्ग के लोगों को पता चली तो इसका विरोध शुरू कर दिया। दोनों के प्यार पर पहरा लग गया। इनकी पहचान वायरल न हो जाय इसके लिए दोनों ने बनारस से कहीं और भागने की योजना बनायी। हिन्दी-मुस्लिम संगठनों ने किराये के मकान की तरह इनकी जिंदगी भी किराये की बना दी। उधर, नीलमणि भी परेशान था। मामला इतना बिगड़ जाएगा इसका उसे जरा सा भी आभास नहीं था। वह मन ही मन सोच रहा था कि शायद मुकेश सच ही कर रहा था कि जीवन जीने के लिए सिर्फ किसी धर्म के रिवाज की जरूरत नहीं होती।
मुकेश और रेहाना किसी दूसरे शहर जाने के लिए घर से निकल लिए। कैंट रेलवे स्टेशन के लिए आटो रिक्शा किया। उधर, पुलिस भी किसी अनहोनी के डर से दोनों के पीछे पड़ी थी। आखिरकार पुलिस ने दोनों को हिरासत में ले लिया। यह बात शहर में आग की तरह फैल गई। धर्म के ठेकेदारों ने शहर में जुलूस निकाला। पत्थरबाजी की। हिन्दू वर्ग के लोग इस शादी को करवाने पर आमादा थे। मुसलिम वर्ग के लोग चाह रहे थे कि यह शादी न हो। भीड़ बेकाबू हो गई। इसी भीड़ में से किसी ने पत्थर मारा और मुकेश के सिर पर जा लगी। वह जख्मी हो वहीं गिर पड़ा ...। जख्म से वह जमीन पर पड़ा कराह रहा था। रेहाना दहाड़े मार रोने लगी। कभी धर्म के ठेकेदारों को कोसती तो कभी खुद को। वह चिल्ला रही थी। डॉक्टर को बुलाओ। कोई इसे अस्पताल ले चलो। हमें नहीं करनी शादी लेकिन मेरे मुकेश को तो बचा लो। रेहाना के अश्कों का उस भीड़ पर कोई असर नहीं था। तभी किसी ने एक और पत्थर मारी मुकेश के सिर पर। मुकेश के मंुह से आह की आवाज निकली। उसने जोर से चिल्लाया। मैं फिर आउंगा। एक और मजहबी दंगे का मुझे इंतजार रहेगा। मुझे कितनी बार मारोगे। एक मुकेश मारोगे कई मुकेश पैदा होंगे। एक रेहाना विधवा हो जाएगी। उसे अपनाने के लिए हजारों नीलमणि आगे आएंगे। मुकेश ने नीलमणि की ओर आशा भरी निगाह से देखा। रेहाना को अपनाने का आश्वासन चाहता था। देखो नीलमणि यह रेहाना तुम्हारी थी। तुम्हारी रहेगी। मैं तो सिर्फ एक माध्यम बनकर आया था। अब जा रहा हूं। अगर तुम इसे अपना लोगे तो समझुंगा रेहाना की अब असली घर वापसी हुई है। नीलमणि भी तैयार हो गया। मुकेश की बेटी को उसने गले लगा लिया। तपती दुपहरी की चादर ढलती शाम के आईने में एक जीवंत सच्चाई को उजागर कर रही थी। एक उड़ता परिंदा सदा के लिए खामोश होना चाह रहा था। इस दुनिया को अलबिदा कहना चाह रहा था। इतने में मुकेश के बदन ढीले पड़ गए। रेहाना और नीलमणि फूट-फूट कर रोने लगे। अब भीड़ भी वहां से छट गई थी।
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर
