राधा और गंगा
*************गरीबों की जिन्दगी दुखों की एक दीवार है, जिसका पलस्तर वह नाखूनों से खुरचता रहता है। कभी उसके मन में भाव आता कि उसकी तमाम इंटे उखाड़ फेंकेगा....और इस मलवे के ढेर पर वह ख़ुशी की एक नई इमारत खड़ी कर देगा। इसी उधेड़बुन में लगा रहता है। वह इतना सोचता रहता है कि दिमाग के साथ वह खुद भी थक जाता है। उसकी स्थाई थकावट उसके ऊपर हाबी हो जाती है और उसे कुछ करने नहीं देती। उसके ख्यालात बिखर जाते हैं....सपने टूट जाते हैं। बरसात के पतंगों की तरह उसका दिमाग भी उड़ने लगता है। अगर...मगर... करते हुए एक दिन वह खुद को लाचार पाता है लालबिहारी की तरह ... पर एक बात और है कि उसके जैसा भाग्य भी हर गरीबों के कहाँ होते हैं। अब आपका परिचय करवाते हैं राधा, गंगा और इन दोनों बेटियों के बाप लाल बिहारी से।
राधा और गंगा दोनों जुड़वा बहनें थीं। जितना चंचल राधा थी उतना ही नटखट गंगा। गाँव में हैजा क्या आया की जैसे इनकी दूनियाँ ही उजड़ गयी। माँ की मौत के बाद दोनों उदास रहतीं। जैसे किसी घर का देखरेख करने वाला और संझा दिखाने वाला भी कोई न हो तो वह घर खंडहर बन जाता। राधा और गंगा की कहानी भी यैसी ही हो गई थी। आखिर इनका देखभाल कौन करता। इन दोनों का बाप लाल बिहारी 12-12 घंटे ओवर टाइम ड्यूटी करता। घर आने के बाद इतना थक जाता कि खाना खाने के बाद उसे तुरंत नींद आ जाती और वह सो जाता। इन दोनों बहनों के लिए तो दिन और रात दोनों पहाड़। माँ की मौत के बाद पिता का भी प्यार ठीक से नहीं मिलता।
चैत का एक दिन। राधा और गंगा खेलते-खेलते गंगा नदी के किनारे चली गईं। गर्मी के कारण गंगा का पानी भी किनारे से दूर जा चुका था। दोनों बहनें पानी में खेलने लगीं। जैसे लगा वर्षों बाद एक आनंद की अनुभूति हो रही है। मन के कोरे पृष्ठ पर अनयास ही.... जैसे किसी महाकाव्य की रचना माँ गंगा के हाथों रची जा रही हो। गंगा की गोंद में बैठी दोनों बहनों को लगता जैसे माँ की गोंद में बैठी हों। पानी की लहरों में तैरता जब अपना प्रतिबिम्ब देखतीं तो एक कसक...ब्याकुलता और मन में बेचैनी। कसक माँ की मौत का। ब्याकुलता माँ से एक बार मिल लेने का और बेचैनी बादलों की ओट में सूर्य के छिप जाने की।
राधा दौड़ती हुई पानी से बाहर आई। देख गंगा अब शाम हो चली। अब हमें घर चलना चाहिए। बापू भी अब आते ही होंगे। खाना नहीं बना तो क्या खायेंगे। दिन भर कितना काम करते हैं। माँ कितना उनका ख्याल रखती थी... गंगा ने राधा की बातों को बीच में ही काटते हुए.. और हम लोगों का भी।
उधर, लाल बिहारी आज जल्द घर आ गया था। दरवाजे पर बाहर से ताला बंद देख परेशान था। परेशान हो भी क्यों न सुगिया की मौत के बाद मीरा और गंगा ही उसकी जिन्दगी थी। दिनभर हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद जब घर आता और दोनों बेटियों को देख लेता तो उसे काफी सकून मिलता। लेकिन आज व्याकुल था। वह पडोस में भी पता किया पर सभी ने कहा कि राधा और गंगा को नहीं देखा। घर के बाहर चबूतरे नुमा बेदी पर दोनों बेटियों के इन्तजार में बैठा था। कुछ देर बाद राधा और गंगा जब आईं तो उन्हें देख लालबिहारी खुश हुआ, लेकिन दोनों बहनें डरी हुई थी।। उन्हें लग रहा था कि बापू डांटेंगे। जब दोनों नजदीक आईं तो लालबिहारी ने उन्हें गले लगा लिया। पिता का इतना प्यार-दुलार पाकर कौन बेटी नहीं इतराएगी। दोनों पिता की सेवा में लग गई।
