Saturday, 11 June 2016

गौरेया तुम कहां हो

गाय चराने गई मीरा अभी आधा रास्ता ही तय कर पाई थी। उसे कोई ख़ास जल्दी नहीं थी। वह कई दिनों से घर में कैद थी। आज जब वह गाँव के सिवान में निकली तो लगा कि सारा जहाँ उसका अपना था। वह खुद से बार-बार सवाल करती, अभी वह सातवीं में ही तो पढ़ रही थी। बापू ने आखिर उसे स्कूल जाने से क्यों रोक दिया। माँ कहती कि तुम्हारी बुआ तो सिर्फ चौथी तक ही पढ़ी हैं, तुम पढ़कर क्या कलक्टर बनोगी। अब माँ-बापू को कौन समझाए कि भैया तो बीए पास कर लिए। वो कलक्टर तो नहीं बन पाए। भैया को तो बीए करा दिया और मुझे सातवीं भी नहीं। पास के तालाब में गाय पानी पीने के लिए रुक गई। पेड़ों पर गौरेया की चूं-चूं करती आवाज को सुनकर वह आकर्षित हो आगे बढ़ने लगी। दिनभर की उड़ान के बाद घोंसलों की ओर लौटते पक्षी और इन्तजार करते बच्चों बच्चों का शोर ….. मीरा का नन्हां सा दिल ख़ुशी से जोर-जोर से धड़कने लगा। उसका भी मन हुआ उनके इस खेल में शामिल हो जाय। गहरी होती साँझ ने उसने अपना कदम वापस मोड़ लिए। जब मीरा सिवान से गाय लेकर वापस आ रही थी तो उसकी सहेलियां निर्मला, गीता और नीलम स्कूल से किताबों का बस्ता लेकर घर की ओर। मन ही मन वह सोच रही थी इनके बापू कितने अच्छे। मेरी सहेलियां पढ़ लिखकर मास्टर बनेंगी। कोई डाक्टर बनेंगी और मैं गैया चराउंगी। ना ऐसा मैं होने नहीं दूंगी। मीरा ने मन ही मन प्रण कर लिया कि जब तक बापू स्कूल नहीं भेजेंगे वह अन्न का एक दाना ग्रहण नहीं करेगी।…..
घर पहुँचते ही वह अपनी माँ पर बिफर पड़ी। यह लो अपनी गैया व डंडा। हमें चरवाहा नहीं बनना। मीरा की माँ रामकली उसे सीने से लगा पुचकारने लगी, क्या हो गया मेरी दुलारी को। माँ का प्यार पा मीरा गदगद हो गई। उसे लगा जैसे सपनों से भरी मीठी नींद उसे शुभकामनाएं दे रही थी। तभी दादी उसके लिए खाना लेकर आई। मीरा ने थाली को आगे खिसका दिया। बोली-मुझे भूख नहीं। लगता है मेरी लाडली थक गई है। ठीक है चल तुझे आज मैं अपनी हाथों से खिला देती हूँ। मीरा ने अबकी साफ़-साफ़ कह दिया जबतक उसे स्कूल नहीं भेजा जाएगा वह नहीं खाएगी। अचानक! एक महीन सीटी की आवाज उसकी कानों से टकराई। माघ के महीने में उसके भीतर पूस जैसी ठंडी लहर दौड़ गई। यह किसी गौरेया की आवाज नहीं थी। यह उसकी सहेली निर्मला थी। मीरा उसके सामने नहीं पड़ना चाह रही थी। वह ताना मारेगी। पूछेगी मीरा तुम स्कूल क्यों नहीं जा रही हो। अभी वह कहीं भाग पाती कि निर्मला आंगन में दाखिल हो गई। बोली-मीरा कल से मुझे भी तुम्हारे साथ गैया चराने जाना है। काहें क्या हुआ स्कूल नहीं जाओगी? मीरा ने उत्सुकता बस सवाल किये नहीं कि सखी निर्मला का आज से स्कूल जाना बंद। बापू कह रहे थे चिठ्ठी-पत्री लिखना सीख गई। अब स्कूल जाकर क्या करोगी। घर का चौका बर्तन संभालो। एक गाय है उसे सिवान में चराने ले जाया करो। निर्मला की बातों को सुनकर