Monday, 11 July 2016

मेरा सुहवल: सूत पुत्र *****5 जुलाई की रात काम ख़त्म करने के बा...

मेरा सुहवल: सूत पुत्र *****
5 जुलाई की रात काम ख़त्म करने के बा...
: सूत पुत्र  ***** 5 जुलाई की रात काम ख़त्म करने के बाद नई सड़क जा रहा था। वहां इसलिए कि ईद से एक दिन पहले पूरी रात मार्केट खुली रहती है। ल...

Sunday, 10 July 2016

सूत पुत्र 

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5 जुलाई की रात काम ख़त्म करने के बाद नई सड़क जा रहा था। वहां इसलिए कि ईद से एक दिन पहले पूरी रात मार्केट खुली रहती है। लोग ईद की खरीदारी करते हैं। लोग कहते हैं कि आज के दिन सभी सामान बहुत कम रेट पर उपलब्ध रहता है। आज के दिन का बहुत से हिन्दू भाइयों को भी इन्तजार रहता है।
ऑफिस से आगे बढ़ते ही लहुरावीर के पास गोरखपुर के साथी इंद्रभूषण दुबे जी मिल गये। उन्होंने अपनी गाडी एक होटल के सामने खड़ी कर दी। हम दोनों एक ही बाइक पर हो गये। भीड़ तो लहुरावीर से ही शुरू हो गई थी। हम लोग नई सडक पहुंचे जरुर पर अब वहां से निकलना मुश्किल हो गया। जाम की स्थिति बन गई थी। सडक की पटरियों पर ही पूरा बाजार। एक दुकान से दाम पूछकर दूसरे दुकान की ओर भागते लोग। जहाँ सबसे सस्ता सामान मिला वहां खरीदारी कर ली। दुबे जी ने कहा, इस बाजार में दिख रहे सभी लोग लोग भारत माँ के सूत पुत्र हैं। इस देश की सरकारों के सूत पुत्र हैं। बाजार में खरीदारी करने वाले सभी कामगार वर्ग से लग रहे थे। सातवाँ वेतन आयोग वाले कर्मचारी या व्यापारी वर्ग के लोग तो माल या शो रूम में दिन में ही ईद की खरीदारी कर लिए होंगे। अब रात में चैन की नींद सो रहे होंगे। इस लेख को पढकर कोई पाठक यह न समझे कि लेखक किसी आयोग का विरोध कर रहा है। सूत पुञों को भी पुञ का दर्जा मिला इसका समर्थन जरूर कर रहा हूं।
आज की सरकारें महाभारत की कुंती को अपना आदर्श मानती है। सूत पुत्रों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार क्यों। सातवाँ वेतन आयोग का लाभ पाने वाले कर्मचारी 20 से 40 हजार रूपये वेतन बढ़ने के बाद भी धरने पर जाने को कह रहे हैं। देश के सूतपुत्र प्राइवेट नौकरी-पेशा वाले और कामगार तो 500 से दो हजार रूपये बढ़ा हुआ वेतन पाकर भी खुश हैं। उन्हें पता है "कुंती" (सरकारें) उन्हें सूत पुत्र ही मानती आयी है।
वापस लौटने के बाद लहुरावीर के उस होटल के पास इंद्रभूषण जी दुबे जी को छोड़ दिया जहाँ उनकी गाड़ी खड़ी थी। वहां से मैं तेलियाबाग के रास्ते कैंट आया। जाम बहुत थी। ओवरब्रिज का निर्माण कार्य प्रगति पर होने के कारण कैंट -लहरतारा रोड पर अक्सर जाम की स्थिति बन जाती है। बाइक धीरे-धीरे आगे सरक रही थी। तभी एक शख्स ने लिफ्ट मांगी। एक हाथ में झोला व दूसरे में कुछ डब्बों में बंधे जूते और चप्पल। समझते देर न लगी कि खरीदारी कर वापस घर जा रहा है। मैं पूछ दिया, कहाँ जाना है। उसका जवाब था लोहता। तभी पीछे से एक बाइक वाला हार्न बजाया। जैसे ही मैं पीछे मुड़कर देखा उसने जोर से चिल्लाया, अरे भाई साहब आगे बढिए। हम लोग जाम में फंसे हैं और आप आराम से बातें कर रहे हैं। अब मैं किनारे हो गया।। पीछे वाला व्यक्ति मुझे कोसते हुए आगे निकल गया। लिफ्ट मांगने वाले शख्स से मैंने कहा, बौलिया तक आपको ले जा सकता हूँ। थैंक्स भाई कहते हुए बाइक पर बैठ गये।
अब में जाम के बीच धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा। बाइक पर पीछे बैठने वाला युवक खुद ही अपने बारे में बताने लगा। नाम राहुल पटेल। वह किसी प्राइवेट कंपनी में काम करता है। वैसे तो ईद मुस्लिम का त्योहार है। वह खदीदारी करने इसलिए गया गया था ईद के एक दिन पहले रात में लगने वाले हाट में सामान सस्ता मिल जाता है। इस दिन का राहुल पटेल जैसे हजरों को इंतजार रहता है। उसकी बातें ठीक से न सुन पाने के कारण अब मैनें अपना हेलमेट उतार कर बाइक की हैंडिल में लटका लिया। राहुल बोले जा रहा था--- सरकार ने बैंकों में खाता तो खोलवा दिया अब क्या कर्ज लेकर बैंक में पैसा जमा करें? सरकारी कर्मचारियों के लिए वेतन आयोग। व्यापारियों के लिए निति व कानून। कर्ज में दबे हर साल सैकड़ों किसान आत्महत्या करते हैं। इनके लिए सरकारें क्या कर रही है। सफाई देने वाले कहेंगे किसानों के लिए सरकर बहुत कुछ कर रही है। अगर करती तो आत्म हत्या क्यों करते। कोई सरकारी कर्मचारी, व व्यवसायी आत्महत्या क्यों नहीं करते? राजनितिक पार्टियाँ कहतीं हैं सबका साथ सबका विकास। जब सरकार में आतीं हैं तो हमें भूल जाती हैं। हम सूत पुत्र जो ठहरे। मुझे लगा वाकई सरकारें न पहले इमानदार थी न अब है।
घर पहुंचा तो चिंतन में डूब गया। एक ओर विदेशी नश्ल के कुत्ते हैं जिन्हें आम आदमी से भी बेहतरीन जिन्दगी नसीब है। दूसरी और सडक के वे कुत्ते हैं जिन्हें मार देने का ख्याल लगभग हर खाते-पीते नागरिक, नगर पालिका और हर नगर निगम को आता है। कई बार रात की भयानक ठण्ड में कुत्ते बार - बार भौंकते हैं। ये शायद कहना चाहते हैं कि हे मनुष्यों, हो सके तो हमें मरने से बचा लो लेकिन उनकी सुनता कौन है? वे भौंकते-रोते रात काट देते हैं या नहीं काट पाते तो मर जाते हैं। ठीक यही जिन्दगी सूत पुत्रों की है। ये पहले सरकार को फिर समाज को कोसते हैं। जब इनकी कहीं नहीं सुनीं जाती तो खुद को कोसते हैं। यैसे करते-करते इनकी भी मौत हो जाती है। ये रोज मरते हैं और रोज पैदा होते हैं। ये आज की कुंती (सरकार) के सूत पुत्र जो हैं।
कैंट स्टेशन से बौलिया तक मेरे साथ सफर करने वाले राहुल पटेल का व्यक्तित्व क्या है यह तो मैं नहीं जानता पर उनके साथ अंतिम संवाद किसी दर्शन से कम नहीं। महाभारत के कर्ण की भाति जब जीवन के रंगमंच पर हमारी भूमिका क्या होनी चाहिए यह तय नहीं कर पाते तो महाभारत में अपनों के खिलाफ ही जंग-ए-मैदान में उतर जाते हैं। हमें नहीं पता होता कि जिसके खिलाफ मुझे लड़ाया जा रहा है वह अपना ही है। यह याद भी कुंती ही दिलाती हैं लेकिन अंत में मारा जाता है सूतपुत्र। त्याग के बाद भी आज सूत पुत्र कर्ण की वीरता को कितने लोग याद करते हैं। सभी अर्जुन को याद करते हैं। वीर अर्जुन। यही वर्तमान है और यही भविष्य। यह एक इमानदार स्वीकारोक्ति है। यह एक कडवा सत्य है। एक और सत्य से रूबरू करवाने के लिए आपको इतिहास की ओर ले चलते हैं।
यूरोपियन इतिहास में सबसे लम्बे समय तक शासन करने वाला लुइस चौदह था। 72 वर्ष से ज्यादा समय तक राजगद्दी सम्हाला। जनता उसे अविनाशी मानती थी। अब लुइस कमजोर हो चला था। ठीक से चल फिर भी नहीं पाता था। उसकी यह हालत देखकर जनता रोने लगी। लुइस चौदह ने कहा, क्यों रोते हो क्या तुम मुझे अविनाशी समझ बैठे थे। लुइस भी नहीं रहा, कुंती और सूत पुत्र कर्ण भी नहीं रहे। फिर आज की कुंती और अर्जुन को इतना अभिमान क्यों? क्या तुम अविनाशी हो? मैं तो नहीं क्योंकि सूत पुत्र जो हूँ।
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

