Friday, 10 June 2016

रेहन हो गई जिन्दगी

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नंदू की जिन्दगी खुबसुरत थी, लेकिन लिखने वाले ने उसके भाग्य में बहुत दुश्वारियां लिख दी थी। भूखे पेट को भरने से लेकर ठण्ड में कांपते बदन को ढकने के लिए उसे जद्दोजहद करनी पड़ती। ' भगवान् जाने क्या होगा हमारा। हमारा भाग्य कभी भी इन दुश्वारियों से उबरने नहीं देगा। नंदू अक्सर उखड़ जाता।
' बडबडाने से परेशानियां कम नहीं होती', पत्नी उसे समझाती। हालांकि पति से ज्यादा ख्याल उसे पड़ोसियों का होता था, उसे मालूम था की उनके कान इधर लगे होंगे। वह नहीं चाहती थी कि उसके घर की हालत किसी को पता चले। वह अपने पति नंदू की ही तरह स्वाभिमानी थी। नंदू के विचारों के साथ खुद को ढाल ली थी। यही कारण था कि दोनों एक दूसरे को बहुत चाहते थे। लाख परेशानियों के बाद भी जिन्दगी खूबसूरत थी। गरीबी आखिर कैसे दूर होती। न रोजी-न रोजगार। वह खेतों में हाड़तोड़ मेहनत करता। कभी बाढ़ तो कभी सूखा से फसलें बर्बाद हो जाती। इस तरह कि परेशानियां देख नंदू की वीबी मीरा ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, कहो तो तुम्हारी नौकरी के लिए अपने भाई से बात करें। मुंबई में वह रोजी रोजगार करता है कहीं जरुर व्यवस्था करा देगा। मैं भी तुम्हारे साथ वहीं चल चलूंगी। अपने बूढ़े हो चले माँ-बाप की भी चिंता थी। उन दोनों के चले जाने के बाद उन्हें कौन देखेगा। मीरा ने झुझलाते हुए कहा-तो क्या यैसे कब तक जिन्दगी कटेगी। यहीं से मीरा और नंदू के बीच एक नई बहस और झगड़े की शुरुआत हुई।
बूढ़े हो चुके माँ-बाप का सेवा ही नंदू लिए दुनिया का सबसे बड़ा सुख था। अब तो मीरा की झगड़े की आवाजें नंदू के कानों से टकराकर वैसे ही वापस हो जाती जैसे खाली मकान से दस्तक वापस हो जाती है। दोनों के बीच अक्सर झगड़ों के बाद दो-तीन दिन तक घर में तनाव का माहौल रहता था।
आज मीरा बहुत खुश थी। उसे इतना खुश देख नंदू भी परेशान हो गया। परेशान हो भी क्यों नहीं। जो हमेशा पतझड़ के सामान उदास रहती हो उसके चेहरे पर अचानक इतना फगुनहट का आखिर राज क्या है? नंदू दुआरे में अपने बाबूजी के पैरों का मालिश कर रहा था। तभी मीरा तेज आवाज में, अजी सुनते हो।
हाँ बताओ क्या हुआ?