मीरा जैसे शून्य में चली गई। वह कभी अपनी माँ को तो कभी दादी को निहारती। आगे बढ़कर उसने निर्मला का हाथ कसकर पकड़ लिया, फिर उसकी आँखों में आँखे डालकर – हम लड़कियों की जिन्दगी दूसरों के रहमों-करम पर आश्रित है। जब हमारे अवसरों व सपनों को माँ बाप ही मार दे रहे हैं तो आगे किसपर भरोसा करें। आज भी लड़की लड़का में इतना भेद। हे भगवान! अगले जन्म मुझे गौरेया बना देना पर लड़की नहीं। चूं-चूं करने से तो कोई नहीं रोकेगा। आसमान में जी भर के उड़ तो सकूंगी। बगैर बाल हठ किये उसे भरोसा हो गया था कि वह कभी स्कूल नहीं जा पाएगी।
दूसरे दिन चिड़ियों की चहचाहाहट बढ़ती जा रही थी। सूरज अपनी पूरी चमक के साथ सर पर चढ़ आया। मीरा घर के आंगन में बैठकर चिड़ियों को गौर से देख रही थी। इधर से उधर फुदकतीं नन्हीं सी पैरों के बल चीं-चीं की आवाज सुनने की बाद और कुछ देखने और सुनने की हसरत नहीं थी। मगर बगीचे में गौरेया के परिवार को वह कैसे भूल सकती। मीरा की पहली संवेदना तो वहीं से जगी थी। अब निर्मला भी आ चुकी थी। दोनों अपनी-अपनी गैया लेकर सिवान की और निकल गई। बगीचे में गिरे सूखे पत्ते को अपनी पैरों से दबाते हुए दोनों आगे बढ़ रही थीं। दोनों के हाथ में गाय की रस्सियाँ थीं और पीछे-पीछे गाय। गौरेया के घोसले वाले पेड़ के पास आकर मीरा के कदम ठिठक गये। उसने एक पेड़ के जमीन के ऊपर निकले एक सोर से गाय को बाँध दिया। आज चूं-चूं की आवाज उसे सुनाई नहीं दे रही थी। उधर से एक आदमी बागीचे से होकर गुजर रहा था। मीरा को घबड़ाया हुआ देखकर पूछ लिया। बेटी- तुम क्या ढूंढ रही हो। मीरा बोली-चाचा इस पेड़ पर गौरेया का घोसला है। रोज उनकी चहचहाहट से बगीचा गुलजार रहता था। आज उनकी आवाज नहीं सुनाई दे रही। बेटी तुम भी तो गौरेया ही हो। तुम्हारी भी आवाज किसी गौरेया से कम मीठी नहीं। हाँ अंकल, आप सही कह रहे हो, मैं गौरेया ही हूँ पर उड़ नहीं सकती। मैं उड़ना सीखूं उससे पहले ही मेरे पर कतर दिए गए। अब मैं सिर्फ चल सकती हूँ। आकाश नहीं नाप सकती।
आखिर गौरेया नहीं मिली। उसकी आवाज भी नहीं सुनाई दी। निर्मला बोली-मीरा हमें तो लगता है कि तुम पिछले जन्म में इन्हीं घोसले में रहती थी। तभी तो इनके लिए तुम्हारे भीतर इतनी छटपटाहट है। निर्मला तुम भूल रही हो। हम सभी लड़कियां गौरेया ही तो हैं। अगर महसूस करो तो। जब घर के आँगन में महिलायें पथार डालेंगी तभी ये दाना चूंग सकती हैं। यही हाल हमारा है। घर में रखा चीज कुछ खाने जाओ तो माँ कहेगी यह भैया के लिए रखा है। जब हाथ पर मिले तभी खा सकती हैं। …. आखिर इसे क्या कहेंगे। पथार ही तो है हम बेटियों के हिस्से।
