Wednesday, 13 September 2017

जब दिल तुम्हें करे याद तो आंखों से निकले आंसू

जब दिल तुम्हें करे याद तो आंखों से निकले आंसू
हाय! यह चांद भी रोये, इन्हें कौन समझाए
हवा भी हुई बावली, देख मुझे लजायी
तो आंखों से निकले आंसू, इन्हें कौन समझाए।।

Monday, 11 September 2017

बीर सपूतों

बीर सपूतों
भारत मां के बीर सपूतों
सो गई है सरकार जगा दो
सीमा के सैतानों को 
उसकी तुम औकात दिखा दो
जाधव भारत का ‘कुलभूषण’ है
नवाज और बाजवा खरदूषण हैं
इस बार भी सबक सिखाएंगे
कुलभूषण को हम बचाएंगे
दिल्ली वालों को बतला दो
सो गई है सरकार जगा दो...
सीमा के सैतानों को
उसकी तुम औकात दिखा दो
गाजीपुर की धरती बीरों की
अब्दुल हमीद रणधीरों की
सौ-सौ प्राण गवाएं है
तब जाकर लाज बचाए हैं
एक और लाल शहीद हो गया
सो गई है सरकार जगा दो...
सीमा के सैतानों को
उसकी तुम औकात दिखा दो
पाकिस्तानी फौज तुम पीछे जाओ
चीन का मत भय दिखाओ
खून की होली खेले हैं
कई बार तुम्हें खदेड़े हैं
युद्ध का उद्घोष करा दो
सो गई है सरकार जगा दो...
सीमा के सैतानों को
उसकी तुम औकात दिखा दो
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

मैं इस पार खड़ा हूं

मैं इस पार खड़ा हूं
तुम नदी के उस पार
दोनों ही दो छोर पर
बीच में जल की धाराएं
आखिर कैसे मिलें दोनों
मैं शरीर तो तुम आत्मा
क्या तुम इस मृत शरीर में
फिर से आ सकोगे
अगर हां तो मिल जाते हैं
नदी की लहरों में एक साथ
मिटा देते हैं मैं व तुम का अस्तित्व
फिर से बन जाते हैं हम
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

ये नेता हैं

ये नेता हैं
ये नेता हैं वोट के लिए
विष बो रहे हैं
अब तो सेना को भी
बांटने की बात कर रहे हैं
किसना कितना योगदान है
देश के लिए
हमें क्यों समझाते हो
तुम अपना योगदान बता दो
जनता को क्यों मूर्ख बनाते हो
पहले दिलों को बांटते थे
अब देश को बांटने की बात
कर रहे हैं
तभी तो अपनी जुबां से
बस जहर उगल रहे हैं
यह जनता है सब समझती है
जो भाषा तुम बोल रहे हो
हमें क्या आजम खां की
भैंस समझ रहे हो
अपनी जनसभाओं में
जनता को भड़काने की
बात कर रहे हैं
वे हमारी भावनाओं से
खेल रहे हैं
चुनाव आयोग की कार्रवाई पर
हाथ मल रहे हैं
बूथों पर वोटों की चोरी
कैसे की जाएगी
कार्यकर्ताओं को समझा रहे हैं
फिर भी खुद को शाह कह रहे हैं
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

सुकमा में शहीद होने वालों की आत्माएं

सुकमा में शहीद होने वालों की आत्माएं
न्याय के लिए भटक रहीं हैं
निंदा से नहीं चलेगा काम
कब तक मरता रहेगा गरीब मां का लाल
एक अपना भी लाल खोकर तो देखो
उस लाल के लिए आंसू बहाकर तो देखो
शव के इंतजार में सूख जाएंगे आंसू
जब लाल आयेगा तिरंगे में लिपटा हुआ
फट जाएगा तुम्हारा भी कलेजा
जब टूटेंगीं चुड़ियां तो तुम मौन रह पाओगे?
क्या इस लाल के लिए भी निंदा कर पाओगे।
अगर नहीं तो फिर क्यों ऐसा कर रहे हो
जवानों की मौत पर आंसू क्यों नहीं बहा रहे हो।
56 इंच का नहीं इंदिरा वाला ही कलेजा ला दो
पाक को उसके घर में घुसकर सबक सीखा दो
अगर लाल बहादुर ही बन गये तो भी मंजूर है
जो अपनी कुर्बानी देकर देश को बचा लिया
तुम तो देश के गद्दारों से ही नहीं निपट पा रहे
इसीलिए तो सुकमा जैसी घटनाओं को
नक्सली अंजाम दे पा रहे?
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