देखो न भईया की मुम्बई से चिठ्ठी आई है। वो अगले रविवार को भाभी और बच्चों के साथ कुछ दिन के लिए घुमने आ रहे हैं...।चिठ्ठी के अंत में भैया ने लिखा है कि ज्यादा ' परेशान' होने की जरूरत नहीं। हम बस कुछ ही दिन के लिए आ रहे हैं। इस हिस्से को मीरा ने कई बार पढ़ा। नंदू की आँखें भर आई। मीरा ने मुंह बिचकाकर कहा, देखो नंदू रोओ मत। मेरे भाई के आने से तुम इतना दुखी हो तो चिठ्ठी लिखकर मना कर देती हूँ। कह देती हूँ की तुम्हारा सेवा सत्कार करने की औकात हमारे में नहीं है।
मीरा की बातें सुन नंदू उखड़ पड़ा। आखिर तुम मेरी खुशियों की शोभायात्रा रोज-रोज क्यों निकालना चाहती हो। मैं किसी मेहमानबाजी से घबराने वाला नहीं, पर तुम्हारे और तुम्हारे भाई की नियत में जो खोट है उससे जरुर आहत हूँ।
बहुत खूब... मेरा भाई इतने समय बाद हमसे मिलने आ रहा है और मैं एक समय उसे अच्छा खाना भी नहीं खिला सकती? तुम शायद जानते नहीं उसकी वीबी को। वो सारे खानदान में गाती फिरेगी कि हम कितने कंगाल हैं। मीरा बच्चों की तरह खुश होते हुए रविवार के बारे में सोचने लगी। भाई के सेवा भगत के लिए पैसा आखिर कहाँ से आये। किससे मांगा जाय। अगर किसी ने कर्ज दे भी दिया तो इतना सूद हो जाएगा कि भरना मुश्किल होगा। मीरा के मन में एक उपाय सुझा। गाय बेचने का फैसला उसने नंदू को सूना दिया। मीरा का यह फैसला नंदू को मंजूर नहीं था। कारण बूढ़े माँ-बाप को दूध की जरूरत थी जिसे गाय ही पूरा करती थी। अब इसे भी बेच देंगे तो.... नहीं-नहीं हम यैसा नही होने देंगे। गाय नहीं बिकेगी।
अब गाय झगड़े की जड़ बन गई। इसे लेकर दोनों के बीच तकरार शुरू हो गई। घर का माहौल आशान्त हो गया। जब यह बात नंदू के पिता अजित को पता चली तो उसने भी बहु के निर्णय पर मुहर लगा दिया। अजित ने नंदू से कहा, बेटा हमें दूध मिले या न मिले पर घर में आया मेहमान ईश्वर होता है। उसकी सेवा भगत में कमी नहीं होनी चाहिए। आज गाय बिक जायेगी तो कल हालात अच्छे होने पर हम फिर से खरीद लेंगे।
अपने ससुर अजित की बातें सुनकर मीरा के चेहरे पर और फगुनाहट फ़ैल गई। नंदू तो समझ गया था कि घर में करकर न हो इसलिए पिताजी मीरा की बातों का समर्थन कर रहे हैं।
आखिर दुखी मन से गाय को बेचनी पड़ी। थुलथुल और कमजोर हो चुके अजित के शरीर के लिए अब गाय का दूध भी नहीं था।
रविवार को मुम्बई से मीरा के भईया और भाभी आ गये। वह उनकी सेवा में लग गई। रोज छेना की सब्जी, खोये का हलवा और पनीर का पकोड़ा बनता। सभी छककर खाते, पर नंदू को कुछ नहीं सुहाता। उसे पता था कि आखिर यह सब कितने दिन चलने वाला। फिर तो बाद में वही सुखी रोटी, चटनी और अरवा चावल का भात। रोज शाम को संदूक वाले बक्से से कडकडा नोट निकालर मीरा नंदू को देती और वह झोला लेकर साइकिल से बाजार जाकर फरमाइश का सामान लाता। अब संदूक में भी कुछ ही पैसे बचे थे। मीरा के भाई ने मुम्बई चलने की इजाजत मांगी। मीरा और नंदू ने इजाजत दे दी। कारण पैसे भी लगभाग ख़त्म हो चुके थे। उनके चले जाने के बाद नंदू मीरा से पैसे का हिसाब मांगने लगा। कुल तीन हजार रूपये बचे थे, पर मीरा देने के लिए तैयार नहीं थी। मीरा ने नंदू से कहा, देखो जी हमारे शादी को 7 साल हो गये। इन 7 साल में सिंदूर दान के समय जो तुमने 7 बचन लिया था। एक का भी पालन नहीं किया। अब जो पैसे बच गए हैं उसका पायल और बिछुआ मेरे लिए बनवा दो।
नंदू फिर उखड़ गया। तुमने भी तो साथ बचन लिया था। मेरी गाय बिक गई। क्या यह भी तुम्हारे बचन में शामिल था? बस इतनी सी बात पर मीरा ने 3 हजार रूपये नंदू के हाथ पर पटक दिया। इसके बाद वह अपने कमरे में जाकर जोर-जोर से रोने लगी। खुद के जीवन से थका हारा नंदू भी इन हालातों से समझौता कर लिया था। मीरा को मनाकर उसी दिन उसे साइकिल पर बैठाकर बाजार ले गया। आखिर पायल और बिछुआ लेकर मीरा घर आ गई।
