Saturday, 11 June 2016


थपकी

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किसी भी तस्वीर को देखकर लोग अलग-अलग तरह से विचार व्यक्त करते है। हर विचार व्यक्तिगत होता है। अगर किसी को पसंद आ जाए तो अपना लेता है। हर किसी का सपना होता है कि उसकी जिन्दगी सूरज की तरह हो। दुःख हो या सुख एकरूपता बना रहे। मेरे साथ उल्टा है। मेरे लिए तो जिन्दगी ही सबसे बड़ा सपना है। सबसे बड़ा प्रेरणाश्रोत है। इसके सामने रात में आने वाले सपने भी बहुत छोटे हैं.... अधूरे हैं....।
महज तीन साल की उम्र में थपकी की माँ नहीं रही। अब उसका देखभाल कौन करता। बाप भी शराबी। थपकी की मौसी रंजना उसे अपने साथ जबलपुर लेते गई। उसका लालन-पालन अब रंजना ही कर रही थी। धीरे-धीरे थपकी बड़ी होने लगी। वह रंजना को ही अपनी माँ समझती। रंजना कहती कि मैं तो तेरी मौसी हूँ। तब मेरी माँ कहाँ है- बता न मौसी। 
तुम्हारी माँ आसमान में है। चाँद-तारों के साथ। 
वह वहां क्या कर रही है। मेरे साथ क्यों नहीं है। 
वह वहीं से तुझे देख रही है। तेरा देखभाल करने के लिए मेरे पास छोड़ गई है। 
पर उस माँ को मैं तो नहीं देख सकती न। वह मेरे पास कब आएगी। मेरी माँ को जल्दी बुलाओ न मौसी। उससे कह देना कि अगर वह नहीं आई तो मैं खुद उसके पास जाउंगी। थपकी के इस तरह के सवालों से रंजना घबडा जाती। उसे समझाने का प्रयास करती। रंजना की बातों से संतुष्ट हो थपकी फिर अपने कामों में लग जाती।
रंजना काफी धार्मिक महिला थी। पूजा-पाठ किये बगैर अन्न का एक दाना भी मुंह में नहीं डालती। एक दिन घर के आंगन में वह सूर्य देव को जल दे रही थी। थपकी भी वहीं पास कड़ी था। रंजना को जल गिराते देख थपकी भी सूर्य देव की और मुंह कर जल गिराने लगी। थपकी की चंचलता देख रंजना का भी बाल मन उमड़ने घुमड़ने लगता। 
रंजना ने थपकी से पूछा की सूर्य देव से तुमने क्या माँगा है। यही सवाल थपकी ने रंजना से किया। रंजना ने तपाक से कहा-तुम्हारी और तुम्हारी माँ की सलामती। अबोध थपकी में मन में यह बात अन्दर तक समा गई। अब वह प्रतिदिन सूर्य देव को जल देने लगी। सूरज को प्रणाम करते हुए कहती मेरी माँ आकाश में चाँद तारों के पास है। उसे सलामत से रखना। मेरी माँ से कहना थपकी तुम्हे बहुत याद करती है। उसे मेरे पास कब भेजेंगे। माँ तुम बहुत याद आती हो। अब तो थपकी को पूर्ण विश्वास हो चूका था कि सूर्य देव एक दिन उसकी माँ से जरुर मिलवा देंगे। 
धीरे-धीरे थपकी बड़ी होती गई। इसके साथ ही समझदारी भी आने लगी। 16 वसंत देख चुकी थपकी आत्म विश्वास से भरी थी। थपकी की माँ नहीं आई पर उसने सूर्य को जल देना नहीं छोड़ा। 
थपकी को बड़ा होता देख उसकी मौसी रंजना भी शादी को लेकर परेशान रहती। समय से कोई अच्छा लड़का मिल जाय बस झट से हाथ पीले कर दूँ। वह मन ही मन सोच रही थी। जब रंजना दसवीं में थी तभी शादी हो गई थी। इसके बाद वह बनारस से जबलपुर आ गई। थपकी तो 12वीं में पढ़ रही है। रंजना ने अपने अध्यापक पति अनिल से थपकी के लिए लड़का ढूंढने के लिए बोली। अनिल इसके लिए तैयार नहीं था। वह चाहता था कि थपकी आगे की पढ़ाई जारी रखे। जब उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद पैरों पर खड़ी हो जायेगी तब शादी करना ठीक रहेगा।