तो यह हैं शर्तिया इलाज वाले डॉक्टर

तो यह हैं शर्तिया इलाज वाले डॉक्टर
*********
बात 2002 व 2003 की है। काशी विश्वनाथ ट्रेन से अक्सर दिल्ली जाना होता था। जनरल डब्बे में ही यात्रा करते थे। सोच भी जनरल की तरह। अब भी कोई खास बदलाव नहीं। जैसे ही ट्रेन गाजियाबाद पहुंचती इश्तिहारों की भरमार। दीवारों पर मोटे अक्षरों में लिखे होते थे-
शर्तिया इलाज
अगर आप वर्षों से परेशान हैं डायबिटीज, कैंसर, मिर्गी, अस्थमा, सफेद दाग,लकवा आदि से तो "शर्तिया इलाज" उपलब्ध है।
डॉक्टर शर्तिया सिंह गाजियाबाद वाले
बैठने का दिन
सोमवार,बुधवार व शनिवार
समय
सुबह 8 से दोपहर 1 बजे तक
शाम को 4 बजे से 9 बजे तक
नोट : अन्य दिन फोन से संपर्क कर सकते हैं।
सलाह लेने की कोई फीस नहीं।
अब आप ध्यान दें ये सारे इलाज उन्हीं बीमारियों के लिए तैयार किये जाते हैं तो पूरी तरह ठीक ही नही होते। ऐसे में इस तरह के इश्तिहार देखकर मरीज को एक आशा की किरण दिखता है। इन सभी रोगों का इलाज एक ही डॉक्टर के पास होता है।
2014 में इसी प्रकार का दावा लेकर देश की जनता के पास डॉक्टर फेकू आये। अनुभव 56 इंच का सीना के साथ।
आतंक का खात्मा, पाकिस्तान थर-थर काँपेगा, भारत के एक सैनिक शाहिद होगा तो दुश्मन के 10 सैनिकों को मारेंगे। नक्सलवाद खत्म होगा। विदेशों में जमा काला धन लाएंगे। दाउद को भारत लाएंगे। सबको रोजगार मिलेगा। सबके अच्छे दिन आयेगें। ये सभी रोगों का इलाज सिर्फ 56 इंच सीना वाला डाक्टर कर पायेगा।
देश की जनता शर्तिया इलाज वाले डॉक्टर फेकू सिंह के झांसे में आ गयी। कारण डाक्टर मनमोहन शर्तिया के डाक्टर नही थे। वे सिर्फ डिग्री वाले थे। वैसे भी इस देश मे डिग्री वालों से ज्यादा अनपढ़ और साक्षर वालों के लिए स्कोप है।
बिना अवकाश लिए 24 घंटे गले मे आला लटकाने वाले यह डाक्टर ने 3 साल तक इलाज करते रहे। रोग घटने की बजाय बढ़ता गया। अब आप चाहकर भी डाक्टर बदल नही सकते। पांच साल का ठेका जो है। जब मरीजों की संख्या बढ़ गई तो डॉक्टर फेंकू ने यूपी में भी एक क्लिनिक खोल ली। वहां झाड़फूंक वाले बाबा को बैठा दिया। अगर शर्तिया इलाज से आप ठीक नहीं हुए तो झाड़फूंक वाले बाबा के पास जाइये। इस झाड़फूंक पर अब तो मुझे भी उम्मीद होने लगा है। कुछ दिनों से पेट दर्द से परेशान हूं। सुना है बनारस में भी एक बाबा झाड़फूंक से रोगों का इलाज करते हैं। डाक्टर के यहां चक्कर काटने से अच्छा है झाड़फूंक ही करा लें। जांच और अल्ट्रासाउंड कराने की झंझट से मुक्ति भी मिलेगी। अगर ठीक हो जाऊंगा तो आपको भी सलाह दूंगा। फिलहाल इंतजार करना होगा।
अजय पांडेय
सुहवल, गाजीपुर

