Thursday, 9 June 2016

ठगते लोग बनारस को
----------------------------
बहुत बार देखा है मैंने
ठगते लोग बनारस को
सबके पथ यह फूल बिछाते
इसके पथ कांटे और खार
सड़कें टूटीं, गलियां उदास हैं
कूड़ों का अंबार बहुत है
हिस्से आया खोटा सिक्का
फिर भी मन में बहुत हुल्लास है
बहुत बार देखा है मैंने, ठगते लोग बनारस को...
सखियां, सधवा, पास पड़ोसी
निर्धन, निर्मम या जग उपहासी
सबकी पूजा का व्रत है मन में
नहीं चिंता क्या होगा अग्निपथ में
बहुत बार देखा है मैंने, ठगते लोग बनारस को...
संत तुलसी हों या पंथ कबीरा
गौतम बुद्ध या कृष्ण की मीरा
सुबह-ए-बनारस सबने देखा है
दिये संग जलते किसने देखा है?
बहुत बार देखा है मैंने, ठगते लोग बनारस को...
'काशी' की थाती गंगा का आंचल
उसको भी मैला कर जाते
पुण्य लाभ का डुबकी लगाकर
इनके हिस्से पाप छोड़ जाते
बहुत बार देखा है मैंने, ठगते लोग बनारस को...
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

No comments:

Post a Comment