सरकारी राहत चेक
***********अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर
कहानियां चलती रहती हैं... कहानियों के साथ किरदारों का काफिला होता है...एक तो कहानी लिखने वाला, दूसरा पढने वाला और तीसरा कहानी खुद। कहानियाँ ब्लैक होल की तरह हमें किसी और दुनियां में ले जाती है। सच्ची कहानियाँ वह होती है जो हमारी भींगी पलकें और रहस्यमयी मुस्कान को भी जानती है। कहानियाँ वह होती है जो सही राह दिखाती है। कहानियाँ वह होती है जो बिखरी जिन्दगी को समेटती है। हर पाठक कहानियों के किरदार होते हैं। इन्हीं किरदारों में से एक रघुआ और धनवंती से आपको आज मिलवाते हैं। आप से एक निवेदन भी है चाहे लाख मुसीबतें आये पर रघुआ जैसा नादानी मत करना। रघुआ जैसा कायर मत बनना।
इस साल सूखा ने सारी फसल चौपट कर दी। अनाज का एक दाना भी घर नहीं आया। अखबार में ख़बरें छपी कि जिन किसानों की फसल चौपट हो गई उन्हें राहत चेक मिलेगा। आज तक नहीं मिला। मेरे गाँव में जिन दो-चार लोगों को मिला भी वे सरकारी पार्टी के आदमी हैं। घर के आंगन में खाट पर बैठा रघुआ अपनी किस्मत को कोस रहा था। पास में ही जमीन पर बैठी उसकी लुगाई अपनी फटी हुई साड़ी का आँचल दिखाते हुए कहती है-मेरा यह लुग्गा अब पहनने लायक भी नहीं रहा। शरम के मारे किसी के घर भी नहीं जाती। तुम कहे थे कि इस बार फसल अच्छी होगी तो नई साड़ी खरीद देंगे। अब कहाँ से लाओगे। खाद-पानी का पैसा भी उधार। ऊपर से राहत चेक का इन्तजार। वह भी नहीं मिला।
रघुआ अपनी लुगाई धनवंती को समझाते हुए कहता है-राहत चेक के लिए लेखपाल साहब मेरा भी नाम ले गये हैं। मुझे भरोसा है कि राहत चेक जरुर मिलेगा। जिस दिन राहत चेक मिल गया तुम्हारे दिए दो जोड़ा साड़ी ला दूंगा। फिर मेरा भी दो साल के लिए छुट्टी। तब नहीं कह सकोगी कि साड़ी फट गयी है।
अरे का मिल जाएगा। मिलना होता तो जिन्हें मिला उनके साथ ही नहीं मिल गया होता। दिन भर खेतों में पड़े रहोगे। एक बार विधायक जी के यहाँ जाकर रोये-गिडगिडाये होते तो का हो जाता। चेक तो मिल गया होता न।
धनवंती की बातों पर रघुआ तिलमिला गया। अब जब लेखपाल सबका नाम ले गये थे तो विधायक के यहाँ का जाएँ। रामू भी तो विधायक के यहाँ नहीं गया था। उसे चेक मिल गया। धनवंती जोर से गरजी- अरे वह विधायक जी के यहाँ नहीं गया तो का हुआ। लेखपाल को 200 रुपया घूस दिया था। तब जाकर उसे 1600 रूपये का चेक मिला। जो विधायक जी के यहाँ गये थे उन्हें भी चेक मिल गया। तुम घर बैठे रह गये।
लेकिन सरकारी पार्टी को वोट तो हम लोगों ने भी दिया है। सूखा के कारण फसल मेरा भी नुकसान हुआ। फिर मेरे साथ ही नाइंसाफी क्यों? प्रधान जी भी कहे थे कि इस बार चुनाव जीत गया तो मनरेगा मजदूरी के लिए मेरा रजिस्ट्रेशन करा देंगे। वह भी अब इसके बदले पांच सौ रुपया घुस मांग रहे हैं। अगली साल बिटिया की शादी भी करनी है। आखिर पैसे कहाँ से आयेंगे।
धनवंती ताने मारते हुए कहने लगी, जो एक साड़ी नहीं खरीद सकता वह बिटिया की शादी कैसे करेगा?
