Sunday, 12 June 2016

गांधी जी के साथ अखलाक को भी नमन 

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मजहब के नाम पर बने देश में इंसानों की जिन्दगी दर्दनाक अंत की ओर बढ़ने लगती है। जैसे जंगल के जीव अपने से कमजोर जीव-जंतु का शिकार कर अपनी भूख मिटाते हैं ठीक इसी प्रकार धरती के मजहबी प्राणी अपने मजहब को ज़िंदा रखने के लिए मनुष्य के साथ इंसानियत का भी कत्ल कर देते हैं।
आपके मन में भी शायद येसा विचार कभी जरुर आया होगा। दादरी में जो कुछ हुआ सारी सीमाएं तोड़ दी। इंसानियत की दीवार ढह गई। हमाम में सभी नंगे हो गये। हद तो तब हो गई जब बजीर ने कहा-यह एक हादसा था। उन्मादी मजहबी भीड़ यैसे बयान देने वाले बजीर को 24 कैरेट का नेता मानती है।
अब मंदिरों में ईश्वर भी कलंकित हो रहे हैं। मंदिर में प्रार्थना सभा नहीं इंसान को इंसान का खून पीने के लिए उकसाया जा रहा है। दादरी में जिस अखलाख की ह्त्या कर दी गई उसका गवाह वह मंदिर भी है जहां से गाय का मांस पकने का अफवाह फैलाया गया। बजीर साहब यह हादसा नहीं आतंक है। बाहरी दुनिया में तो आतंकबाद पर अच्छा बोल लेते हैं पर जब घर में होता है तो हादसा बता देते हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की आज जयंती है। यै मानवता खून करने वालों तुम्हारे कृत्यों को जानकार अहिंसा का यह पुजारी आज राजघाट पर बैठ आंसू बहा रहा होगा। अगर तुम गाँधी को माला पहनाने राजघाट जाना तो वही पर दो फूल अखलाक को भी चढाकर पश्चाताप के दो आंसूं जरुर बहा लेना। इससे तुम्हारा पाप शायद कुछ कम हो जाय।
राम हों या रहीम अगर मनुष्य में भेद पैदा करें तो दोनों ही हमारे आदर्श नहीं हो सकते। अगर मंदिर-मस्जिद से देश में अशान्ति फैलाने और खून करने की साजिश रची जाती हो तो वहां ईश्वर-अल्ला नहीं हो सकते।
गाँधी जी ने मुक्तिदूत में मनुवाद पर प्रहार करते हुए कहां था-
अगर हरिजन के छू लेने से मंदिर का है कल्याण नहीं, तो मैं कहूंगा मंदिर में सब पत्थर है भगवान नहीं।
मनुवाद पर प्रहार करने वाले गांधी अगर जाने होते कि उसी पत्थर के मंदिर से मनुष्य का खून बहाने का आह्वान किया जाएगा तो कुछ और ही लिखे होते। मनुष्य से भेदभाव करने वाले जानवरों में भी भेद कर रहे हैं। बीफ़ के मांस का तो विरोध करते हैं पर होटलों में बैठकर चिकेन और बिरयानी खाते हैं। जीव तो जीव होता है। क़त्ल तो कत्ल होता है। चाहे वह मनुष्य, गाय, सुअर, बकरी, मुर्गी और ऊंट ही कयों न हों। यह हम नहीं कह रहे गांधी जी के अहिंसा के पाठ में हमें बताया गया है।

 अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

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