इस पंजाब को क्या नाम दूँ
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वीरेंद्र श्रीवास्तव जी और मैं एक ही ऑफिस में साथ काम करते
हैं। सयोग से हम दोनों एक ही गाँव सुहवल के रहने वाले हैं। ऐसा सौभाग्य कम ही
लोगों को मिलता है। काम भी एक। ख़बरों को माजना। उनके साथ मित्रवत सम्बन्ध लेकिन
बड़े भाई का दर्ज देता हूँ। आज बहुत ही सरल लहजे में उन्होंने मुझसे पूछ दिया। अजय
जी आप साहित्य के किस मुकाम तक पहुंचना चाहते हैं। मेरा जवाब स्पष्ट था। मैं चाहे
जिस मुकाम पर रहूँ पर ऐसा समय कभी न आये कि पुरस्कार लौटाने वालों की भीड़ में मुझे
शामिल न होना पड़े। मेरी अपनी कोई पहचान न हो। मेरी पहचान मेरे पाठक हों। यही मेरा
मुकाम हो। यही मेरी उपलब्धि हो। मुझे कोई साहित्य का मठ नहीं बनाना। अपना कोई कमाल
नहीं दिखाना। किसी को मात भी नहीं देना। मुझे तो खुद से खुद को मात देना अच्छा
लगता है। यहाँ मैं अपनी तारीफ़ नहीं आपको पढ़ा रहा हूँ। राजनीति से भी गंदी हो चुकी
साहित्यकारों की दुनियां के प्लास्टर की एक परत नाख़ून से खुरचने भर का एक साहस भर
किया है। कारण साहित्यकार के साथ एक पत्रकार भी हूँ।
बैसाख की पहली तिथि पंजाबी पंचांग के अनुसार नव वर्ष के रूप
में मनाई जाती है। इसी दिन 13 अप्रैल, 1978 को जरनैल सिंह भिंडरा वाले ने पंजाब के
रंग मंच पर पदार्पण किया। इससे पंजाब ही नहीं पूरा देश अशांत हो गया। उसने
पंजाबियों को नफरत का पाठ पढ़ाया।
" धरम जावे ताँ जावे,
मेरी कुर्सी किथे ना जावे।"
उनके इरादे साफ़ थे। पंजाब में कुछ हिन्दुओं का कत्ल करो ताकि
पंजाब से बाहर रहने वाले सिखों पर हिन्दुओं की हिंसा भड़के।
पंजाब में भिंडरावाले
का प्रभाव बढ़ता गया। खुलेआम क़त्ल और लूट हो रहे थे। भिंडरवाले को अकालियों का
समर्थन था। बाद में कई अकाली नीली पगड़ी छोड़ सफ़ेद पगड़ी पहनने लगे। जनमानस में नीली
पगड़ी के प्रति घृणा होने लगी। कई अकाली नेता खुलेआम कहा करते थे अब उन्हें पार्टी
का बिल्ला पहनते हुए शर्म महसूस हो रही है। जिस तरह गांधी टोपी कभी इमानदारी और
साधुता का प्रतीक मानकर साम्मानित होती थी आज भर्ष्टाचार का प्रतीक बन कर रह गई
है। उसी तरह अकालियो का नीला रंग भी सम्मान खोता जा रहा था।
6 जून 2984 को अमृतसर में जो कुछ घटित हुआ वह 400 वर्षों में न
कभी देखा गया न सुना गया। बन्दुक और टैकों की मदद से स्वर्ण मंदिर में खून खराबा
किया गया। सरकार ने इसे आपरेशन ब्लू स्टार का नाम दिया। इससे खालिस्तान का विरोध
करने वाले सिख भी भड़क गये। कारण यह उनके आस्था पर चोट था। इस घटना में औरत और
बच्चे भी मारे गये थे।
एक हिन्दुस्तानी मुहावरा है। ज़रा सी गलती का फल सदियों भुगतना
पड़ता है। अक्तूबर माह में कई त्यौहार पड़ते हैं। मानसून की बारिश ख़त्म हुई होती है।
धान की फसल को काटने को कुछ ही दिन बचे होते हैं। दिवाली तक एक के बाद एक त्यौहार
आते हैं। कार्यवाई से आहत हो सिखों ने दिए नहीं जलाए।इसी 31 अक्तूबर की सुबह 10
बजे इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गयी। यह भारत के लिए बहुत बड़ी क्षति थी। इससे
भड़की हिंसा में हजारों सिख मार दिए गये। दुकाने लुट ली गई। इस घटना पर राजीव गांधी