फसल चौपट हो गई। राहत चेक मिला नहीं। मनरेगा में मजदूरी भी नहीं मिल रही। तो क्या इस साल भूखे मरेंगे? खाद वाला भी कह रहा था कि फसल हुई या नहीं मेरा उधारी दे दो। अगर पैसे नहीं हैं तो खेत ही रेहन रख दो।
जब खेत रेहन रख दोगे तो अगले साल के लिए खेती क्या करोगे? अब तो एक ही उपाय है। किसी सेठ-महाजन के यहाँ जाकर चौका वर्तन करूँ। धनवंती की चौका-बर्तन वाली बातों पर रघुआ का जमीर जाग उठा। जो किसान खेतों में अन्न पैदा कर सबकी पेट भरता है। उसकी वीबी अब दूसरों की जूठन साफ़ करेगी?
अब क्या मुझे यही दिन देखना था कि मेरी लुगाई दूसरे के घर चौका बर्तन करे? ठीक है आज ही विधायक जी के यहाँ जा रहा हूँ। उनसे पूछूंगा कि मेरे ही साथ नाइंसाफी क्यों हुई? जब सभी को राहत चेक का पैसा मिला तो मुझे क्यों नहीं?
दूसरे दिन अभी सूरज का एक किरण भी नहीं निकला था कि विधायक जी से मिलने चल दिया। आखिर 16 किलोमीटर का रास्ता पैदल तय करने के बाद विधायक जी के गाँव पहुँच गया। वह थक गया था। उसे प्यास भी लगी थी...पर विधायक से पहले मिल लेना चाह रहा था। दरवाजे पर ही विधायक के लोगों ने रोक लिया। तुम अभी विधायक जी से नहीं मिल सकते। रघुआ विधायक से मिलने की जिद पर अड़ा रहा। वह कहता है कि जब विधायक जी मेरे पास वोट मांगने आये थे तो मैंने तो नहीं कहा था कि अभी नहीं मिल सकता। विधायक जी ने हाथ जोड़ कहा था की अगर विधायक बन गया तो तुम्हारे लिए मेरे दरवाजे हमेशा खुले रहेंगे। फिर आज क्यों बंद हो गये? रघुआ पसीने से तरबतर था। उसे प्यास भी लगी थी। कंधे पर से गमछा उतारकर पसीने से तरबतर चेहरे को पोछने के बाद नीचे ही बैठ गया।
एक हट्ठा-कट्ठा नौजवान वहीं कुर्सी लगाकर बैठा था। बगल में दो नाली बन्दुक थी। कुछ देर सुस्ताने के बाद रघुआ ने उसके और नजदीक जाकर पानी मांगी। उस नौजवान ने कुछ दूरी पर गड़े एक हैंडपंप की ओर इशारा करते हुए कहता है, वहां जाकर पी लो। रघुआ हैंडपंप के पास गया। वह एक हाथ से हैंडपंप का हैंडिल पकड़ कर चलाता दूसरे हाथ से पानी रोपकर पीता। इस प्रकार किसी तरह से उसने अपनी प्यास बुझाई। पानी पीने के बाद अब उसे थोड़ा सकून लग रहा था। वह फिर वहीं वापस गया। उसे विधायक जी से मिलने की जिद थी।
रघुआ के जिद पर विधायक जी के पास उसे ले जाया गया। रघुआ ने विधायक का हाथ जोड़कर प्रणाम किया। विधायक जी के इशारा के बाद पास में रखी एक खाली कुर्सी पर वह बैठ गया। विधायक जी के साथ दो और लोग भी बैठे थे। विस्की की बोतल और तीन गिलास सामने टेबल पर रखा था। एक प्लेट में काजू और पिस्ता। रघुआ देखकर परेशान। कल तक विधायक जी कर्ज में थे। विधायक बनने से पहले अमीन रोज तगादा पर आता था। कर्ज नहीं भरने के कारण इनका ट्रेक्टर नीलाम हो गया। आज विधायक बनते ही कौन सी लाटरी लग गई कि काजू और विस्की चलने लगा। सूखा पड़ने के कारण किसान बर्बाद हो गये....और विधायक जी मौज काट रहे हैं। तभी रघुआ के कान में विधायक जी की आवाज गूंजी। वह कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। वह घबडाया हुआ था।। हाथ जोड़कर सुखा राहत चेक के लिए विधायक जी से निवेदन किया।