काशी का पुराना अस्सी घाट बिजली की दूधिया रोशनी से नहा रहा था। गंगा आरती खत्म होने के बाद पंडित नीलमणि अभी कुछ आगे ही बढ़े थे कि बगल में पेड़ के पास चबूतरे पर बैठी एक महिला की ओर नजर गई। वह ठिठक गए। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह वही रेहाना है, जिससे वर्षों पहले प्रेम करता था। माथे पर सिंदूर और हिन्दू महिला के परिधान में उसे देखकर कुछ शक भी हुआ। उस महिला की गोद में एक बच्ची भी थी। बगल में हट्ठा-कट्ठा बैठा एक नौजवान पुरुष रेहाना से बातें कर रहा था। अब घाट से अधिकतर लोग जा चुके थे। इक्का-दुक्का ही लोग बैठे थे। वह साहस कर जिस चबूतरे पर रेहाना थी, जाकर बैठ गया।
रेहाना भेलपूरी खा रही थी। बगल में बैठे युवक पर जब नजर गई तो उसके हाथ कांपने लगे। वह घबरा सी गई। उसकी आंखों में जैसे धुआं भर गया हो। इसके बाद उसकी आंखें भर आईं। शायद वह अतीत की यादों को इन आंसुओं से श्रद्धांजलि दे रही थी। दोनों एक दूसरे को कभी तिरछी नजर से देखते तो कभी आंखें नीचे कर लेते। नीलमणि से बातें करने के लिए रेहाना उत्सुकथी। पास में बैठा उसका पति और किसी अनहोनी की डर से वह साहस भी नहीं जुटा पा रही थी। नीलमणि उसका पहला प्यार जो था। कभी उसके सुख-दुख का साथी था।
रेहाना का मन अब उड़ रहा था। जैसे जिंदगी इतनी कभी खूबसूरत नहीं थी जितनी आज। हवा में एक अजीब सी छुवन थी, एक अजीब सा दर्द भी। साहस करके उसने पूछ दिया। कहीं तुम नीलमणि तो नही?
हां मैं नीलमणि हूं... और तुम रेहाना?
रेहाना ने सिर हिलाकर हामी भर दी।
पास में बैठा रेहाना का पति मुकेश उसकी तरफ देखने लगा। अभी वह कुछ कहता कि इससे पहले ही रेहाना ने नीलमणि का परिचय देते हुए कहा कि यह मेरे बचपन का दोस्त है। हम एक ही मुहल्ले में रहते थे। कक्षा एक से आठवीं तक साथ पढ़े। बाद में अब्बू ने मुझे आगे नहीं पढ़ने दिया।
नीलमणि अब पंडित नीलमणि बन चुका था। उसने मुकेश को अपना विजटिंग कार्ड देते हुए कहा, कभी मेरे यहां भी जरूर आना।
मुकेश ने सिर हिलाते हुए - क्यों नहीं, जरूर आउंगा।
रेहाना अपने पति मुकेश के साथ वहां से जाने लगी। नीलमणि बहुत ध्यान से रेहाना को निहार रहा था। वह भी पीछे मुड़कर तब तक नीलमणि को देखती रखती रही, जब तक कि वह आंखों से ओझल नहीं हो गया।
मुकेश भी उधर डरा सहमा हुआ था। वह मन में ही सोच रहा था कि नीलमणि इन चार वर्षों में उससे कभी नहीं मिला था। छुट्टियों में वह रेहाना के साथ अक्सर अस्सी घाट पर जाता था। फिर अचानक आज कैसे मुलाकात हो गई। गाजीपुर के जमानियां से यहां आए हुए चार साल हो गए। यह चार साल कब गुजर गया पता ही नहीं चला। घर पर किसी की कोई खोज खबर नहीं। आखिर घर वाले कैसे होंगे। कमरे पर पहुंचने के बाद मुकेश रेहाना से नीलमणि के बारे में पूछने लगा। रेहाना भी मुकेश को अपना सब कुछ दे बैठी थी। मुकेश ने भी तो दूसरे धर्म का होते हुए भी उसे अपनाया। अब ऐसे में वह मुकेश से झूठ कैसे बोल सकती। उसने फैसला किया कि वह नीलमणि के बारे में मुकेश से सब कुछ बता देगी।
रेहाना चाय का प्याला लेकर आई। दोनों चाय पीने लगे। वह घबड़ाए हुए थी। उसके होंठ कांप रहे थे। चाय की चुश्कियों के साथ उसने अपनी बात रखनी शुरू कर दी। मुकेश भी उसकी बातों को ध्यान से सुन रहा था। नीलमणि व रेहाना में खूब दोस्ती थी। तब यह भी ज्ञान नहीं था कि लड़का और लड़की में दोस्ती का मतलब कुछ और भी होता है। कई बार जब नीलमणि के घर जाती थी तो उसके पिताजी व बड़े भाई डांट कर भगा देते थे। कहते थे कि यह ब्राह्मण का घर है। तुम मुस्लिम वर्ग से हो। मेरे घर मत
आया करो। नीलमणि का साथ भी छोड़ दो। तब मैं घर जाकर बहुत रोई थी। जब मां को यह बात पता चला तो उसने भी नीलमणि को मेरे घर आने पर प्रतिबंध लगा दिया। कहा, यह ब्राह्मण होते बड़े खतरनाक हैं। इनका टीका लंबा जरूर होता है पर विचार बहुत छोटा। ये जोड़ने की नहीं तोड़ने की बात करते हैं। अगर अल्लाह ने मुस्लिम बना ही दिया तो इसमें मेरा कौन सा पाप। पहले मैं भी तो हिन्दू परिवार से ही थी। मुस्लिम से शादी हो जाने के बाद आज मुस्लिम हूं। अल्लाह न ऐसा करे लेकिन अगर कल को रेहाना का किसी हिन्दू परिवार के साथ संबंध जुड़ जाए तो क्या यही ब्राह्मण परिवार वाले उसे अपने घर नहीं आने देंगे। उसे नकार देंगे। तब तो कहेंगे कि रेहाना की घर वापसी हुई है। पहले इसकी मां हिन्दू थी। अब उसकी बेटी फिर से हिन्दू परिवार से जुड़ गई।
रेहाना ध्यान से अपनी मां की बातंे सुन रही थी। उसने प्रण किया कि कुछ भी हो जाए वह नीलमणि का साथ कभी नहीं छोड़ेगी। अब घर की बजाय स्कूल में वह नीलमणि से मिलती रही। दोनों को जैसे घरवालों की परवाह ही नहीं। आखिर एक दिन इन दोनों के घरवालों को इस बात का पता चल ही गया कि दोनों अब घर की बजाय स्कूल में मिलते-जुलते हैं। रेहाना के घर वालों ने उसे स्कूल जाने से ही रोक दिया। उसके घरवालों का यह फैसला उसके माथे पर लगे कलंक से भी बड़ा था। आज के समय में जहां लोग बेटियों को पढ़ाने की बात करते हैं। वहीं उसे स्कूल से बेदखल कर दिया गया। उधर, नीलमणि के घर वालों ने उसे काशी में संस्कृत की पढ़ाई के लिए आश्रम में भेज दिया। बनारस आने के बाद नीलमणि यहां एक आचार्य की देखरेख में संस्कृत की पढ़ाई करने लगा।
नीलमणि के काशी आ जाने के बाद रेहाना तनहाई में रहने लगी। वह अक्सर उदास सी रहती थी। उसे लगता जैसे अब उसकी जिंदगी खत्म। अभी वह खुले आकाश में उड़ना ही चाह रही थी की उसके पंख कतर दिए गए। उसे नहीं पता था कि इस बेमेल दोस्ती की इतनी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। उसे हर वक्त लगता जैसे नीलमणि यही कहीं है। उसकी आवाज कानों में गूंज रही है। फिर वह परेशान होकर इधर-उधर देखने लगती। जब नीलमणि नहीं दिखता तो उसकी आंखों से आंसू बह उसकी गालों को धपकी देती। मानों उसे कह रही है कि रेहाना अब तुम उसे भूल जाओ। नीलमणि और तुम्हारी दोस्ती इतने ही दिनों के लिए थी। वह अपने दुपट्टा से आंसू पोछकर लंबी सांस खिंचती जैसे इस जमाने से उसे बहुत शिकायतें हों पर सुनने वाला कोई नहीं। इसी बीच उसके मन में कई विचार उमड़ घुमड़ रहे थे। अगर उससे कोई बात भी करता तो लगता कि वह उसे काट खाने को दौड़ रहा है।