Wednesday, 6 July 2016

इस पंजाब को क्या नाम दूँ

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वीरेंद्र श्रीवास्तव जी और मैं एक ही ऑफिस में साथ काम करते हैं। सयोग से हम दोनों एक ही गाँव सुहवल के रहने वाले हैं। ऐसा सौभाग्य कम ही लोगों को मिलता है। काम भी एक। ख़बरों को माजना। उनके साथ मित्रवत सम्बन्ध लेकिन बड़े भाई का दर्ज देता हूँ। आज बहुत ही सरल लहजे में उन्होंने मुझसे पूछ दिया। अजय जी आप साहित्य के किस मुकाम तक पहुंचना चाहते हैं। मेरा जवाब स्पष्ट था। मैं चाहे जिस मुकाम पर रहूँ पर ऐसा समय कभी न आये कि पुरस्कार लौटाने वालों की भीड़ में मुझे शामिल न होना पड़े। मेरी अपनी कोई पहचान न हो। मेरी पहचान मेरे पाठक हों। यही मेरा मुकाम हो। यही मेरी उपलब्धि हो। मुझे कोई साहित्य का मठ नहीं बनाना। अपना कोई कमाल नहीं दिखाना। किसी को मात भी नहीं देना। मुझे तो खुद से खुद को मात देना अच्छा लगता है। यहाँ मैं अपनी तारीफ़ नहीं आपको पढ़ा रहा हूँ। राजनीति से भी गंदी हो चुकी साहित्यकारों की दुनियां के प्लास्टर की एक परत नाख़ून से खुरचने भर का एक साहस भर किया है। कारण साहित्यकार के साथ एक पत्रकार भी हूँ।

बैसाख की पहली तिथि पंजाबी पंचांग के अनुसार नव वर्ष के रूप में मनाई जाती है। इसी दिन 13 अप्रैल, 1978 को जरनैल सिंह भिंडरा वाले ने पंजाब के रंग मंच पर पदार्पण किया। इससे पंजाब ही नहीं पूरा देश अशांत हो गया। उसने पंजाबियों को नफरत का पाठ पढ़ाया।
" धरम जावे ताँ जावे,
मेरी कुर्सी किथे ना जावे।"
उनके इरादे साफ़ थे। पंजाब में कुछ हिन्दुओं का कत्ल करो ताकि पंजाब से बाहर रहने वाले सिखों पर हिन्दुओं की हिंसा भड़के।

 पंजाब में भिंडरावाले का प्रभाव बढ़ता गया। खुलेआम क़त्ल और लूट हो रहे थे। भिंडरवाले को अकालियों का समर्थन था। बाद में कई अकाली नीली पगड़ी छोड़ सफ़ेद पगड़ी पहनने लगे। जनमानस में नीली पगड़ी के प्रति घृणा होने लगी। कई अकाली नेता खुलेआम कहा करते थे अब उन्हें पार्टी का बिल्ला पहनते हुए शर्म महसूस हो रही है। जिस तरह गांधी टोपी कभी इमानदारी और साधुता का प्रतीक मानकर साम्मानित होती थी आज भर्ष्टाचार का प्रतीक बन कर रह गई है। उसी तरह अकालियो का नीला रंग भी सम्मान खोता जा रहा था।
6 जून 2984 को अमृतसर में जो कुछ घटित हुआ वह 400 वर्षों में न कभी देखा गया न सुना गया। बन्दुक और टैकों की मदद से स्वर्ण मंदिर में खून खराबा किया गया। सरकार ने इसे आपरेशन ब्लू स्टार का नाम दिया। इससे खालिस्तान का विरोध करने वाले सिख भी भड़क गये। कारण यह उनके आस्था पर चोट था। इस घटना में औरत और बच्चे भी मारे गये थे।
एक हिन्दुस्तानी मुहावरा है। ज़रा सी गलती का फल सदियों भुगतना पड़ता है। अक्तूबर माह में कई त्यौहार पड़ते हैं। मानसून की बारिश ख़त्म हुई होती है। धान की फसल को काटने को कुछ ही दिन बचे होते हैं। दिवाली तक एक के बाद एक त्यौहार आते हैं। कार्यवाई से आहत हो सिखों ने दिए नहीं जलाए।इसी 31 अक्तूबर की सुबह 10 बजे इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गयी। यह भारत के लिए बहुत बड़ी क्षति थी। इससे भड़की हिंसा में हजारों सिख मार दिए गये। दुकाने लुट ली गई। इस घटना पर राजीव गांधी ने कहा था जब बड़ा पेड़ गिरता है तो कम्पन होता है।


 बुधवार 24 जुलाई 1985 को  प्रधानमंत्री राजीव गांधी और संत हरचंद सिंह लोगोंवाल के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए। यह देश की एकता और अखंडता के विजय का दिन था। राजीव ने राष्ट्रपति, गृह मंत्री बूटा सिंह और पंजाब के सीएम दरबारा सिंह से भी सलाह नहीं ली थी।
जनसामान्य के जीवन में एक समय आता है जब वह खुद को बीच चौराहे पर खड़ा पाता है।  जब उनका लिया हुआ एक गलत निर्णय विनाश के मार्ग पर ले जा सकता है। सिखों के लिए एक ऐसा मौक़ा 1887 में आया। बरनाला ने एक सभा बुलाई।

 जब सिखों को अखंड भारत की राह और खालिस्तान की राह में से किसी एक को चुनना था। उस सभा में सिखों ने खालिस्तान का विरोध किया। 1992 के बाद बसपा नेपंजाब में बसे गैर सिखों को भड़काना शुरू किया। अपनी राजनितिक जमीन तैयार करने के लिए अकालियो के खिलाफ मंचो से नारे लगवाये गये। बसपा कुछ जगहों पर इससे मजबूत जरुर हुई पर एक बार फिर से वहां तनाव की स्थिति पैदा हुई। बाद में जल्द ही लोगों ने जब बसपा की चाल को समझ लिया तो बसपा फिर से वहां करीब-करीब ख़त्म हो गई। उसी गैर पंजाबियो के सहारे आम आदमी पार्टी पंजाब में अपना पाँव पसार रही है। पंजाब के कट्टर पंथी सिख अकाली के साथ और बाकी के भाजपा और कांग्रेस में बंटे हुए है। गैर पंजाबी भी कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस को वोट देते रहे हैं। इंदिरा गांधी द्वारा स्वर्ण मंदिर में चलाये गये आपरेशन ब्लू स्टार के कारण कट्टर पंथी सिख आज भी कांग्रेस को पसंद नहीं करते।

 जलता पंजाब के बाद आज पूरा देश एकता और अखंडता के धागे में गुथा हुआ एक ऐसा पंजाब देख रहा है जो देश के लिए मरता है और जीता है।
25 फरवरी को दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल पंजाब दौरे पर थे। पंजाबियों व सिखों ने "गो बैक" का नारा दिया। सिखों का कहना था कि जेएनयू में भारत विरोधी नारे लगाने वालों का केजरीवाल ने समर्थन किया। यैसे लोगों को हम पंजाब में घुसने नहीं देंगे। आज 4 जुलाई को केजरीवाल फिर पंजाब के दौरे पर हैं। कलरकोटला में उन्होंने इफ्तार पार्टी रखी। आज भी इफ्तार पार्टी के दौरान ही केजरीवाल "गो बैक" और मुर्दाबाद के नारे लगे। लोगों का कहना था कि पवित्र कुरान शरीफ की बेअदबी के मामले में उनकी पार्टी के एक विधायक का नाम सामने आ रहा है। यैसे लोगों को पंजाब में घुसने नहीं देंगे। यह है आज का पंजाब। राज द्रोही और धर्म विद्रोही को नकारने वाला पंजाब। इस पंजाब से कश्मीर, यूपी सहित उस बिहार को भी सीख लेनी चाहिए जिसने कन्हैया जैसे कपूत को पैदा किया। यूपी के मुजफ्फरनगर और कैराना को भी आज के पंजाब से सीख लेनी चाहिए जहाँ एक दूसरे के धर्म का अपमान करते हैं। आज के पंजाब से कश्मीर के अलगाववादियों को सीख लेनी चाहिए जो बात-बात में भारत विरोध की बात करते हैं। यह है आज का पंजाब। अनुराग कश्यप जी अब आप ही बताएं कि इस पंजाब को क्या नाम दूँ?

अजय पाण्डेय

सुहवल, गाजीपुर

मेरी तो अपनी माँ है

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यात्रा वृतांत

एक मेरे कांग्रेसी मित्र हैं। वर्तमान में वे अमर उजाला में कार्यरत हैं। कांग्रेसी इसलिए कि कांग्रेस से वे एक बार विधानसभा का चुनाव लड़ चुके हैं। चुनाव हार गये तो पत्रकारिता करने लगे। तीन साल पहले जब वे बनारस थे तो सुबह का चाय, दोपहर का खाना व रात का भोजन हम लोग साथ करते थे। उन्होंने मेरे साथ कई वादा किया। हर वादा तोड़ते रहे। इसके बाद भी उनका साथ नहीं छोड़ा। कारण मुझे देखना था कि आखिर कांग्रेसी होते कैसे हैं। रोज नया अनुभव। बनारस से एक सप्ताह की यात्रा पर निकला था। अमर उजाला के कांग्रेसी पत्रकार मित्र से फोन पर मिलने के लिए बात हुई। उनका जवाब था, अभी कुछ देर में आपसे मिलने आ रहा हूँ। मिलना तो दूर फोन भी उनका नहीं आया। आज और भी नजदीक से देखने को मिला कि आखिर कांग्रेसी होते कैसे हैं। यहाँ एक बात साफ़ कर दूँ। एक और मेरे कांग्रेसी मित्र हैं। 2010 में गोरखपुर कांग्रेस के महासचिव हुआ करते थे। नाम है आलोक शुक्ला। इनका नाम इसलिए लिया कि ये भद्र पुरुष हैं। ये कांग्रेस में इसलिए हैं कि सरदार पटेल इनके आदर्श हैं। यही कारण है कि ये आज राजनीति के फर्श पर हैं। संयोग से अब ये भी पत्रकारिता करते हैं। कई बार आलोक जी से कहा भी कि कांग्रेस के एक भी गुन (गुण) आपमें नहीं है। हर बार मुस्कुराकर उन्होंने मुझसे यही कहा, अजय जी मैं झूठ नहीं बोल पाता।
इसी साल जून माह में बनारस से एक सप्ताह के लिए घुमने निकला था। देहरादून शहर से करीब 15 किलोमीटर दूर सिटी बस से जैतुनबाला पहुंचा। दिन के करीब डेढ़ बज रहे थे। सुबह से सिर्फ एक चाय और नमकीन खाया था। भूख बहुत तेज लगी थी। मैं अकेला था। देहरादून तक दो और मित्र थे पर वे आराम करने के मुड में थे। एकला चलो की तर्ज पर मैं घुमक्कड़ी करने जैतुनबाला तक आ गया। यहाँ कई चलता-फिरता होटल सडक के किनारे लगे थे। चार पहिया वाहन में पूरा होटल। शुद्ध शाकाहारी अन्नपूर्णा होटल। गाड़ी के नजदीक पहुंचा। हर थाली का रेट लिखा था। जनरल थाली 40 रुपया। सेवा इतना फास्ट कि 40 रूपये का कूपन पकड़ाते ही भोजन से भरी थाली मेरे हाथ में। खाना खाने के बाद टहल रहा था। दो ऑटो वाले आपस में बात कर रहे थे।
पहला : कितनी कमाई हुई।
दुसरा : क्या कमाई होगी। सुबह से एक भी पर्यटक नहीं मिला। बस घुमक्कड़ों को ढो रहा हूँ। यहीं से मुझे अनुभव हुआ। 40 रूपये का जनरल थाली खाने वाला पर्यटक नहीं कोई घुमक्कड़ ही हो सकता है।

यह दुनियां है या कोई किताब? कितनी मिट्टी के आखर हैं। कितने पर्वत, कितनी नदियाँ... अगर इन पन्नों से होकर गुजरना है...धरती को नापना है तो देहरादून का सैर एक बार जरुर करें। उससे भी ज्यादा अगर माँ के मर्म को समझना है तो सान्ताला देवी दर्शन जरुर करें। जैतुनबाला से ऑटो पकड़ कर पंजाबीवाला पहुंचा। यहाँ से करीब 2 किलोमीटर चलकर हमें सान्ताला देवी मंदिर पहुंचना था। सैकड़ों की संख्या में भक्त माँ की जयकारा लगाते हुए जा रहे थे। उनकी टोली में मैं भी शामिल हो गया।
जोर से बोलो, जय माँ सान्ताला
सबकी माँ हैं सान्ताला
जुवां से माँ शब्द आते ही लगा जैसे सभी थकान कपूर की टिकिया की भांति काफूर हो चुका है। मन में शान्ति इतनी जैसे चिंतन, एकांत और साधना के संगम में हम सभी डुबकी लगा रहे हों। इस तरह से दो किलोमीटर का सफर कब ख़त्म हुआ पता ही नहीं चला। इस पैदल यात्रा में एक अलग प्रकार का रोमांच था। यात्रा महज क्रिया भर नहीं है। एक कला है। एक जीवन दृष्टि, जो भूगोल के नक़्शे से बाहर निकलकर बहुत कुछ समेटती है.... सहेजती है इतिहास के पन्नों को...फिर शब्दों में ढलकर एक किताब का रूप धारण करती है। मेरे इस यात्रा में माँ सान्ताला देवी शब्दों के साथ दिल में भी ढल गईं। मंदिर के छोटे से बरामदे में बैठकर ध्यान लगा रहा था। आँख खुली तो बगल में एक बुजुर्ग हाँथ जोड़कर बैठे थे। उनकी आँखों में आंसू देखकर लगा जरुर बहुत कष्ट में होंगे। कुछ देर बाद मेरी उनसे बातें होने लगी। रोने का कारण पूछा तो उनका उत्तर अजीब सा था। जो बालक जितना अधिक दुखी होता है माँ की उस पर उतना ही अधिक कृपा होती है। मैं अपनी सभी दुखों को याद कर इसलिए रो रहा था कि माँ की कृपा बनी रहे।

तब मुझे लगा कि जब किसी तरह का दुःख आने वाला है तो समझूँ कि मेरे ऊपर जरुर किसी रहबर की कृपा होने वाली है। यही तो है दुःख का अंत। जब दुःख आयेगा तो मेरे भीतर किसी प्रकार की अकड़ नहीं बल्कि आखों में आंसू होगा। किसी के कृपा की चाहत होगी। जब यह सभी गुण सुख में भी बना रहे तो दुःख आयेगा ही नहीं। माँ की कृपा के लिए आंसुओं की नहीं समर्पण की जरूरत होती है। बचपन में चुहानी घर में बैठकर माँ के हाथों से बनी गर्मागर्म रोटियां खाने में जो स्वाद था आज मख्खन लपेटी हुई रोटियों में नहीं। आज पता चला स्वाद रोटी में नहीं था। स्वाद तो माँ के हथेलियों में था। मीठी रोटियों वाली माँ की वह हथेलियाँ आज भी प्यार व आशीर्वाद बरसाती है जब खुद को समर्पण कर देता हूँ। जब मैं रोता हूँ तो इस माँ को अच्छा नहीं लगता। रसोई में बैठकर रोटियां खिलाने वाली माँ कहती है, अपने बेटों को खुश देखकर दिल बाग़-बाग़ हो उठता है। मैं किसी माँ के दर पर जाकर कयों रोऊँ। मेरी तो अपनी माँ है जो मुझे सदा खुश देखना चाहती है।
           
       अजय पाण्डेय

       सुहवल, गाजीपुर

मेरी तो अपनी माँ है

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यात्रा वृतांत

एक मेरे कांग्रेसी मित्र हैं। वर्तमान में वे अमर उजाला में कार्यरत हैं। कांग्रेसी इसलिए कि कांग्रेस से वे एक बार विधानसभा का चुनाव लड़ चुके हैं। चुनाव हार गये तो पत्रकारिता करने लगे। तीन साल पहले जब वे बनारस थे तो सुबह का चाय, दोपहर का खाना व रात का भोजन हम लोग साथ करते थे। उन्होंने मेरे साथ कई वादा किया। हर वादा तोड़ते रहे। इसके बाद भी उनका साथ नहीं छोड़ा। कारण मुझे देखना था कि आखिर कांग्रेसी होते कैसे हैं। रोज नया अनुभव। बनारस से एक सप्ताह की यात्रा पर निकला था। अमर उजाला के कांग्रेसी पत्रकार मित्र से फोन पर मिलने के लिए बात हुई। उनका जवाब था, अभी कुछ देर में आपसे मिलने आ रहा हूँ। मिलना तो दूर फोन भी उनका नहीं आया। आज और भी नजदीक से देखने को मिला कि आखिर कांग्रेसी होते कैसे हैं। यहाँ एक बात साफ़ कर दूँ। एक और मेरे कांग्रेसी मित्र हैं। 2010 में गोरखपुर कांग्रेस के महासचिव हुआ करते थे। नाम है आलोक शुक्ला। इनका नाम इसलिए लिया कि ये भद्र पुरुष हैं। ये कांग्रेस में इसलिए हैं कि सरदार पटेल इनके आदर्श हैं। यही कारण है कि ये आज राजनीति के फर्श पर हैं। संयोग से अब ये भी पत्रकारिता करते हैं। कई बार आलोक जी से कहा भी कि कांग्रेस के एक भी गुन (गुण) आपमें नहीं है। हर बार मुस्कुराकर उन्होंने मुझसे यही कहा, अजय जी मैं झूठ नहीं बोल पाता।
इसी साल जून माह में बनारस से एक सप्ताह के लिए घुमने निकला था। देहरादून शहर से करीब 15 किलोमीटर दूर सिटी बस से जैतुनबाला पहुंचा। दिन के करीब डेढ़ बज रहे थे। सुबह से सिर्फ एक चाय और नमकीन खाया था। भूख बहुत तेज लगी थी। मैं अकेला था। देहरादून तक दो और मित्र थे पर वे आराम करने के मुड में थे। एकला चलो की तर्ज पर मैं घुमक्कड़ी करने जैतुनबाला तक आ गया। यहाँ कई चलता-फिरता होटल सडक के किनारे लगे थे। चार पहिया वाहन में पूरा होटल। शुद्ध शाकाहारी अन्नपूर्णा होटल। गाड़ी के नजदीक पहुंचा। हर थाली का रेट लिखा था। जनरल थाली 40 रुपया। सेवा इतना फास्ट कि 40 रूपये का कूपन पकड़ाते ही भोजन से भरी थाली मेरे हाथ में। खाना खाने के बाद टहल रहा था। दो ऑटो वाले आपस में बात कर रहे थे।
पहला : कितनी कमाई हुई।
दुसरा : क्या कमाई होगी। सुबह से एक भी पर्यटक नहीं मिला। बस घुमक्कड़ों को ढो रहा हूँ। यहीं से मुझे अनुभव हुआ। 40 रूपये का जनरल थाली खाने वाला पर्यटक नहीं कोई घुमक्कड़ ही हो सकता है।

यह दुनियां है या कोई किताब? कितनी मिट्टी के आखर हैं। कितने पर्वत, कितनी नदियाँ... अगर इन पन्नों से होकर गुजरना है...धरती को नापना है तो देहरादून का सैर एक बार जरुर करें। उससे भी ज्यादा अगर माँ के मर्म को समझना है तो सान्ताला देवी दर्शन जरुर करें। जैतुनबाला से ऑटो पकड़ कर पंजाबीवाला पहुंचा। यहाँ से करीब 2 किलोमीटर चलकर हमें सान्ताला देवी मंदिर पहुंचना था। सैकड़ों की संख्या में भक्त माँ की जयकारा लगाते हुए जा रहे थे। उनकी टोली में मैं भी शामिल हो गया।
जोर से बोलो, जय माँ सान्ताला
सबकी माँ हैं सान्ताला
जुवां से माँ शब्द आते ही लगा जैसे सभी थकान कपूर की टिकिया की भांति काफूर हो चुका है। मन में शान्ति इतनी जैसे चिंतन, एकांत और साधना के संगम में हम सभी डुबकी लगा रहे हों। इस तरह से दो किलोमीटर का सफर कब ख़त्म हुआ पता ही नहीं चला। इस पैदल यात्रा में एक अलग प्रकार का रोमांच था। यात्रा महज क्रिया भर नहीं है। एक कला है। एक जीवन दृष्टि, जो भूगोल के नक़्शे से बाहर निकलकर बहुत कुछ समेटती है.... सहेजती है इतिहास के पन्नों को...फिर शब्दों में ढलकर एक किताब का रूप धारण करती है। मेरे इस यात्रा में माँ सान्ताला देवी शब्दों के साथ दिल में भी ढल गईं। मंदिर के छोटे से बरामदे में बैठकर ध्यान लगा रहा था। आँख खुली तो बगल में एक बुजुर्ग हाँथ जोड़कर बैठे थे। उनकी आँखों में आंसू देखकर लगा जरुर बहुत कष्ट में होंगे। कुछ देर बाद मेरी उनसे बातें होने लगी। रोने का कारण पूछा तो उनका उत्तर अजीब सा था। जो बालक जितना अधिक दुखी होता है माँ की उस पर उतना ही अधिक कृपा होती है। मैं अपनी सभी दुखों को याद कर इसलिए रो रहा था कि माँ की कृपा बनी रहे।

तब मुझे लगा कि जब किसी तरह का दुःख आने वाला है तो समझूँ कि मेरे ऊपर जरुर किसी रहबर की कृपा होने वाली है। यही तो है दुःख का अंत। जब दुःख आयेगा तो मेरे भीतर किसी प्रकार की अकड़ नहीं बल्कि आखों में आंसू होगा। किसी के कृपा की चाहत होगी। जब यह सभी गुण सुख में भी बना रहे तो दुःख आयेगा ही नहीं। माँ की कृपा के लिए आंसुओं की नहीं समर्पण की जरूरत होती है। बचपन में चुहानी घर में बैठकर माँ के हाथों से बनी गर्मागर्म रोटियां खाने में जो स्वाद था आज मख्खन लपेटी हुई रोटियों में नहीं। आज पता चला स्वाद रोटी में नहीं था। स्वाद तो माँ के हथेलियों में था। मीठी रोटियों वाली माँ की वह हथेलियाँ आज भी प्यार व आशीर्वाद बरसाती है जब खुद को समर्पण कर देता हूँ। जब मैं रोता हूँ तो इस माँ को अच्छा नहीं लगता। रसोई में बैठकर रोटियां खिलाने वाली माँ कहती है, अपने बेटों को खुश देखकर दिल बाग़-बाग़ हो उठता है। मैं किसी माँ के दर पर जाकर कयों रोऊँ। मेरी तो अपनी माँ है जो मुझे सदा खुश देखना चाहती है।
           
       अजय पाण्डेय

       सुहवल, गाजीपुर