Saturday, 11 June 2016

बेटी ही बचाएगी

अगर न होती घर में बेटी
चंचल मन आवारा होता
ईश्वर तक अपराधी होता
अपराध बोध का मारा होता
रामायण न होती घर-घर में
गीता अबुझ पहेली होती
प्यार न होता इस धरती पर
हर-एक मन बंजर होता
अपराध बोध का मारा होता
अगर न होती घर में बेटी
गोद न भरती किसी किरण की
सारा जहां निरबंशी होता
डोली रहती बिन दुल्हन की
हर घर में बस रुदन होता
अपराध बोध का मारा होता
अगर न होती घर में बेटी
जो बात समझ जाए इतना सा
हर जवाहर के घर इंदिरा होती
सर कलम न होता जवानों का
पाक का कई बंटवारा होता
अपराध बोध का मारा होता
अगर न होती घर में बेटी
सरस्वती न खोती संगम तट पर
यमुना भी यौवन में होती
बेटा-बेटी का भेद मिटता तो
गंगा जल नहीं काला होता
अपराध बोध का मारा होता
अगर न होती घर में बेटी
कली न खिलती किसी चमन में
बगियों में बस पतझड़ होता
बेटी ही बचाएगी
कभी नहीं यह शीर्षक होता
अपराध बोध का मारा होता
अगर न होती घर में बेटी

अजय पाण्डेय

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