तभी बाहर दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। लालबिहारी यैसे चौंक गया जैसे कोई पुलिस वाला छापेमारी करने के लिए आ रहा हो। जब बाहर जाकर देखा तो कोई नहीं था।। उसे लगा कि हवा से दरवाजा खड्का हो। अब वह वापस कमरे में आ गया। रसोई घर में गया तो देखा राधा और गंगा खाना बनानें की तैयारी में लगी थीं। फिर वह उस कमरे में गया जहाँ उसकी पत्नी सुगिया और उसका बेडरूम हुआ करता था। बेड पर बिछा लालरंग की चटख चादर जिस पर सफेद और पीले रंग की फुल और पत्तियाँ। अगर कुछ नहीं थी तो उसकी पत्नी सुगिया। जिस कमरे में दोनों कभी प्रेम की दो बातें करते थे अब उसी घर की दीवारों से नफरत की गंध उठ रही थी। वह अचानक बिस्तर पर लेट गया। लगा जैसे एक मृत शरीर लेटा दिया गया हो। तभी राधा दौड़ी हुई आई। बापू खाना बन गया, चलकर खा लो। एक लम्बी सांस खींचते हुए लाल बिहारी ने कहा, हाँ चलो आ रहा हूँ।
काठ के पीढ़े पर बैठा लालबिहारी अभी रोटी का एक कौरा ही तोड़ा था कि किसी ने एक बार फिर दरवाजे पर दस्तक दी। वह फिर डर गया। सुगिया जब बीमार थी तो अस्पाताल में भर्ती कराने के लिए गाँव के अनंत ठाकुर से उसने कर्ज लिया था। कर्ज भरने के लिए ही वह 12-12 घंटे डयूटी करता। हर महीने जो उसे जो पगार मिलती उसमे सूद भी ठीक से नहीं भर सकता। दरवाजा जब भी खड़कता उसे लगता अपना उधार लेने के लिए गाँव का ठाकुर आया है। उसने बाहर जाकर देखा तो इस बार भी कोई नहीं था। अब वह और परेशान हो गया। आखिर कौन बार-बार दरवाजे पर दस्तक दे रहा है।
लालबिहारी जब खाना खा रहा था तो उसकी दोनों बेटियां टुकुर टुकुर उसे देख रहीं थी। वह समझ गया कि कुछ कहना चाह रहीं हैं।
लालबिहारी का इशारा पाते ही राधा और गंगा एक स्वर में बोलीं, बापू , माँ की मौत के बाद हम लोगों ने स्कूल जाना छोड़ दिया था।.अब फिर से पढ़ाई जारी रखना चाहते हैं। दोनों ने ऐसे ठंठे और बेजान स्वर में बोला कि लालबिहारी आहत हो गया। उसे लगा कि उसकी बेटियां अपने बाप से नहीं बल्कि किसी और से निवेदन कर रहीं हैं।
"तुम दोनों से मैंने कब कहा कि स्कूल मत जाओ। पढ़ाई तो जारी रखनी चाहिए। ठीक है कल से ही स्कुल जाओ।
दोनों सोच में डूब गईं। कितना अच्छा लगता था जब माँ दोनों को स्कूल तक छोड़ने के लिए जाती थी। स्कूल का छुट्टी होने से पहले ही हम दोनों को लेने के लिए पहुँच जाती थी। अब स्कूल तक हमें कौन छोड़ने जाएगा। छुट्टी होने के बाद कौन लाने जाएगा। माँ तो है नहीं। बापू भी ड्यूटी में रहेंगे। तभी लालबाबू ने एक और रोटी मांगी। राधा और गंगा दोनों चुप कोने में बैठी थी।। एक बार फिर जोर से चिल्लाया, तुम दोनों आजकल कहाँ खोयी रहती हो। कब से रोटी मांग रहा हूँ। गंगा ने रोटी लाकर दी।
दूसरे दिन: राधा और गंगा स्कूल जा रही थी। रास्ते में मिली सहेलियों ने व्यंग कसा। अब तो तुम दोनों अकेली स्कूल जाओगी। अब कहाँ गया तुम दोनों की माँ का प्यार? तुम दोनों तो कहती थी कि माँ बहुत प्यार करती है। अगर प्यार करती तो क्यों मरती?
