छोटा ही सही कलमकार बन गया
मुझे आज भी याद है वह दिन
जब दूसरी, तीसरी कक्षा में था
शाम को छुट्टी की घंटी बजती
बहुत खुश होता.घर जाता
नीम के पेड़ पर चढ़कर
दोस्तों संग ओलापाती खेलता
सभी त्यौहार याद रहता
ऐसा नहीं की पढ़ने में तेज था
इसलिये कि उस दिन छुट्टी रहती
किताब छोड़ गुल्ली डंडा खेलता
पाठ भले न याद हो
अगली छुट्टियाँ जरुर याद रहती
बड़ा होता गया आठवी, नवी
फिर दसवीं में पहुंच गया
अब झूठ बोलकर छुट्टियाँ लेने लगा
कभी खुद बीमार होता तो कभी
माँ को भी बीमार कर देता
मामा, बुआ के यहाँ जाकर
मस्ती करता, पकवान तोड़ता
इस छुट्टी की आदत ने
पढाई में कमजोर कर दिया
गुरुजनों के निगाह से भी गिरा दिया
छोटा भाई प्रथम तो मै
मैं सेकंड से पास हुआ
ग्यारहवीं, बारहवीं और
बीए तक यही हाल रहा
अगर कोई सवाल फंसता तो
पिताजी कहते छोटे भाई से पूछ लो
अब तो घर में छोटे भाई की ही पूछ थी
पहनने, खाने की खूब छूट थी
पिताजी का सपना था
की मैं अध्यापक बनूं
पर पत्रकार बन गया
छोटा ही सही कलमकार बन गया
यहाँ भी छुट्टियां पीछा नहीं छोड़ रही
यह कैसी क़यामत ढा रही
यह मेरा साथ नहीं छोड़ती
या मैं खुद बंधा हूँ इस डोर से
अगर हाँ तो काटूँगा इस डोर को
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