Friday, 10 June 2016

पानी की जगह बीयर.. और बोदका

दूनिया में पानी संकट ने मुझे भी कुछ लिखने के लिए मजबूर कर दिया। बीसीसीआई ने महाराष्ट्र सरकार से पूछा है कि सौ करोड़ रुपये चाहिए या पानी? यही प्रश्न अगर एक प्यासे से पूछा जाए तो शायद वह पानी को प्राथमिकता देगा। अगर सिर्फ पैसा मिले पानी न मिले तो वह मर जाएगा। पानी पीने के बाद वह जिंदा तो रहेगा।
रविवार को मैं मिर्जापुर की यात्रा पर था। मेरे साथ काशी के मित्र मनोज सिंह चंचल और धमेंद्र जी भी थे। गर्मी बहुत थी। इस कारण मनोज ने कहा कि अजय जी आप अपनी बाइक मेरे यहां ही रख दीजिए। हम लोग कार से चलते हैं। सुबह के दस बज रहे थे। तेज धूप के साथ ही गाड़ी भी हाइबे पर फर्राटे भर रही थी। हम लोग अंदर थे फिर भी इतनी गर्मी। बीच रास्ते में प्यास लगी। हाइबे के इधर-उधर ताक झांक करने के बाद भी कोई दुकान दिखाई नहीं दी। अगर पहले ही पानी का बोतल रख लिए होते तो शायद इतनी परेशानी नहीं होती। कुछ दूर आगे बढने के बाद धमेंद्र ने गाड़ी रोकी। कहा- प्यास बहुत लगी है अब आगे नहीं बढ़ा जा रहा। गाड़ी को बाइपास के रास्ते हाइबे से नीचे उतारते हैं। जब बाइपास के रास्ते हम लोग आगे बढे़ तो एक दूकान दिखाई दी। मनोज ने वहीं गाड़ी रोक दी। जब बोर्ड पर मेरी नजर गई तो वह बीयर की दुकान थी। 37 डिग्री तापमान में मेरे शरीर के साथ दिमाग भी उबल रहा है। मैंने कहा, यार यह क्या मजाक है। कह रहे थे प्यास लगी है यहां पानी कहां मिलेगा। यह तो बीयर की दुकान है। मनोज मुस्कराने लगा.. यार पाण्डेय जी अब इतना भी नादानी ठीक नहीं। पानी नहीं मिला तो क्या हुआ बीयर तो है। इसी से प्यास बुझा लेते हैं। मुझे लगा ये दोनों तो अजीब आदमी हैं। बीयर से कहीं प्यास बुझती है क्या? मनोज ने अपने पर्स से पांच सौ के नोट निकाले और दुकानदार को देते हुए कहा, तीन बीयर देना। प्यास के मारे मेरे होठ भी सूख रहे थे। ठीक से आवाज भी नहीं निकल पा रही थी। मैंने धीरे से कहा, मुझे नहीं बीयर पीना। अगर पानी का कहीं इंतजाम हो जाए तो करा दो। दुकानदार ने मेरी बातें सुन ली। झट से उसने पानी का बोतल मुझे पकड़ा दिया। एक प्यासे को इससे अधिक चाहिए भी क्या? एक ही बार में पानी की आधी बोतल खत्म। मनोज और धर्मेंद्र ने बीयर पीने के बाद कहा, अब बुझ गई प्यास। मैंने प्रश्न किया क्या बीयर से प्यास भी बुझती है। मनोज का उत्तर था जल संकट को देख तो लग रहा है अब प्यास बूझाने के लिए लोगों को बीयर ही नहीं बोदका का भी सहारा लेना पड़ेगा।
पहले रहीम दास जी लिख गए थे-
रहीमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून
पानी गए न उबरे मोती, मानुष, चून।
अब हन्नी सिंह लिखते हैं-
चार बोतल बोदका, काम मेरा रोज का...
पानी तो हम लोग नहीं बचा पाए। शायद यही कारण है कि नदियां जहरीली हो गई। कई नदियों ने तो दु:खी होकर खुद ही आत्महत्या कर ली तो कई को कल-कारखाने वालों ने मार डाला। पानी के लिए मारपीट, पानी के लिए हत्या, पानी के लिए पलायान... और अब पानी के लिए बीसीसीआई का महराष्ट्र सरकार का व्यंगबाण। अगर अपने दोस्तों के बताए रास्तों पर चलूं तो बीसीसीआई का सलाह उचित भी है। तब के रहीम और आज के हन्नी सिंह। जैसे लोग आज रहीम दास जी को याद करते हैं वैसे ही हन्नी सिंह को याद करेंगे। रहीम दास को लोग भले न अपना सके, पर आज के लोगों ने हन्नी सिंह जल्दी अपना लिया। मेरे जैसे हजारों लोग हैं जो अब भी हन्नी सिंह को नहीं अपना सके। इस पानी के संकट को देखते हुए उन्हें मंगल की ओर पलायन करना पड़ सकता है। सरकार कह रही है कि वैज्ञानिकों ने मंगल पर पानी की खोज कर ली है।