रेहाना के मुहल्ले में ही एक गरीब ब्राह्मण परिवार रहता था। ब्राह्मण होते हुए भी मुस्लिम रेहाना के घर उनके परिवार के सदस्यों का आना जाना लगा रहता था। रेहाना खाते-पीते घर से थी। उसके पिता लेखपाल थे। वेतन के अलावा ऊपर से भी कुछ झटक लेते थे। वैसे झटका मुसलमान में हराम है पर झटकने में कोई पाप नहीं। गरीब ब्राह्मण परिवार से तीर्थराज तिवारी पहले पुरोहित का कार्य करता था। जब इससे तंगी दूर नहीं हुई तो पान का दुकान खोल ली। इस दुकान से भी उतनी आमदनी नहीं हो पाती कि उसके परिवार का ठीक से गुजर बसर हो जाए। जब कभी भी किसी चीज की जरूरत होती तो रेहाना के घर से मांग कर काम चलता। रेहाना की मां भी कोमल हृदय की महिला थी। मुहल्ले में किसी के घर कोई परेशानी होती तो वह तुरंत पहुंच जाती। यही रिश्ता तीर्थराज तिवारी के घर से भी था। चावल आटा से सौ- दो सौ रुपये नकदी की भी जरूरत पड़ती थी रेहाना की मां के घर तीर्थराज अपनी पंडिताइन को भेजता। वैसे भी गरीबों की कोई जाति या धर्म नहीं होती, जहां उसकी जरूरतें पूरी हों वहीं उसके लिए काबा और काशी। तीर्थराज तिवारी का साला मुकेश अपने दीदी व जीजा के घर आया -जाया करता था। इस दौरान रेहाना के संपर्क में वह आया। दोनों छुप-छुप कर मिलने लगे। इसमें मुकेश की दीदी भी उसका साथ देती थी। लेकिन उसे भी नहीं पता था कि मुकेश और रेहाना के संबंधों को वह जिस तरह से अपनी मौन स्वीकृति दे रही है उसका अंजाम उसके लिए सिरदर्द हो जाएगा। हुआ भी यही। मुकेश काशी में रहने वाले अपने एक दोस्त से बात करके रेहाना को भगा ले गया।
दूसरे दिन दोनों नीलमणि से मिलने बताये पते पर गए। रेहाना ने नीलमणि से सबकुछ बता दिया। कहा कि कोर्ट में हम लोगों ने शादी भी कर ली है। नीलमणि भी रेहाना के चेहरे की खुशी को बिखरने नहीं देना चाहता था। नीलमणि ने मुकेश और रेहाना को मंदिर में हिन्दू रीति रिवाज से शादी करने की सलाह दी। रेहाना भी तैयार थी। मुकेश ने भी गरदन हिलाकर अपनी हामी भर दी। इसके साथ ही उसने एक सलाह दी। जीवन जीने के लिए सिर्फ किसी धर्म के रिवाज की जरूरत नहीं होती। किसी रिवाज को धारण कर लेने से अस्तित्व का बोध नहीं होता। इसके लिए आश्वक्तिबोध ज्यादा जरूरी है। यह मिलेगा आभास होने में।