हर क्षण साथ हैं मंसूर

हर क्षण साथ हैं मंसूर
******
आंसू सूख जाए तो मंसूर
आंखें पथरा गई तो मंसूर
अगर तार-तार सपने हैं
कोई पराया हो जाय तो मंसूर
कोई अपना गर बिखर जाय
डगर में साथ छूट जाए तो मंसूर
दुनिया से जाने के बाद भी
मन के द्वार पर दस्तक दे तो मंसूर
अब तो हर क्षण साथ हैं मंसूर
अजय पांडेय
सुहवल,गाजीपुर

सॉरी! मुझे मुआफ कर देना।

सॉरी! मुझे मुआफ कर देना।
इरान के शहर सारी में
सारी रात बैठी थी
‘सारी’ रूखसाना।
सारी के इंतजार में
उसने कर दी
सारी हदें पार।
फिर वह आया
सारी की शापिंग कर
तो कंठ से निकला
सिर्फ सॉरी।
अब ‘सारी’ की आंखों में
आंसू थे अपमान के
उसने कहा, मैं जा रही हूं
सारी शहर को छोडकर
मुझे अकेला छोड़ दो
हाथ जोड़कर कह रही हूं
सॉरी! मुझे मुआफ कर देना।
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

सचिन और प्रियंका को समर्पित

सचिन और प्रियंका को समर्पित
जिंदगी के रास्ते पर
आप दोनों साथ चलना
अनुभव की ईंट से
प्यार की रेत से
एक सुंदर इमारत बनाना
मैं भी कभी आऊंगा
मेहमान बनकर
खुशी होगी समर्पण के
इमारत में कुछ पल गुजारकर
कभी भटकना तो
रास्ता पूछ लेना
मिल जाऊंगा कहीं
तुम दोनों के आसपास ही
विश्वास को न होने देना कम
यही तो जिंदगी है
इसे गांठ बांध लेना
यही जीने की कला है
और साधना भी।।

मेरी हसरतें हर बार धोखा दे गईं मुझे

मेरी हसरतें हर बार धोखा दे गईं मुझे
कहा था सात जन्मों का है साथ।
तब से उसके इंतजार में बैठा हूं।
अब तो आंखें भी धोखा देने लगी।।
सात जन्म अगर लंबा लगे तुम्हें
तो इस जन्म में ही निभा देते।
जफा के बदले वफा दे देते।
तुमने तो कसम भी तोड़ दी।
एक आशिक की भ्रम तोड़ दी।।
मेरी आंखें पथरा गई तो क्या।
सांसों से पहचान लूगा तुम्हें।
हाथों पर हाथ रख दो।
तब भी जान लूंगा तुम्हें।
अब भी नहीं आये तुम।
तो समझ लूंगा कि मोदी थे तुम।
और मैं बेचारी जनता।।
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

बताओ न कब आओगे?

बताओ न कब आओगे?
********
ए सावन अभी तो तुम आये थे
पूरी तरह से मैं भींगा भी नहीं
की तुम चले गए
बताओ न फिर कब आओगे?
ए सावन तुम इतना बरसो कि
मन की कुंठा पानी में धूल जाय
इस बारिश में आकंठ राग बह जाय।
अभी तो 'मय' गया नही
की तुम चले गए
बताओ न फिर कब आओगे?
ए सावन तुम इतना बरसो कि
मन के मुरझाये फूलों को खिलने दो
सूखी हुई इन पत्तों को फैल जाने दो।
अभी तो हरियाली आयी नहीं
की तुम चले गए
बताओ न फिर कब आओगे?
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर।