सहेलियों के व्यंग से आहत हो राधा और गंगा ने आँखों में छलछलाते आंसुओ को बमुश्किल पलकों पर रोक लिया।
सहेलियों के व्यंग की परवाह न करते हुए। दोनों रोज स्कूल जातीं। घर पर भी खूब पढ़ाई करतीं। जब रिजल्ट आया तो राधा और गंगा ने आठवीं में टॉप किया। बेटियों का रिजल्ट देख लालबिहारी भी खुश हुआ।
इसी तरह दोनों ने कब हाईस्कूल, इंटर और बीए कर लिया पता ही नहीं चला।। हर बार टॉप किया। दोनों बेटियों को एक साथ जवान होते देख लाल बिहारी परेशान था। कहा जाता है जब बेटियां जवान हो जाय तो बोझ बन जातीं हैं... और बोझ तो बोझ होता है। कोई कितना भी समर्थवान व्यक्ति हो ज्यादा दिन नहीं ढो सकता। लालबिहारी भी चाहता था कि यह बोझ जल्द से जल्द सिर से उतार दे। कोई अच्छा लड़का देखकर शादी कर दे। उधर ठाकुर के कर्ज से भी परेशान था। मूल तो दूर सूद भी ठीक से नहीं भर पाता था।
आखिर वह दिन आ ही गया। लालबिहारी के साथ में फैक्ट्री में काम करने वाले लोचन शर्मा के दोनों लड़कों के साथ बेटियों की शादी तय कर दी। शादी तो तय हो गई पर दहेज के पैसे कहाँ से आयेंगे। आखिर उसने पुस्तैनी जमीन बेचने की सोची। जब इस बात की जानकारी ठाकुर अनंत सिंह को हुई तो वह दौड़े हुए लालबिहारी के घर आये। उन्होंने लालबिहारी को हिदायत देते हुए कहा, तुम्हारी जमीन तो मैं ही खरीदूंगा। दाम भी मैं ही लगाउंगा। मेरा कर्ज तुम्हारे उपर है। दूसरे को जमीन दी तो बेटियों को विदा नहीं कर पाओगे। ठाकुर के जाने के बाद लाल बिहारी परेशान था।
वह जानता था की ठाकुर अनंत को जमीन बेचने का मतलब कौड़ियो के भाव दे देना। आखिर करता भी क्या? उसे वही करना पड़ा जो ठाकुर चाहता था। तीन लाख की जमीन मात्र एक लाख में बेचनी पड़ी। मगर इतना तो उसे सिर्फ दहेज़ देना था। बाकी के खर्च वह कहाँ से लाएगा।
अब इस चिंता में लाल बिहारी एकदम उदार हो गया था। कर्ज ने उसे और उदार बना दिया था। ड्यूटी से घर आने के बाद अब वह मुहल्ले में भी किसी से बात नहीं करता। बिस्तर पर लेटे-लेते उदास और पस्त।
लाल बिहारी दहेज के एक लाख रुपया में से 50 हजार तो दे आया। लड़के वाले को इस शर्त पर राजी कर लिया कि बाकी के 50 हजार रूपये शादी के दिन दे देगा। बचे हुए 50 हजार रूपये में से वह शादी की तैयारी में लग गया। उसे इस बात कि चिंता सताए जा रही थी कि आखिर वह वादे के मुताबिक़ 50 हजार रुपया लड़के वाले को कहाँ से देगा। कई लोगों से कर्ज भी मांगी, पर सभी ने देने से इनकार कर दिया। शायद लोगों को पता था कि अगर दे भी दिया तो कहाँ से भरेगा। वह दिन भर मेहनत जरुर करता पर वेतन कम होने से परेशान रहता...और अब तो लालबिहारी की चिंता को देख राधा और गंगा भी परेशान रहने लगीं। उन्हें लगता कि उनकी वजह से ही बापू परेशान हैं।। उन दोनों की शादी के लिए दहेज़ ने परेशान कर रखा है।
तभी दरवाजे पर एक बार फिर किसी ने दस्तक दी।। अब लाल बिहारी के साथ दोनों बेटियां भी परेशान हो गईं। इतनी रात को कौन आया होगा। डरते हुए उसने दरवाजा खोला। सामने एक लम्बी खुबसुरत महिला को देख और घबड़ा गया। आखिर यह कौन है? क्या काम है? महिला ने जैसे कहा मैं ठाकुर अनंत सिंह की पत्नी हूँ... अब लाल बिहारी को मानों काटो तो खून नहीं।