काशी के अस्सी घाट पर रेहाना और मुकेश के विवाह की तैयारियां शुरू हुई। कुछ हिन्दू धर्म वालों को पता चला तो वहां अपना बैनर व पोस्टर भी लगवा दिया। रेहाना की धर्म वापसी हो रही है। मुस्लिम होकर हिन्दू लड़के के साथ शादी कर रही है। यहीं से शुरू हो जाता है दोनों की हंसती-खेलती जिंदगी को बर्बाद करने का खेल। जब यह बात मुस्लिम वर्ग के लोगों को पता चली तो इसका विरोध शुरू कर दिया। दोनों के प्यार पर पहरा लग गया। इनकी पहचान वायरल न हो जाय इसके लिए दोनों ने बनारस से कहीं और भागने की योजना बनायी। हिन्दी-मुस्लिम संगठनों ने किराये के मकान की तरह इनकी जिंदगी भी किराये की बना दी। उधर, नीलमणि भी परेशान था। मामला इतना बिगड़ जाएगा इसका उसे जरा सा भी आभास नहीं था। वह मन ही मन सोच रहा था कि शायद मुकेश सच ही कर रहा था कि जीवन जीने के लिए सिर्फ किसी धर्म के रिवाज की जरूरत नहीं होती।
मुकेश और रेहाना किसी दूसरे शहर जाने के लिए घर से निकल लिए। कैंट रेलवे स्टेशन के लिए आटो रिक्शा किया। उधर, पुलिस भी किसी अनहोनी के डर से दोनों के पीछे पड़ी थी। आखिरकार पुलिस ने दोनों को हिरासत में ले लिया। यह बात शहर में आग की तरह फैल गई। धर्म के ठेकेदारों ने शहर में जुलूस निकाला। पत्थरबाजी की। हिन्दू वर्ग के लोग इस शादी को करवाने पर आमादा थे। मुसलिम वर्ग के लोग चाह रहे थे कि यह शादी न हो। भीड़ बेकाबू हो गई। इसी भीड़ में से किसी ने पत्थर मारा और मुकेश के सिर पर जा लगी। वह जख्मी हो वहीं गिर पड़ा ...। जख्म से वह जमीन पर पड़ा कराह रहा था। रेहाना दहाड़े मार रोने लगी। कभी धर्म के ठेकेदारों को कोसती तो कभी खुद को। वह चिल्ला रही थी। डॉक्टर को बुलाओ। कोई इसे अस्पताल ले चलो। हमें नहीं करनी शादी लेकिन मेरे मुकेश को तो बचा लो। रेहाना के अश्कों का उस भीड़ पर कोई असर नहीं था। तभी किसी ने एक और पत्थर मारी मुकेश के सिर पर। मुकेश के मंुह से आह की आवाज निकली। उसने जोर से चिल्लाया। मैं फिर आउंगा। एक और मजहबी दंगे का मुझे इंतजार रहेगा। मुझे कितनी बार मारोगे। एक मुकेश मारोगे कई मुकेश पैदा होंगे। एक रेहाना विधवा हो जाएगी। उसे अपनाने के लिए हजारों नीलमणि आगे आएंगे। मुकेश ने नीलमणि की ओर आशा भरी निगाह से देखा। रेहाना को अपनाने का आश्वासन चाहता था। देखो नीलमणि यह रेहाना तुम्हारी थी। तुम्हारी रहेगी। मैं तो सिर्फ एक माध्यम बनकर आया था। अब जा रहा हूं। अगर तुम इसे अपना लोगे तो समझुंगा रेहाना की अब असली घर वापसी हुई है। नीलमणि भी तैयार हो गया। मुकेश की बेटी को उसने गले लगा लिया। तपती दुपहरी की चादर ढलती शाम के आईने में एक जीवंत सच्चाई को उजागर कर रही थी। एक उड़ता परिंदा सदा के लिए खामोश होना चाह रहा था। इस दुनिया को अलबिदा कहना चाह रहा था। इतने में मुकेश के बदन ढीले पड़ गए। रेहाना और नीलमणि फूट-फूट कर रोने लगे। अब भीड़ भी वहां से छट गई थी।
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर
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