रघुआ को 100 रुपया का नोट पकडाते हुए विधायक जी कहते हैं, मेरी सरकार ने किसानों को जितना चेक बांटना था बाँट दिया। दिल्ली वाली (केंद्र) सरकार से और पैसा किसानों के लिए माँगा गया है। वहां से अभी तक पैसा नहीं मिला। रघुआ कहता है-लेकिन मालिक सांसद जी गाँव आये थे तो कहे थे कि दिल्ली वाली उनकी सरकार ने राज्य की सरकार को पैसा दे दिया है। अब कौन कितना दिया हम जानकार क्या करेंगे। हम तो यही जानेंगे कि मुझे चेक नहीं मिला।
रघुआ उदास मन लिए अपने गाँव की ओर चल दिया। उसके हांथों में विधायक जी के दिए 100 का नोट था। वह बार-बार नोट को उलाट-पलाट कर देख रहा था।
वह अपनी किस्मत को कोस रहा था। गाँव में पहुंचा तो चबूतरे पर बैठक लगी थी। वहां भी राहत चेक की चर्चा हो रही थी। सभी ने एक स्वर में रघुआ से पूछा- विधायक जी ने क्या कहा?
का कहेंगे विधायक जी। कह रहे हैं जो बाटना था बाँट दिया। अब तो खाद पानी वाला भी पैसा वापस मांग रहा है। लुगाई अलग से ताना मांग रही है। बिटिया की शादी भी करनी है। दिल तो करता है आत्महत्या कर लें। सभी दुखों से एक साथ मुक्ति मिल जायेगी। तभी वहां से गुजर रही गाँव की बूढी काकी ने रघुआ की बातों को सुन लिया। रघुआ को खरी-खोटी सुनाने लगी। अरे आत्महत्या कर लेगा तो तुम्हारी लुगाई को कौन खिलाएगा? बिटिया जवान हो गई। उसकी शादी कैसे होगा। सुखा पड़ गया तो आत्महत्या? कर्ज हुआ तो आत्महत्या? अरे मर्द हो। कहीं जाकर मजदूरी करो। काम करो।
अब यह बात गाँव में फ़ैल गई कि रघुआ आत्महत्या करने के लिए कह रहा था। रघुआ वहां से उठा तो दारु के भट्ठा पर चला गया। उसे इस बात का डर था कि कहीं आत्महत्या वाली बात उसकी लुगाई जान गई तो क्या होगा?
रघुआ विधायक जी के पैसे से ठर्रा पीकर घर लौटा तो धनवंती सर झुकाए हुए चुल्ल्हे पर मोटी-मोटी रोटियां सेंक रही थी। अब कुछ बोलने के लिए उसके पास शब्द नहीं थे। आत्महत्या वाली बात उसे भी पता चल गया था। वर्षों हो गये कितना दुःख सहकर भी वह रघुआ को अपना देवता मानती है। अब वह आत्महत्या करने की बात कह रहा है। रघुआ लडखडाते हुए जब धनवंती के पास आया तो वह समझ गई की ठर्रा पीकर आया है। वह तावे की रोटी तावे पर ही छोड़कर रघुआ के पास दौड़ी आई।
सत्यानाश हो हरामी के पिल्लै का, जिसने घरों को बर्बाद करने वाली शराब को बनाई। घर का घर तबाह हो जाए। आदमी की जिन्दगी तबाह हो जाए, पर वह जालिम तरस नहीं खाता। कैसा मुर्ख होता है आदमी भी, वह समझता है कि इसे पी रहा है, पर असल में वह आदमी को पीती है। उसके ईमान को पीती है। उसके खून को पीती है। धनवंती ने किसी तरह रघुआ को उठाकर खाट पर लिटा दिया।