लाल बिहारी अभी कुछ कहता कि इससे पहले ही ठकुराइन घर में प्रवेश कर गईं। राधा और गंगा को गले लगा लिया... जैसे दोनों खुद की बेटी हों। राधा और गंगा भी ठाकुरान से गले मिल अघा गईं... जैसे धरती और आकाश का मिलन हो। लालबिहारी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर यह हो क्या रहा है। वह बस टुकुर-टुकुर देखे जा रहा था।
लाल बिहारी तुम इस तरह क्या देख रहे हो।। आखिर यह दोनों मेरी भी बेटियां हैं। राधा और गंगा की माँ सुगिया और हम साथ पढ़े थे। सुगिया की शादी तुम्हारे साथ हो गई और मेरी ठाकुर के साथ। शादी के बाद मैं सुगिया से भले न मिली...पर उसकी मौत का सबसे बड़ा सदमा मुझे ही लगा था। उसकी मौत के बाद बेटियों से मिलने के लिए एक बार इससे पहले और भी मैं आई थी। दरवाजा खडका के चली जाती थी। हिम्मत करके आती पर ठाकुर के डर से वापस हो जाती।।
मैं माँ भले नहीं बन सकी पर एक औरत होने के नाते माँ की ममता तो है। अगर दहेज़ के लिए इन दो बेटियों की शादी रुक गई तो मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाउंगी।
जैसे लगा ठकुराइन ही इन दोनों बेटियों की माँ है। कितनी भोली और असाधारण अभिव्यक्ति थी...एक औरत के भीतर गंगा की लहरों की भांति उठ रहे ममत्व की। वर्षों बाद ठकुराइन को एहसास हुआ था एक औरत होने का।
इधर लालबिहारी आंगन के एक कोने में खड़े होकर नियति नदी के तट का खेल देख रहा था। जैसे भाग्य के पौरुष का अकथ संघर्ष की गौरव गाथा सुन रहा हो...देख रहा हो...और ह्रदय तल से महसूस कर रहा हो।
ठकुराइन के हाथों में एक पोटली थी। दोनों बेटियों के हाथ में रखते हुए कहा,मैं तुम दोनों की माँ नहीं हूँ तो क्या हुआ? माँ जैसी तो हूँ। एक माँ होने के नाते बेटियों को एक छोटा सा उपहार दे रही हूँ। यह कहते हुए ठकुराइन की आँखे भर आई। अपनी माँ न सही पर एक माँ का प्यार पाकर राधा और गंगा गदगद थी। उन्हें लगा जैसे सूर्य रश्मियों ने निर्मल जल की सतह पर असंख्य सितारे उतार दिए हों। जीवन के प्रति अदम्य आशा और विश्वास के प्रतिबिंब।
अब ठकुराइन अपने घर जा चुकी थी। लालबिहारी ने बेटियों को दिए उपहार को कांपते हाथों से खोला तो उसकी आँखे चौंधिया गईं...और राधा व गंगा भी एक टक देखती रह गई। सभी खामोश थे। कुछ देर के लिए सन्नाटा फ़ैल गया। उस पोटली में एक लाख रूपये नगदी और राधा और गंगा के लिए जेवर थे। उसे लगा इतने पैसों में तो वह बचा हुआ दहेज़ के पैसा भी दे देगा और ठाकुर का कर्ज भी भर देगा।
लालबिहारी के आँगन से राधा और गंगा विदा हो रहीं थीं। बेटियों के विदा होने का दर्द उसे था तो उसके दिल के आगन में खुशियाँ भी बरस रही थी। कहा जाता है कि गरीब बाप के घर से बेटियां विदा होतीं हैं तो कर्ज छोड़ जातीं हैं। लालबिहारी के साथ उल्टा था। उसकी पुस्तैनी जमीन भले बिक गई हो पर ठाकुर का कर्ज भरकर खुद को खुशनसीब समझ रहा था।
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर
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