रंजना की जिद के आगे अनिल को झुकना पडा। क्या सच में लड़कियां बोझ होती है? क्या लडकियों को पढने का कोई अधिकार नहीं? अगर थपकी की माँ होती तो क्या उसे पढ़ाई पूरी करने नहीं देती?तमाम तरह के सवाल अनिल के मन में उमड़-घुमड़ रहा था। आखिर उसका बाप तो है। इतने दिन हो गये। अबतक थपकी की खोज खबर भी लेने नहीं आया...और हाँ थपकी भी उसे कभी याद नहीं करती। याद करती भी कैसे रंजना ने उसे सब बताया था कि उसके बापू उसकी माँ को जरा सी बातों पर कैसे पिटाई करते थे। उसकी माँ ने बहुत जुल्म सहे। हे भगवान! किसी महिला को यैसा बेरहम पति मत देना। 
थपकी को जब पता चला कि उसकी शादी के लिए लड़का देखा जा रहा है तो वह परेशान हो गई। वह रंजना के कमरे में गई। अनिल भी वहीँ बैठा हुआ था। 
थपकी तपाक से बोली-मौसी क्या मैं तुम्हारी बेटी नहीं हूँ इसलिए मुझे जल्दी से विदा कर देना चाहती हो। क्या मेरी माँ के आने का इन्तजार नहीं करोगी। क्या तुम नहीं चाहती कि मेरी माँ इस आंगन से मुझे ख़ुशी-ख़ुशी विदा करे। थपकी ने रंजना के सामने सवालों की झड़ी लगा थी। उसकी इन बातों पर रंजना को जैसे काठ मार गया। थपकी की तरफ देखी तो बस देखती रह गयी। इन सवालों का उत्तर न पाकर थपकी की आँखों में आंसूं आ गये। थपकी को रोता देख रंजना और अनिल की आँखे भी नम हो गई। रंजना ने दौड़कर थपकी को गले से लगा लिया। उसे समझाने का प्रयास करती। हम औरतों की किस्मत ही यैसी है। अपना कोई घर नहीं। बचपन में माँ और बापू का घर। जब थोड़ी समझदारी आई तो पति का घर... और बुढापे में .. अब बस भी कर मौसी। तपाक से थपकी बोल उठी। मुझे ज्ञान की बातें न बता। अगर मैं तेरे लिए बोझ हो गई तो जल्दी से कर दे मेरी शादी।
मौसी मुझे अब पता चला कि लड़कियां पराई होतीं हैं। मैं कितना मूर्ख कि 21वीं सदी में जी रही हूँ।। मैं सचमुच घर से निकालने योग्य हो गयी हूँ। मुझे पढ़ा-लिखाकर क्या करोगी। अब कर दो मुझे दूसरे के हवाले।। मुझे अब यह भी पता है कि मेरी माँ नहीं है। अगर रहती भी तो क्या करती। वही करती जो आज तुम कर रही हो। 
किसी मृत अपनों से अटूट भावनात्मक संबंधों को जीने के भाव पर भी थपकी प्रहार करती है। उसका विवेक रंजना के तर्कसंगत को पूरी तरह नकार नहीं पाता। 
अनिल थपकी को समझाते हुए कहता है-तुम एक लड़की होने से पहले मनुष्य हो। मनुष्य न तो सिर्फ पुरुष है और न सिर्फ स्त्री ही... दोनों मिलकर एक होते हैं। 
लेकिन मैं अबतक माँ के सहारे ज़िंदा थी। बचपन में जैसा की मौसी ने बताया था कि मेरी माँ आकाश में चाँद-तारों के साथ है। बड़ी हुई तो यह एहसास हुआ कि कोई मनुष्य चाँद-तारों पर कैसे रह सकता है। माँ शब्द से मेरा भावनात्मक लगाव हो गया। अब वह माँ मेरे ह्रदय में, मेरी साँसों में भावनातमक रूप से रहने लगी। मौसी ने भी माँ का प्यार दिया....पर ज़िंदा रही आशा के सहारे। वह आशा भी मुझे मौसी ने ही दी। माँ के आने की आशा। 
