Wednesday, 6 July 2016

मेरी तो अपनी माँ है

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यात्रा वृतांत

एक मेरे कांग्रेसी मित्र हैं। वर्तमान में वे अमर उजाला में कार्यरत हैं। कांग्रेसी इसलिए कि कांग्रेस से वे एक बार विधानसभा का चुनाव लड़ चुके हैं। चुनाव हार गये तो पत्रकारिता करने लगे। तीन साल पहले जब वे बनारस थे तो सुबह का चाय, दोपहर का खाना व रात का भोजन हम लोग साथ करते थे। उन्होंने मेरे साथ कई वादा किया। हर वादा तोड़ते रहे। इसके बाद भी उनका साथ नहीं छोड़ा। कारण मुझे देखना था कि आखिर कांग्रेसी होते कैसे हैं। रोज नया अनुभव। बनारस से एक सप्ताह की यात्रा पर निकला था। अमर उजाला के कांग्रेसी पत्रकार मित्र से फोन पर मिलने के लिए बात हुई। उनका जवाब था, अभी कुछ देर में आपसे मिलने आ रहा हूँ। मिलना तो दूर फोन भी उनका नहीं आया। आज और भी नजदीक से देखने को मिला कि आखिर कांग्रेसी होते कैसे हैं। यहाँ एक बात साफ़ कर दूँ। एक और मेरे कांग्रेसी मित्र हैं। 2010 में गोरखपुर कांग्रेस के महासचिव हुआ करते थे। नाम है आलोक शुक्ला। इनका नाम इसलिए लिया कि ये भद्र पुरुष हैं। ये कांग्रेस में इसलिए हैं कि सरदार पटेल इनके आदर्श हैं। यही कारण है कि ये आज राजनीति के फर्श पर हैं। संयोग से अब ये भी पत्रकारिता करते हैं। कई बार आलोक जी से कहा भी कि कांग्रेस के एक भी गुन (गुण) आपमें नहीं है। हर बार मुस्कुराकर उन्होंने मुझसे यही कहा, अजय जी मैं झूठ नहीं बोल पाता।
इसी साल जून माह में बनारस से एक सप्ताह के लिए घुमने निकला था। देहरादून शहर से करीब 15 किलोमीटर दूर सिटी बस से जैतुनबाला पहुंचा। दिन के करीब डेढ़ बज रहे थे। सुबह से सिर्फ एक चाय और नमकीन खाया था। भूख बहुत तेज लगी थी। मैं अकेला था। देहरादून तक दो और मित्र थे पर वे आराम करने के मुड में थे। एकला चलो की तर्ज पर मैं घुमक्कड़ी करने जैतुनबाला तक आ गया। यहाँ कई चलता-फिरता होटल सडक के किनारे लगे थे। चार पहिया वाहन में पूरा होटल। शुद्ध शाकाहारी अन्नपूर्णा होटल। गाड़ी के नजदीक पहुंचा। हर थाली का रेट लिखा था। जनरल थाली 40 रुपया। सेवा इतना फास्ट कि 40 रूपये का कूपन पकड़ाते ही भोजन से भरी थाली मेरे हाथ में। खाना खाने के बाद टहल रहा था। दो ऑटो वाले आपस में बात कर रहे थे।
पहला : कितनी कमाई हुई।
दुसरा : क्या कमाई होगी। सुबह से एक भी पर्यटक नहीं मिला। बस घुमक्कड़ों को ढो रहा हूँ। यहीं से मुझे अनुभव हुआ। 40 रूपये का जनरल थाली खाने वाला पर्यटक नहीं कोई घुमक्कड़ ही हो सकता है।

यह दुनियां है या कोई किताब? कितनी मिट्टी के आखर हैं। कितने पर्वत, कितनी नदियाँ... अगर इन पन्नों से होकर गुजरना है...धरती को नापना है तो देहरादून का सैर एक बार जरुर करें। उससे भी ज्यादा अगर माँ के मर्म को समझना है तो सान्ताला देवी दर्शन जरुर करें। जैतुनबाला से ऑटो पकड़ कर पंजाबीवाला पहुंचा। यहाँ से करीब 2 किलोमीटर चलकर हमें सान्ताला देवी मंदिर पहुंचना था। सैकड़ों की संख्या में भक्त माँ की जयकारा लगाते हुए जा रहे थे। उनकी टोली में मैं भी शामिल हो गया।
जोर से बोलो, जय माँ सान्ताला
सबकी माँ हैं सान्ताला
जुवां से माँ शब्द आते ही लगा जैसे सभी थकान कपूर की टिकिया की भांति काफूर हो चुका है। मन में शान्ति इतनी जैसे चिंतन, एकांत और साधना के संगम में हम सभी डुबकी लगा रहे हों। इस तरह से दो किलोमीटर का सफर कब ख़त्म हुआ पता ही नहीं चला। इस पैदल यात्रा में एक अलग प्रकार का रोमांच था। यात्रा महज क्रिया भर नहीं है। एक कला है। एक जीवन दृष्टि, जो भूगोल के नक़्शे से बाहर निकलकर बहुत कुछ समेटती है.... सहेजती है इतिहास के पन्नों को...फिर शब्दों में ढलकर एक किताब का रूप धारण करती है। मेरे इस यात्रा में माँ सान्ताला देवी शब्दों के साथ दिल में भी ढल गईं। मंदिर के छोटे से बरामदे में बैठकर ध्यान लगा रहा था। आँख खुली तो बगल में एक बुजुर्ग हाँथ जोड़कर बैठे थे। उनकी आँखों में आंसू देखकर लगा जरुर बहुत कष्ट में होंगे। कुछ देर बाद मेरी उनसे बातें होने लगी। रोने का कारण पूछा तो उनका उत्तर अजीब सा था। जो बालक जितना अधिक दुखी होता है माँ की उस पर उतना ही अधिक कृपा होती है। मैं अपनी सभी दुखों को याद कर इसलिए रो रहा था कि माँ की कृपा बनी रहे।

तब मुझे लगा कि जब किसी तरह का दुःख आने वाला है तो समझूँ कि मेरे ऊपर जरुर किसी रहबर की कृपा होने वाली है। यही तो है दुःख का अंत। जब दुःख आयेगा तो मेरे भीतर किसी प्रकार की अकड़ नहीं बल्कि आखों में आंसू होगा। किसी के कृपा की चाहत होगी। जब यह सभी गुण सुख में भी बना रहे तो दुःख आयेगा ही नहीं। माँ की कृपा के लिए आंसुओं की नहीं समर्पण की जरूरत होती है। बचपन में चुहानी घर में बैठकर माँ के हाथों से बनी गर्मागर्म रोटियां खाने में जो स्वाद था आज मख्खन लपेटी हुई रोटियों में नहीं। आज पता चला स्वाद रोटी में नहीं था। स्वाद तो माँ के हथेलियों में था। मीठी रोटियों वाली माँ की वह हथेलियाँ आज भी प्यार व आशीर्वाद बरसाती है जब खुद को समर्पण कर देता हूँ। जब मैं रोता हूँ तो इस माँ को अच्छा नहीं लगता। रसोई में बैठकर रोटियां खिलाने वाली माँ कहती है, अपने बेटों को खुश देखकर दिल बाग़-बाग़ हो उठता है। मैं किसी माँ के दर पर जाकर कयों रोऊँ। मेरी तो अपनी माँ है जो मुझे सदा खुश देखना चाहती है।
           
       अजय पाण्डेय

       सुहवल, गाजीपुर

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