वहां कुछ देर आराम करने के बाद हम लोग आगे बढ़ते गए। लगा जैसे रास्ता ही खत्म नहीं होगा। वैसे भी जिंदगी के सफर में मंजिलें कहां मिलती है। पूरी जिंदगी इम्तिहानों के दौर में गुजर जाती है। कभी-कभी तो समय इतना खराब आता है कि जिसे आपने उड़ना सीखाया हो। वही आपको नसीहते देने लगता हैं। एक जख्म भरता है तो दूसरा जख्म देता है। इस तरह से जीवन का पूरा सफर शिकवा और शिकायतों में गुजर जाता है। मेरा मिर्जापुर यात्रा सिर्फ एक दिन का था। इसी एक दिन में रहीम और हन्नी सिंह दोनों को समझ लिया। रहीम को खुद समझा तो हन्नी सिंह को दोस्तों ने समझाया।
बनारस के लहरतारा से करीब 100 किलोमीटर की यात्रा तय करने के बाद हम लोग मिर्जापुर-रावर्ट्सगंज मार्ग पर विंडमफाल पहुंचे। वहां चारो तरफ पहाड़। पानी का दूर-दूर तक अता-पता नहीं। पहाडि़यों पर हम लोग आगे बढ़ते गये। वहां कुछ मजदूर मिले। वे पत्थरों को तोड़ रहे थे। वहां के कुछ लोगों से पूछने पर पता चला कि यहां बरसात के दिनों में पहाड़ों से जलप्रपात होता है। मिर्जापुर के पहले डीएम पी विंडम ने वहां कई पार्कों का निर्माण कराया था। कई विकास कार्य हुए थे। इसी कारण उस जगह का नाम विंडमफाल के नाम से जाना जाता है। अब वहां चारो तरफ पानी का संकट। इसके कारण वहां के लोग पलायन कर गए। वहां पर खुद की आंखों से जो सच देखा। मैं तो क्या कोई भी टूट जाएगा। बरात में भी लोग जाते हैं तो पानी का इंतजाम खुद करते हैं। बोतलों में पानी भर के ले जाते हैं। पानी के इस संकट के बाद भी जंगलों की कटाई जारी है। पहाड़ों को तोड़े जाने का काम जारी है। पत्थरों पर जब हथौड़ों के चोट पड़ रहे थे तो उसकी आवाज तेज हवारों से टकराकर मेरे कानों तक बार-बार पहुंचती। जैसे लगता यह पहाड़ चीख-चीख कह रहे हों-
शौकसे तोड़ो मुझे, मैं क्यू परवाह करूं।
तुम ही रहते हो इसमें,अपना ही घर उजाड़ोगे।
मिर्जापुर की यात्रा से जब वापस बनारस के लहरतारा अपने आवास पर लौटा तो घर में प्रवेश करते ही देखा बाथरूम में बाल्टी भर जाने के बाद भी टोटी से पानी गिर रहा था। दौड़कर पानी बंद किया। धर्मपत्नी जी से कहा, यह ठीक नहीं। कैरियर की तलाश में जैसे मैं इधर-उधर भटका करता था आज लोग पानी के लिए भटक रहे हैं। उन्होंने कहा कितना पानी चाहिए। लाइये बाल्टी, भर देती हूं। ले जाकर दे दीजिए। अब मैं उन्हें कैसे समझाऊं। फिर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, बगल में पड़ोसी के यहां भी पानी गिर रहा है जाकर बंद करा दीजिये। मेरे पड़ोसी प्राथमिक स्कूल में अध्यापक हैं। रविवार होने के कारण वे घर पर ही थे। मैंने उनका दरवाजा खटखटाया। उन्होंने दरवाजा खोलते ही मेरा स्वागत किया। आइये बैठिये। पड़ोसी होकर भी आप नहीं मिलते। कितने दिनों बाद मुलाकात हुई। मैंने सकुचाते हुए कहा, शायद आपके बाथरूम में पानी गिर रहा है। अगर जरूरत न हो तो उसे बंद कर दीजिए। वे मेरे तरफ नीचे-उपर झांकने लगे। फिर बोले, तो आपको क्या परेशानी हो गई। पानी मेरे यहां गिर रहा है। मैं पानी का पैसा देता हूं। अब इसके बाद मेरे पास कोई जवाब नहीं था। आज पता चला मास्टर साहब की पत्नी मुहल्ले में कहतीं फिर रहीं हैं कि पत्रकार साहब को कोई गंभीर बीमारी हो गई है। पानी मेरे घर में गिर रहा है परेशानी उन्हें हो रही है। मुंबई के हाईकोर्ट के जज की तरह अब पाण्डेय जी भी सठिया गए हैं।
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

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