असमय अगर बादलों की ओट में सूर्य अस्त हुआ सा लगे तो क्या अन्धकार ही सत्य हो जाएगा? अगर प्रभात में, आकाश में अरुण प्रकाश छा जाए तो क्या आँखों को बंद कर हम कह सकेंगे कि अब भी अन्धकार है? मैं तो प्रभात पर ही विश्वास कर अबतक रातें बिताते आई हूँ। 
अब अपने जीवन का फैसला मौसी और मौसा पर छोडती हूँ।
आखिर वह दिन आ ही गया। जिसका रंजना को इन्तजार रहा। थपकी के लिए लड़का मिल गया। सुन्दर, सुशील के साथ प्राइवेट नौकरी वाला। वेतन इतना कि एक परिवार का गुजर-बसर आराम से हो जाय। दान-दहेज़ की कोई माग भी नहीं। बस क्या था। रंजना यह मौक़ा खोना नहीं चाहती थी। बस चट मंगनी पट विवाह। दोनों तरफ विवाह की तैयारियां होने लगी। घर में मंगल गीत की गूंज थी। इधर थपकी के आँखों के आंसूं रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था। विवाह के हर रश्म पर उसे माँ की याद आती। मुंह से गर्म सांस भरते हुए.... बापू को माँ से झगड़ा था। आखिर मैं उनकी ही तो बेटी हूँ। मुझे उन्होंने क्यों भुला दिया। माँ तो इस दुनियां में नहीं है। बापू रहते हुए भी नहीं हैं। आज मैं अनाथ और दुनियां की सबसे अभागिन लड़की। आखिर जब दूसरों के हालत पर ही छोड़ना था तो पैदा क्यों किया? 
31 मई को शादी का दिन था। मई के अंतिम दिन साल के सबसे लम्बे दिन होते हैं। बैंड बाजों के साथ बरात आ गई। पहले मंत्रोचार के बीच द्वारपूजा फिर शादी की रश्म पूरी हुई। सुबह जब विदाई का समय हुआ तो लड़का एक शर्त रख दी। पहले वह थपकी से मिलेगा फिर विदाई होगी। थपकी के मौसा-मौसी परेशान हो गये। आखिर बात क्या है। अगर पहले से कोई शर्त थी तो शादी के पहले लड़के (मनीष) ने बताया क्यों नहीं?
थपकी को मनीष उसके जीवन का सबसे बड़ा उपहार देना चाहता था। वह चाहता था कि जब उसकी थपकी यहाँ से विदा हो तो उसे लगे कि वह ससुराल नहीं बल्कि अपने घर जा रही है। 
वह थपकी से मिलने उसके कमरे में गया। वह लाल जोड़े में सिर झुकाए बैठी थी। मनीष के साथ रंजना और अनिल भी था। उसके पीछे मनीष के माता-पिता। 
मनीष अपनी माँ का हाथ पकड कर थपकी के पास ले आया। थपकी खड़ी हो गयी। मनीष ने अपनी माँ की तरफ इशारा करते हुए कहा- थपकी यही तुम्हारी माँ है। समझो तुम्हारी माँ चाँद तारों को छोड़कर तुम्हारे पास आ गई। सूर्य देव ने तम्हारी सुन ली। इसलिए तो तुम्हारी माँ को वापस तुम्हारे पास भेज दिया। इस आंगन से तुम्हारी माँ तुम्हे विदा करेगी। यह माँ अब सदा तुम्हारे साथ रहेगी। थपकी का हाँथ पकड कर अपने बापू के हाँथ में देते हुए मनीष ने कहा... और ये हैं तुम्हारे बापू।
फिर क्या था, थपकी अपनी माँ से लिपट कर रोने लगी। माँ तुम मुझे छोड़कर क्यों चली गई थी? मैंने 16 साल बिना माँ के कैसे बिताये तुम्हे क्या पता। थपकी की माँ भी रो रही थी। बेटी थपकी अब मैं कभी तुम्हे अपनों से दूर नहीं होने दूंगी। एक माँ और बेटी का बिरह मिलन देख वहां मौजूद सभी की आँखे भर आई।
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

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