एक यात्रा

एक यात्रा
*****
मानव मन की जटिल परतों को कुरेदकर दर्द और संताप की जड़े तलाशने वाले खुद की स्मृतियों के बीच खड़े होकर विचार और व्यक्तित्व के बारे में सोचना अभूतपपूर्व अनुभव है। अक्सर मैं खुद को किसी दरख़्त की तरह देखता हूँ।उस दरख़्त का उस धरती से कोई आग्रह नहीं होता जिस पर मैं खड़ा हूँ। अगर उस धरती की इच्छा नहीं होगी तो आग्रह करने के बाद भी गिरा देगी। अगर मुझे सहारा देना चाहेगी तो आग्रह न करने पर भी पत्तियां देंगी,फूल देगी और उस फूल की खुशबू मेरे अंतर्मन को आह्वलादित करेगी।
आज रात ड्यूटी से आने के बाद कभी बैठता तो कभी लेट जाता। नींद गायब थी। कुछ देर बाद किताब पढ़ने लगा। सोचा शायद अब नींद आ जाय। नींद किसी कपूर की टिकिया की तरह उड़ चुकी थी। अब सुबह के 6 बज चुके थे। अब मैं परेशान था। लहरतारा स्थित मेरे आवास से 3 किलोमीटर दूर डीएलडब्लू में एक मेरे मित्र रहते हैं। बाइक उठाया और डीएलडब्लू पहुंच गया। बाहर गेट पर ही मोटे अच्छर में लिखा था। कृपया दरवाजे पर दस्तक न दें। कालवेल का प्रयोग करें। मैं कालवेल का बटन दबाये जा रहा था । बहुत देर बाद भी कोई बाहर निकलकर नहीं आया। तभी उधर से गुजर रहे एक व्यक्ति ने कहा-बिजली है नहीं फिर घंटी कैसे बजेगी? आपके पास नंबर है तो एकबार फोन कर लीजिए। मतलब तीसरा विकल्प तैयार। मुझे लगा विकल्प की तलाश करने की जरूरत नहीं। अगर कालवेल की घंटी नहीं बजी तब भी विकल्प स्वतः आपके पास आएगा। कहीं तलाश करने की जरूरत नहीं। अब मेरा तनाव कुछ कम था। अपने मित्र को फोन न कर सीधे लहरतारा स्थित कमरे पर आ गया। मुझे नींद भी आ रही थी। अब मैं समझ गया था कि रात मुझे नींद क्यों नहीं आ रही थी। मैं सोने जा रहा हूँ। इसके बाद कि कथा नींद खुलने के बाद।
: दूसरे दिन सुबह
दिन के करीब 11 बज रहे थे। फ्रेस होने के बाद चाय बनाने के लिए रात वाला दूध जैसे गैस पर रखा कुछ देर बाद ही दूध फट गया। मेरे देर से जागने का शायद यह नतीजा था। अगर समय से जग गया होता तो चाय मिल गई होती। अब दूध को क्या पता कि किसी तनाव के कारण मैं सो नहीं पाया। इस लिए कुछ देर और इंतजार कर लेता हूँ। अगर फटना ही है तो दोपहर बाद फटूंगा।
दोपहर का समय। मैं बचपन मे खो गया। असभ्य कही जाने वाली उस पीढ़ी से सभ्य हो चुकी इस नई पीढ़ी की तुलना करने लगा। आप भी जान लीजिए।
बढ़ई-बढ़ई खूंटा चिरर, खुटवे में दाल बा।
का खाऊं का पिऊ, का लेके परदेश जाऊं।।
अब से 25-30 साल पहले तक यह खेल-खेल में इस कहानी को बच्चे एक-दूसरे को सुनाते थे। इस कहानी का अर्थ यह है कि चिड़िया को दाना चुंगने के लिए घोसले के बाहर जाना पड़ता है। एक बार उसे चने का एक दाना मिला। दाना एक ही था। उसके घोसले में दो बच्चे भी थे। अगर वह पूरा दाना खा जाती तो बच्चे भूखे रह जाते। इसलिए उस दाना को दलने के लिए चक्की पर ले गयी। उसका दाना चक्की के बीच के खूंटे में फंस गया। उसे निकालने के लिए बढ़ई से उसने निवेदन किया। जब बढ़ई ने चिड़िया के निवेदन को अश्वीकार कर दिया तो वह रोने लगी। उसे लगा कि मैं तो भूखा रह जाऊंगी पर मेरे दोनों बच्चे कैसे भूखा रहेंगे। बच्चों का यह खेल और कहानी परिवार के एका और परिवार के लिए जीने का बोध कराता है। अब न वह खेल रहा न वह बोध। अब के बच्चे वीडियो गेम खेलते हैं। बाइक और कार दौड़। इसलिए अब बड़ा होकर भी बाइक और कार तक ही बच्चे का बोध सीमित रह गया है।
बचपन का दूसरा खेल
ओक्का-बोक्का तीन त लोक्का
लइया-लाठी चंदन काठी.....
इसका अर्थ है कि अपना कोई कितना भी खास है। जिसके लिए हम जीने मरने का कसम खाते हैं पर ओक्का (उसके) तीसरे लोक में जाते ही या कहें (मौत) होते है। पहले लाई से स्वागत करते हैं। चंदन की लकड़ी से जलाते हैं और न जलने पर लाठी से लाठियाते भी हैं। यह कैसा प्रेम? जीवन के इस सत्य को खेल-खेल में ही हमें बता दिया गया था। अब तक इसे हम जान नहीं पाए। कारण सत्य से भागने की बचपन से हमें आदत है। अब भी सत्य से भाग रहे हैं पर कब तक। जब लाठी पड़ेगी तब जानकर हम क्या करेंगे?
बचपन का ही तीसरा खेल है।
चिरई उड़
कौवा उड़
तोता उड़
मैना उड़
भैंस उड़....
सब कुछ तो उंगली से ही इशारों में उड़ा देते थे,पर भैस उड़ाने पर इस खेल में शामिल सभी बच्चे मिलकर हमें सजा देते थे। यह सजा होती थी झूठ बोलने की। भैंस नहीं उड़ती पर हमने भैंस भी उड़ा दी। यह खेल हमें बोध कराता है झूठ से दूर रहो। सत्य न बोलने पर आपके साथ खेलने वाले (साथ रहने वाले) भी आपके विरोधी हो जाएंगे। आपको सजा देंगे। झूठ में कोई आपका अपना भी साथ नहीं देगा। बचपन के इस खेल को आज भी हम नहीं जान पाए। न जानने, न सीखने और न समझने की यह यात्रा आखिर कब खत्म होगी। जीवन से पहले या जीवन के बाद।
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

