Thursday, 27 October 2016

मैं अभी ज़िंदा हूँ
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लेखक और साहित्यकार
सरगना होता है
पुरस्कार वापसी का
बेइमान बन जाता है
झूठी आलोचना कर
कुख्यात हो जाता है
सत्य से मुंह मोड़कर
दलाल भी बन जाता है
सत्ता से चिपककर।
एक अपराधी के सभी गुण।
सही लेखक तो वह होता है
जो पसीने से अच्छर को
गढ़ता और बनाता है।
हथोड़े से शब्दों को
एक नया आकार देता है।
हर वाक्य होते हैं
खेतों की पगदंडी और मेढ़।
लेखक तो मजदूर होता है।
किसान होता है।
उसे सरकारें पुरस्कार नहीं देंती
सिर्फ परोपकार करतीं हैं।
फिर भी मर जाता है भूख से
मैं अभी ज़िंदा हूँ।
कुछ चोट खाने के लिए
कुछ चोट देने के लिए।।


अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर



मैं क्या हूँ...
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झूठ की दीवार ही नहीं
झूठ का महल होता है।
सच तो महल के सामने
चाय बेचता मिल जाएगा।
महल के गेट पर पहरेदार
और भीतर पालतू कुत्ते
दिन रात ड्यूटी में मुस्तैद
 सच अंदर जाने न पाए।
अगर इजाजत है तो
सिर्फ झूठ को
बेइमान है तो भी चलेगा
रोक है तो सिर्फ इमानदार को
सत्य कहना पिछडापन है।
वरना अपनी कुर्सी खो जाने
के डर से अफसर और मंत्री
कबूतर की आवाज में
कभी गुटर- गू नहीं करता।
एक झूठ है-दूसरा सच है
तो आखिर मैं क्या हूँ?
लो जान लो तुम भी
डंके की चोट पर बता देता हूँ।
मैं तो नियत का कुल्हड़ हूँ
चाय कोई पीये, टूटना मुझे ही है।


अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर