Sunday, 10 July 2016

सूत पुत्र 

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5 जुलाई की रात काम ख़त्म करने के बाद नई सड़क जा रहा था। वहां इसलिए कि ईद से एक दिन पहले पूरी रात मार्केट खुली रहती है। लोग ईद की खरीदारी करते हैं। लोग कहते हैं कि आज के दिन सभी सामान बहुत कम रेट पर उपलब्ध रहता है। आज के दिन का बहुत से हिन्दू भाइयों को भी इन्तजार रहता है।
ऑफिस से आगे बढ़ते ही लहुरावीर के पास गोरखपुर के साथी इंद्रभूषण दुबे जी मिल गये। उन्होंने अपनी गाडी एक होटल के सामने खड़ी कर दी। हम दोनों एक ही बाइक पर हो गये। भीड़ तो लहुरावीर से ही शुरू हो गई थी। हम लोग नई सडक पहुंचे जरुर पर अब वहां से निकलना मुश्किल हो गया। जाम की स्थिति बन गई थी। सडक की पटरियों पर ही पूरा बाजार। एक दुकान से दाम पूछकर दूसरे दुकान की ओर भागते लोग। जहाँ सबसे सस्ता सामान मिला वहां खरीदारी कर ली। दुबे जी ने कहा, इस बाजार में दिख रहे सभी लोग लोग भारत माँ के सूत पुत्र हैं। इस देश की सरकारों के सूत पुत्र हैं। बाजार में खरीदारी करने वाले सभी कामगार वर्ग से लग रहे थे। सातवाँ वेतन आयोग वाले कर्मचारी या व्यापारी वर्ग के लोग तो माल या शो रूम में दिन में ही ईद की खरीदारी कर लिए होंगे। अब रात में चैन की नींद सो रहे होंगे। इस लेख को पढकर कोई पाठक यह न समझे कि लेखक किसी आयोग का विरोध कर रहा है। सूत पुञों को भी पुञ का दर्जा मिला इसका समर्थन जरूर कर रहा हूं।
आज की सरकारें महाभारत की कुंती को अपना आदर्श मानती है। सूत पुत्रों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार क्यों। सातवाँ वेतन आयोग का लाभ पाने वाले कर्मचारी 20 से 40 हजार रूपये वेतन बढ़ने के बाद भी धरने पर जाने को कह रहे हैं। देश के सूतपुत्र प्राइवेट नौकरी-पेशा वाले और कामगार तो 500 से दो हजार रूपये बढ़ा हुआ वेतन पाकर भी खुश हैं। उन्हें पता है "कुंती" (सरकारें) उन्हें सूत पुत्र ही मानती आयी है।
वापस लौटने के बाद लहुरावीर के उस होटल के पास इंद्रभूषण जी दुबे जी को छोड़ दिया जहाँ उनकी गाड़ी खड़ी थी। वहां से मैं तेलियाबाग के रास्ते कैंट आया। जाम बहुत थी। ओवरब्रिज का निर्माण कार्य प्रगति पर होने के कारण कैंट -लहरतारा रोड पर अक्सर जाम की स्थिति बन जाती है। बाइक धीरे-धीरे आगे सरक रही थी। तभी एक शख्स ने लिफ्ट मांगी। एक हाथ में झोला व दूसरे में कुछ डब्बों में बंधे जूते और चप्पल। समझते देर न लगी कि खरीदारी कर वापस घर जा रहा है। मैं पूछ दिया, कहाँ जाना है। उसका जवाब था लोहता। तभी पीछे से एक बाइक वाला हार्न बजाया। जैसे ही मैं पीछे मुड़कर देखा उसने जोर से चिल्लाया, अरे भाई साहब आगे बढिए। हम लोग जाम में फंसे हैं और आप आराम से बातें कर रहे हैं। अब मैं किनारे हो गया।। पीछे वाला व्यक्ति मुझे कोसते हुए आगे निकल गया। लिफ्ट मांगने वाले शख्स से मैंने कहा, बौलिया तक आपको ले जा सकता हूँ। थैंक्स भाई कहते हुए बाइक पर बैठ गये।
अब में जाम के बीच धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा। बाइक पर पीछे बैठने वाला युवक खुद ही अपने बारे में बताने लगा। नाम राहुल पटेल। वह किसी प्राइवेट कंपनी में काम करता है। वैसे तो ईद मुस्लिम का त्योहार है। वह खदीदारी करने इसलिए गया गया था ईद के एक दिन पहले रात में लगने वाले हाट में सामान सस्ता मिल जाता है। इस दिन का राहुल पटेल जैसे हजरों को इंतजार रहता है। उसकी बातें ठीक से न सुन पाने के कारण अब मैनें अपना हेलमेट उतार कर बाइक की हैंडिल में लटका लिया। राहुल बोले जा रहा था--- सरकार ने बैंकों में खाता तो खोलवा दिया अब क्या कर्ज लेकर बैंक में पैसा जमा करें? सरकारी कर्मचारियों के लिए वेतन आयोग। व्यापारियों के लिए निति व कानून। कर्ज में दबे हर साल सैकड़ों किसान आत्महत्या करते हैं। इनके लिए सरकारें क्या कर रही है। सफाई देने वाले कहेंगे किसानों के लिए सरकर बहुत कुछ कर रही है। अगर करती तो आत्म हत्या क्यों करते। कोई सरकारी कर्मचारी, व व्यवसायी आत्महत्या क्यों नहीं करते? राजनितिक पार्टियाँ कहतीं हैं सबका साथ सबका विकास। जब सरकार में आतीं हैं तो हमें भूल जाती हैं। हम सूत पुत्र जो ठहरे। मुझे लगा वाकई सरकारें न पहले इमानदार थी न अब है।
घर पहुंचा तो चिंतन में डूब गया। एक ओर विदेशी नश्ल के कुत्ते हैं जिन्हें आम आदमी से भी बेहतरीन जिन्दगी नसीब है। दूसरी और सडक के वे कुत्ते हैं जिन्हें मार देने का ख्याल लगभग हर खाते-पीते नागरिक, नगर पालिका और हर नगर निगम को आता है। कई बार रात की भयानक ठण्ड में कुत्ते बार - बार भौंकते हैं। ये शायद कहना चाहते हैं कि हे मनुष्यों, हो सके तो हमें मरने से बचा लो लेकिन उनकी सुनता कौन है? वे भौंकते-रोते रात काट देते हैं या नहीं काट पाते तो मर जाते हैं। ठीक यही जिन्दगी सूत पुत्रों की है। ये पहले सरकार को फिर समाज को कोसते हैं। जब इनकी कहीं नहीं सुनीं जाती तो खुद को कोसते हैं। यैसे करते-करते इनकी भी मौत हो जाती है। ये रोज मरते हैं और रोज पैदा होते हैं। ये आज की कुंती (सरकार) के सूत पुत्र जो हैं।
कैंट स्टेशन से बौलिया तक मेरे साथ सफर करने वाले राहुल पटेल का व्यक्तित्व क्या है यह तो मैं नहीं जानता पर उनके साथ अंतिम संवाद किसी दर्शन से कम नहीं। महाभारत के कर्ण की भाति जब जीवन के रंगमंच पर हमारी भूमिका क्या होनी चाहिए यह तय नहीं कर पाते तो महाभारत में अपनों के खिलाफ ही जंग-ए-मैदान में उतर जाते हैं। हमें नहीं पता होता कि जिसके खिलाफ मुझे लड़ाया जा रहा है वह अपना ही है। यह याद भी कुंती ही दिलाती हैं लेकिन अंत में मारा जाता है सूतपुत्र। त्याग के बाद भी आज सूत पुत्र कर्ण की वीरता को कितने लोग याद करते हैं। सभी अर्जुन को याद करते हैं। वीर अर्जुन। यही वर्तमान है और यही भविष्य। यह एक इमानदार स्वीकारोक्ति है। यह एक कडवा सत्य है। एक और सत्य से रूबरू करवाने के लिए आपको इतिहास की ओर ले चलते हैं।
यूरोपियन इतिहास में सबसे लम्बे समय तक शासन करने वाला लुइस चौदह था। 72 वर्ष से ज्यादा समय तक राजगद्दी सम्हाला। जनता उसे अविनाशी मानती थी। अब लुइस कमजोर हो चला था। ठीक से चल फिर भी नहीं पाता था। उसकी यह हालत देखकर जनता रोने लगी। लुइस चौदह ने कहा, क्यों रोते हो क्या तुम मुझे अविनाशी समझ बैठे थे। लुइस भी नहीं रहा, कुंती और सूत पुत्र कर्ण भी नहीं रहे। फिर आज की कुंती और अर्जुन को इतना अभिमान क्यों? क्या तुम अविनाशी हो? मैं तो नहीं क्योंकि सूत पुत्र जो हूँ।
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

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