एक दिन नंदू के पिता अजित और माँ गुलाबो की हालत साथ-साथ बिगड़ गई। डाक्टर ने बताया अब इनका अंतिम समय है। जितना हो सके सेवा कर लो। नंदू खुद को कोस रहा था... जिस माँ ने मुझे खुद का दूध पिलाकर बचपन में ज़िंदा रखा। जब बड़ा हुआ तो पिताजी ने मेरे लिए गाय खरीदी और आज जब दोनों कमजोर हो गये। इस दुनिया से चलने का समय आ गया तो उन्हें गाय का दूध नसीब नहीं। आखिर मैं कैसा उनका बेटा? थोड़ा सा जब मैं बीमार पड़ जाता माँ घबड़ा जाती थी। एक बार तो जब उनके पास पैसे नहीं थे तो अपना पायल बेचकर मेरा इलाज कराया था। आज जब वह बीमार हैं तो मैं पैसे के अभाव में किसी अच्छे डाक्टर को भी नहीं दिखा पा रहा हूँ। अगर एक बेटा होने का भी फर्ज नहीं निभा पाया तो खुद को कैसे माफ़ कर पाउँगा। उसने अपने खेत को रेहन पर रखना चाहा, पर उसर भूमि होने के कारण किसी ने लेने से इनकार कर दिया। गाँव के ही एक धनासेठ ने नंदू को 50 हजार रुपये देने के लिए तैयार हो गया लेकिन कुछ शर्तों पर। शर्त यह था कि वह नन्दू को ही रेहन पर लेना चाहता था। नंदू भी तैयार हो गया। उसके पास दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं था।
नंदू धनासेठ से 50 हजार रूपये लेकर शाम के पहर घर आया। सोचा सुबह ही हाट जाकर एक गाय खरीदेगा। बाकी जो पैसे बच जायेंगे उससे माँ और पिताजी का इलाज कराएगा। ख़ुशी के मारे उसे नीद नहीं आ रही थी। उधर बीमार अजित व उसकी पत्नी गुलाबो को दर्द व घबडाहट से नींद गायब थी। नंदू अपने माता-पिता के पास ही सोया था। नंदू को आधी रात के बाद भी जगा देखकर उसका पिता अजित और परेशान हो गया। उसे लगा शायद नंदू किसी परेशानी में है। परेशानी का कारण पूछने पर भी नंदू बात को इधर-उधर घुमाने लगता। अपने लाडले नंदू की हालत देख अजित की तबियत और बिगड़ने लगी। नंदू दौड़कर गाँव के डाक्टर को बुला लाया। जुबान बंद ही चुकी थी। जोर-जोर से खर्राटे ले रहा था। उल्टी गिनती की तरह उल्टी सांस चलने लगी। यह पल देख नहीं लग रहा था कि कठिनाइयों में भी सिना भुलाए खड़ा रहने वाला जीवन का योद्धा इस तरह जीवन का अंतिम लड़ाई हार रहा है। नंदू रोने लगा। बाबूजी! आप चिंता न करें। आप ठीक हो जायेंगे। उसे क्या पता था की हर आश्वासन को स्वीकार लेने वाले उसके बाबूजी इस बार अनसुना कर देंगे। कम्बल ज़रा सा हिला। कमजोर सी हथेलियाँ जोर-जोर से नाक को रगड़ रही थी। थोड़ी देर बाद फिर से कम्बल में हरकत हुई। नंदू को भरोसा नहीं हुआ... उसके पिता अजित रो रहे थे। पलकों पर बहते आंसू गालों पर निशान बनाते हुए गर्दन की तरफ लुढ़क रहे थे। वह सचमुच रो रहा था अपनी खाली आँखों से पर क्यों?? क्या वह इसलिए रो रहा था कि मेरा बेटा इस गरीबी में अपना बाकी के दिन कैसे काटेगा?? या अपनी पत्नी गुलाबो को लेकर चिंतित था।
उसकी आँखों में झाकना मुश्किल था... और मुश्किल था उसके आंसुओं को समझना। पता नहीं इस आखिरी समय में वह क्या कह देना और सुन लेना चाहता था। मगर अफ़सोस! वह इस काबिल नहीं था। जिन्दगी भी कैसी है। जब अजित नंदू से कुछ कहता था तो उसे वह सुनता नहीं था आज जब वह सुनना चाह रहा है तो अजित कुछ कह नहीं सकता। कुछ ही देर में कम्बल में एक बार फिर हरकत हुई ...और अजित सदा के लिए अपने भरेपूरे परिवार को अलबिदा कह गया।
nandu is better then writer.
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

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