Sunday, 12 June 2016

काशी के लल्लापुरा में कुछ शोहदों ने एक लड़की को जला दिया थाा ।  27 दिसंबंर 2014  को उसकी मौत हो गई। गई थी। काशी की इस बेटी को समर्पित उसी दिन मैंने यह कविता लिखी थी। आज इसे यहां पोस्ट कर रहा हूं।  

कोई है जो यह कह सकेगायह मेरी काशी है।


आज रो रहा मैं, अश्कों के बगैर
कतरा-कतरा मेरे आंखों से टपक रहा
काशी की बेटी जला दी गई सरे मुहल्ले में
चीखती मगर जुबा पर आवाज न थी
मौत लहरा रही थी उसके चेहरे पर
वो जल्लाद अट्टहास भर रहा था
वह हर चेहरे को खुदा मान
जिंदगी की गुहार लगा रही थी
पर सभी अंगद के पांव की भांति जम गये
किसी के दिल से आह भी न निकली
आखिर आठ दिन बाद उसने
दुनियां को अलविदा कह दिया
आज से आठ दिन पहले
इसी काशी के आंगन में
धूप भरे दामन में
वह चहकती थी, खिलखिलाकर हंसती थी
पर रात में मौत का पैगाम आया
उसे अपनों ने हिलाया-डुलाया
अब वह एक लाश थी
वह अपना मृत शरीर छोड़ गई
नोचने को, खेलने को, उन जल्लादों के लिए
जो कभी उसके जज्बातों से खेलते थे
अपनी मौत के साथ एक प्रश्न छोड़ गई
आखिर यह काशी किसकी है।
जहां हैवानियत का नंगा नाच होता है
लोग दूसरे के जज्बातों से खेलते हैं
लड़कियां जलाई जातीं हैं
कोई है जो इसका श्रेय लेगा
कोई है जो यह कह सकेगा
यह मेरी काशी है, यह मेरी काशी है।
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

No comments:

Post a Comment