किससे कहें अपनी खुशी।

किससे कहें अपनी खुशी।
सबका यहां है मन दुखी।।
तुन्हें द्वार-द्वार ढूंढता रहा।
क्या पता तुम हो कहाँ।।
जिंदगी थी अंधकार की।
तकरार की इनकार की।।
क्या पता फिर ना मिले।
कर लो करार इकरार की।।
हर मौज है यहां कहकशी
किससे कहें अपनी खुशी...।।
वह ज्ञान बांटता रहा।
यह ध्यान बांटता रहा।।
क्या पता कौन कहाँ रहे।
मैं प्यार बांटता रहा।।
यह खेल नहीं एक हंसी।
किससे कहें अपनी खुशी...।।
गुजर रही थी तुम पर क्या।
यह सोचकर उदास था।।
क्या पता वह फिर मिले।
साथ-साथ चल पड़े।।
रुद्राक्ष था पर पर बहुमुखी।
किससे कहें अपनी खुशी...।।
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

जिंदगी एक फूल है

जिंदगी एक फूल है
इसे विषैले जल से मत सींचो
वरना कांटा बन जाएगी
यह फूल सी जिंदगी।
चुभने लगोगे दूसरों को
अपने भी हो जाएंगे पराये
खुद को फूल ही रहने दो।
अजय पाण्डेय
सुहवल,गाजीपुर

खूंटी पर टंगे कुछ प्रश्न

खूंटी पर टंगे कुछ प्रश्न
आता-जाता देखता-सुनता
पर मैं मौन।
कुछ उत्तर नहीं सुझता
एक दिन घबड़ाकर
उसे घुंटी से उतारकर
अपने शिक्षक के घर की
घुंटी पर टांग आया।
यह सोचकर कि
इसे यहां उत्तर मिल जाएगा।
मैं बंद दरवाजा के भीतर
घर मे सो गया आराम से।
अब यहां कोई प्रश्न नहीं होगा।
अचानक किवाड़ पर दस्तक हुआ।
दरवाजा खोला तो सामने
पोटलियों से भरा प्रश्न खड़ा था।
कहा, मुझसे दूर मत भाग
मेरे प्रश्नों का उत्तर ढूंढ
मैं ही शिक्षक हूं
अब घर की घुंटीयों पर
टांग दिया गया हूँ।
सिर्फ शिक्षक दिवस के दिन
लोग आते हैं मुझे बधाइयां देने
मेरे प्रश्नों का हल कोई
ढूंढे तो जानें।।