धीरे-धीरे शाम होने को थी। दोनों सहेलियां गायों को लेकर घर आ गयीं। थका होने के बाद भी मीरा को नींद नहीं आ रही थी। और मुझे (अजय) को भी नहीं। इस कहानी को आज ही पूरी करने की जिद जो थी। गौरेया तुम कहाँ हो … कहानी की नायिका और लेखक साथ-जग रहे थे। मीरा को गौरेया की चिंता थी तो मुझे कहानी पूरी करने की। गौरेया मीरा की रोम-रोम में बस गई थी। जब भोर हुई तो मीरा दरवाजा की कुण्डी धीरे से खोली और बाहर निकल गई। सड़क, खेत पार कर कच्चे रास्ते पर सन्नाटे को चीर कर बीच-बीच में गौरेया की आवाज को थामे। ( काश! की क्षणिक और उदास जीवन में उठी ये पहली लहर सब कुछ बहा ले जाती। बागीचे की इस सूनेपन में एक ह्रदय, दूसरे ह्रदय की आहटें सुन और समझ पाता…)
चांदनी अभी भी कहीं-कहीं छितराई हुई थी। पेड़ भी नींद में थे और और पगली मीरा नंगे पैर, नसों में दौड़ते हुए गर्म-खून और दिल की कंपकंपाहट को काबू में कर पेड़ की टहनियों को पकड़े चिड़ियों की तरह ऊपर और ऊपर चढ़ती चली जा रही थी। शायद वह गौरेया के घोसले को ढूंढ रही थी। ओस में नहाई गहरी हरी पत्तियां और अलसाई टहनियां। एक चिड़िया बेवक्त मेहमान की आहट सुन फड़फाड़ाने लगी। गिलहरी सरपट नीचे दौड़ गई। कोयल सहेली को पहचानकर दूसरी टहनी पर सरक गई। मीरा के लिए सब कुछ पहचाना हुआ था। इस टहनी पर से उसने कई बार छलांग लगाई थी। उसे पता था कि यह टहनी ऊपर की शाखाओं से जाकर मिलती है। कुछ ही देर में वह गौरेया के घोसला के पास पहुँचने वाली थी।
असली कहानी अब शुरू होती है। धीमे और सधे क़दमों से आखिर वह मंजिल तक पहुँच ही गई। लेकिन यह क्या उस घोसले में तो गौरेया थी ही नहीं। घोसले में गौरेया की निशानी सिर्फ उसके पंख थे। आखिर ये कहाँ गई। मीरा घोसले में हाथ डालना चाही कि अन्दर कुंडली मार बैठा सांप ने लपक कर उसे डंस लिया। अब मीरा समझ चुकी थी कि गौरेया को खा लिया होगा। वह दर्द के मारे चीख रही थी। उसके हाथ ठीले पड़ रहे थे। कुछ ही देर बाद टहनी उसके हाथ से छुट गई। वह धरती की गोंद में जा गिरी। सांप का विष धीरे-धीरे उसके शरीर में फ़ैल रहा था। वह बेहोश हो गई। अब उसका शरीर नीला पड़ने लगा था।
अब सुबह हो चुकी थी। मीरा को घर में न देखकर उसकी मां किसी अनहोनी से घबड़ा गई। काफी खोजबीन के बाद भी उसका पता नहीं चला। निर्मला भी आ चुकी थी। घर के लोग भागे-भागे सिवान की ओर गये। साथ में निर्मला भी थी। बगीचे में पेड़ के पास उसे पड़ा देख सभी चीख पड़े। उसके शरीर में कोई कंपन भी नहीं थी। वह समाधि में लीन किसी योगी की तरह लेटी हुई थी। उसका नब्ज भी स्थिर हो गया था। उसे स्कूल जाने की जिद नहीं थी। अब उसे अपने बापू से भी कोई शिकायत नहीं थी। निर्मला उसके शरीर को झकझोर कर सवाल कर रही थी, गौरेया तुम कुछ बोल क्यों नहीं रही। तुम अपने निर्मला को अकेली छोड़कर क्यों चली गई। आखिर मैं गैया चराने किसके साथ जाउंगी। पर जो सवाल मीरा छोड़कर इस दुनिया से विदा हो गई उसका जवाब किसी के पास नहीं था। लोगों का शोरगुल सुनकर सांप घोसले से जैसे भगा। घोसला मीरा के बदन पर आ गिरा। लोगों ने देखा उसमें भी गौरेया नहीं थी।
अजय पाण्डेय, सुहवल
गाजीपुर

No comments:

Post a Comment