रघुआ की हालत देखकर धनवंती का मन बोझिल हो गया। उसके दिल में एक हुक सी उठ रही थी। थाली में पानी लेकर रघुआ का पैर धो रही थी। उसके पैरों में बेवाई और छाले पड़े थे। पैरों में पड़े बेवाई के दर्द से चेक न मिलने का दर्द भारी पड़ रहा था। उसकी लुगाई उठी और तावे पर रखी रोटी और चटनी ले आई। लो हुर लो चटनी रोटी। पैसा था तो थर्रा पी गया। अगर उस पैसे का सब्जी लाया होता तो कम से कम आज चटनी रोटी नहीं खानी पड़ती। आत्महत्या करने को कह रहे हो। पहले कफन का व्यवस्था कर लेना तो आत्महत्या करना। कोई निमन्न साड़ी भी नहीं है की तुहें ओढा दूंगी। अरे तुम्हारे बाप का खटिया कटाया है तो मत देना साडी। चुड़ी, बिंदी और सिंदूर भी मत देना। आत्महत्या काहें करोगे। एक बेटी पैदा किये हो उसका तो कहीं शादी कर दो। फिर कर लेना आत्महत्या। मैं भी तुम्हारे साथ मर जाउंगी तो मेरा बन आयेगा। रघुआ कांपते हाथों से किसी तरह आधी रोटी खाया। खाने के बाद वह लेट गया। वह नशा में जरुर था पर उसके दिलों दिमाग में राहत चेक न मिलने का कशिश। वह खुद से शर्मिंदा भी था। उसे इस बात की भी चिंता थी कि सुबह खाद वाला पैसे के लिए तगादा करने आया तो क्या बहाना करेगा। अगर अगली साल खेती भी करूँ तो कौन कर्ज देगा? एक साथ कई सवाल उसके मन में उमड़ घुमड़ रहे थे। पूनम की रात। सभी नींद में सोये थे। वह तनहा जगा था। उसे बार बार लग रहा था कि सूखे ने उसकी जिन्दगी ख़त्म कर दी।। अगर राहत चेक भी मिल गया होता तो कुछ राहत की बात थी।
विधायक के दिए सौ रूपये में 50 रूपये अभी उसके पास बचे थे। वह झटका से उठा और 50रूपये का नोट धनवंती के सिरहाने रख दिया। मन ही मन सोचा अब इतना में तो कफन मिल ही जाएगा। वह सोच रहा था आदमी क्यों ज़िंदा है। आदमी जब मरता है तो कुछ देकर जाता है। धन-दौलत और बैंक बैलेंस। मैं देकर जा रहा हूँ कर्ज। उसके साथ कफन के लिए पैसा।
रघुआ दूसरे कमरे गया। वहां एक रस्सो के सहारे बडेर से लटक कर जान दे दी रात भर उसका शव लटका रहा। सुबह जब उसकी लुगाई उठी तो विस्तर पर 50 का नोट देख समझ गई कि रघुआ ने ही रखा होगा। उसे अपनी गलतियों का एहसास हुआ तभी यैसा किया होगा। आज बाजार से सब्जियां मैं भी लाऊंगी। आज के दिन दिन रोटी के साथ सिर्फ चटनी नहीं बल्कि सब्जियां भी हम लोग खायेंगे। जब रघुआ को खाट पर नहीं देखी तो सोची खेत में निपटने गया होगा। वह घरों में झाड़ू लगा रही थी। तभी रघुआ को फांसी पर झूलता देख जोर से चिल्लाई। आसपास के लोग भी जुट गये। कुछ ही देर में पुलिस भी आ गई।। शव को नीचे उतारा गया। रघुआ की लाश से लिपटकर धनवंती दहाड़े मार रो रही थी। आखिर क्यों लिया इतना भयानक फैसला। गया भी तो कर्ज में छोड़कर। अरे जब तू मर्द इन संकटों से घबड़ा गया तो मैं तो औरत हूँ।
धनवंती के साथ उसकी बेटी नीलू भी अपने बाप की मौत पर आंसूं बहा रही थी। माँ-बेटी की आंसुओं की धारा देख वहां सबकी आँखें नम थी। गरीब किसान रघुआ की लाचारी को न सरकारें समझ पायी और न ही विधायक जी। धनवंती राढ़ हो गई और नीलू अनाथ। दोनों की आँखों में असह दर्द। रोते समय बाजुओं को जोर से जमीन पर पटकने से हाथ छिल गये थे...और शायद आत्मा भी।
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर
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