नहीं आये अच्छे दिन
दिन गये, साल गये
नहीं आये अच्छे दिन
वह जो तट को छू
चाय की प्याली में
लहर को उछाल गया था
सिर्फ चुनावी हवा थी
मंचों से किये गये वादे
अब भूली बिसरी
कथा बन गई
किसी अकथ व्यथा की तरह
अपनों से लड़कर-भिड़कर
बूथों पर कमल खिलाई
हमें नहीं पता था उसकी तरुणाई
अब तो अच्छे दिन के इंतजार में
आंखें भी पथराई
हम जिसे समझ लिये थे मोती और मूंगा
वह निकला शंख और घोंघा
पीछे से फूंको तो तेज आवाज
अंदर से खोखला
रात में सोये तो
सपने में गांधी जी बोले
मत उदास हो बालक
अब तो तेरे शहर में दौड़ेगी मेट्रो
शहर का विकास भी उसी रफ्तार में होगा
मैंने साहस कर पूछ लिया
गांधी जी आप को गुजरात के साबरमती में रहते हो
फिर यूपी में कहां भटक रहे हो
गांधी जी बोले-नाथूराम के भक्तों से खतरा है
गुजरात से महराष्ट्र तक
हरियाणा से झारखंड तक में
इनकी ही चलती है
एक यूपी ही बचा है
जहां गांधी सुरक्षित हैं
जो मैने 'मुक्तिदूत' में कहा था
वही आज 'पीके' कह रहा है
बवाल तब भी मचा था
बवाल अब भी मचा है
अब अपनों से मत लड़ना-भिड़ना
गोडसे नहीं, गांधी के ही रास्तों पर चलना
अच्छे दिनों के चक्कर में मत पड़ना
मुझे यूपी में रहने देना, मुझे यूपी में रहने देना।
अजय पाण्डेय
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