ने कहा था जब बड़ा पेड़ गिरता है तो कम्पन होता है।
बुधवार 24 जुलाई 1985
को प्रधानमंत्री राजीव गांधी और संत
हरचंद सिंह लोगोंवाल के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए। यह देश की एकता और अखंडता
के विजय का दिन था। राजीव ने राष्ट्रपति, गृह मंत्री बूटा सिंह और पंजाब के सीएम
दरबारा सिंह से भी सलाह नहीं ली थी।
जनसामान्य के जीवन में एक समय आता है जब वह खुद को बीच चौराहे
पर खड़ा पाता है। जब उनका लिया हुआ एक गलत
निर्णय विनाश के मार्ग पर ले जा सकता है। सिखों के लिए एक ऐसा मौक़ा 1887 में आया।
बरनाला ने एक सभा बुलाई।
जब सिखों को अखंड
भारत की राह और खालिस्तान की राह में से किसी एक को चुनना था। उस सभा में सिखों ने
खालिस्तान का विरोध किया। 1992 के बाद बसपा नेपंजाब में बसे गैर सिखों को भड़काना
शुरू किया। अपनी राजनितिक जमीन तैयार करने के लिए अकालियो के खिलाफ मंचो से नारे
लगवाये गये। बसपा कुछ जगहों पर इससे मजबूत जरुर हुई पर एक बार फिर से वहां तनाव की
स्थिति पैदा हुई। बाद में जल्द ही लोगों ने जब बसपा की चाल को समझ लिया तो बसपा
फिर से वहां करीब-करीब ख़त्म हो गई। उसी गैर पंजाबियो के सहारे आम आदमी पार्टी
पंजाब में अपना पाँव पसार रही है। पंजाब के कट्टर पंथी सिख अकाली के साथ और बाकी
के भाजपा और कांग्रेस में बंटे हुए है। गैर पंजाबी भी कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस
को वोट देते रहे हैं। इंदिरा गांधी द्वारा स्वर्ण मंदिर में चलाये गये आपरेशन ब्लू
स्टार के कारण कट्टर पंथी सिख आज भी कांग्रेस को पसंद नहीं करते।
जलता पंजाब के बाद आज
पूरा देश एकता और अखंडता के धागे में गुथा हुआ एक ऐसा पंजाब देख रहा है जो देश के
लिए मरता है और जीता है।
25 फरवरी को दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल पंजाब दौरे पर थे।
पंजाबियों व सिखों ने "गो बैक" का नारा दिया। सिखों का कहना था कि
जेएनयू में भारत विरोधी नारे लगाने वालों का केजरीवाल ने समर्थन किया। यैसे लोगों
को हम पंजाब में घुसने नहीं देंगे। आज 4 जुलाई को केजरीवाल फिर पंजाब के दौरे पर
हैं। कलरकोटला में उन्होंने इफ्तार पार्टी रखी। आज भी इफ्तार पार्टी के दौरान ही केजरीवाल
"गो बैक" और मुर्दाबाद के नारे लगे। लोगों का कहना था कि पवित्र कुरान
शरीफ की बेअदबी के मामले में उनकी पार्टी के एक विधायक का नाम सामने आ रहा है।
यैसे लोगों को पंजाब में घुसने नहीं देंगे। यह है आज का पंजाब। राज द्रोही और धर्म
विद्रोही को नकारने वाला पंजाब। इस पंजाब से कश्मीर, यूपी सहित उस बिहार को भी सीख
लेनी चाहिए जिसने कन्हैया जैसे कपूत को पैदा किया। यूपी के मुजफ्फरनगर और कैराना
को भी आज के पंजाब से सीख लेनी चाहिए जहाँ एक दूसरे के धर्म का अपमान करते हैं। आज
के पंजाब से कश्मीर के अलगाववादियों को सीख लेनी चाहिए जो बात-बात में भारत विरोध
की बात करते हैं। यह है आज का पंजाब। अनुराग कश्यप जी अब आप ही बताएं कि इस पंजाब
को क्या नाम दूँ?
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर
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