Monday, 11 September 2017

एक यात्रा

एक यात्रा
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मानव मन की जटिल परतों को कुरेदकर दर्द और संताप की जड़े तलाशने वाले खुद की स्मृतियों के बीच खड़े होकर विचार और व्यक्तित्व के बारे में सोचना अभूतपपूर्व अनुभव है। अक्सर मैं खुद को किसी दरख़्त की तरह देखता हूँ।उस दरख़्त का उस धरती से कोई आग्रह नहीं होता जिस पर मैं खड़ा हूँ। अगर उस धरती की इच्छा नहीं होगी तो आग्रह करने के बाद भी गिरा देगी। अगर मुझे सहारा देना चाहेगी तो आग्रह न करने पर भी पत्तियां देंगी,फूल देगी और उस फूल की खुशबू मेरे अंतर्मन को आह्वलादित करेगी।
आज रात ड्यूटी से आने के बाद कभी बैठता तो कभी लेट जाता। नींद गायब थी। कुछ देर बाद किताब पढ़ने लगा। सोचा शायद अब नींद आ जाय। नींद किसी कपूर की टिकिया की तरह उड़ चुकी थी। अब सुबह के 6 बज चुके थे। अब मैं परेशान था। लहरतारा स्थित मेरे आवास से 3 किलोमीटर दूर डीएलडब्लू में एक मेरे मित्र रहते हैं। बाइक उठाया और डीएलडब्लू पहुंच गया। बाहर गेट पर ही मोटे अच्छर में लिखा था। कृपया दरवाजे पर दस्तक न दें। कालवेल का प्रयोग करें। मैं कालवेल का बटन दबाये जा रहा था । बहुत देर बाद भी कोई बाहर निकलकर नहीं आया। तभी उधर से गुजर रहे एक व्यक्ति ने कहा-बिजली है नहीं फिर घंटी कैसे बजेगी? आपके पास नंबर है तो एकबार फोन कर लीजिए। मतलब तीसरा विकल्प तैयार। मुझे लगा विकल्प की तलाश करने की जरूरत नहीं। अगर कालवेल की घंटी नहीं बजी तब भी विकल्प स्वतः आपके पास आएगा। कहीं तलाश करने की जरूरत नहीं। अब मेरा तनाव कुछ कम था। अपने मित्र को फोन न कर सीधे लहरतारा स्थित कमरे पर आ गया। मुझे नींद भी आ रही थी। अब मैं समझ गया था कि रात मुझे नींद क्यों नहीं आ रही थी। मैं सोने जा रहा हूँ। इसके बाद कि कथा नींद खुलने के बाद।
: दूसरे दिन सुबह
दिन के करीब 11 बज रहे थे। फ्रेस होने के बाद चाय बनाने के लिए रात वाला दूध जैसे गैस पर रखा कुछ देर बाद ही दूध फट गया। मेरे देर से जागने का शायद यह नतीजा था। अगर समय से जग गया होता तो चाय मिल गई होती। अब दूध को क्या पता कि किसी तनाव के कारण मैं सो नहीं पाया। इस लिए कुछ देर और इंतजार कर लेता हूँ। अगर फटना ही है तो दोपहर बाद फटूंगा।
दोपहर का समय। मैं बचपन मे खो गया। असभ्य कही जाने वाली उस पीढ़ी से सभ्य हो चुकी इस नई पीढ़ी की तुलना करने लगा। आप भी जान लीजिए।
बढ़ई-बढ़ई खूंटा चिरर, खुटवे में दाल बा।
का खाऊं का पिऊ, का लेके परदेश जाऊं।।
अब से 25-30 साल पहले तक यह खेल-खेल में इस कहानी को बच्चे एक-दूसरे को सुनाते थे। इस कहानी का अर्थ यह है कि चिड़िया को दाना चुंगने के लिए घोसले के बाहर जाना पड़ता है। एक बार उसे चने का एक दाना मिला। दाना एक ही था। उसके घोसले में दो बच्चे भी थे। अगर वह पूरा दाना खा जाती तो बच्चे भूखे रह जाते। इसलिए उस दाना को दलने के लिए चक्की पर ले गयी। उसका दाना चक्की के बीच के खूंटे में फंस गया। उसे निकालने के लिए बढ़ई से उसने निवेदन किया। जब बढ़ई ने चिड़िया के निवेदन को अश्वीकार कर दिया तो वह रोने लगी। उसे लगा कि मैं तो भूखा रह जाऊंगी पर मेरे दोनों बच्चे कैसे भूखा रहेंगे। बच्चों का यह खेल और कहानी परिवार के एका और परिवार के लिए जीने का बोध कराता है। अब न वह खेल रहा न वह बोध। अब के बच्चे वीडियो गेम खेलते हैं। बाइक और कार दौड़। इसलिए अब बड़ा होकर भी बाइक और कार तक ही बच्चे का बोध सीमित रह गया है।
बचपन का दूसरा खेल
ओक्का-बोक्का तीन त लोक्का
लइया-लाठी चंदन काठी.....
इसका अर्थ है कि अपना कोई कितना भी खास है। जिसके लिए हम जीने मरने का कसम खाते हैं पर ओक्का (उसके) तीसरे लोक में जाते ही या कहें (मौत) होते है। पहले लाई से स्वागत करते हैं। चंदन की लकड़ी से जलाते हैं और न जलने पर लाठी से लाठियाते भी हैं। यह कैसा प्रेम? जीवन के इस सत्य को खेल-खेल में ही हमें बता दिया गया था। अब तक इसे हम जान नहीं पाए। कारण सत्य से भागने की बचपन से हमें आदत है। अब भी सत्य से भाग रहे हैं पर कब तक। जब लाठी पड़ेगी तब जानकर हम क्या करेंगे?
बचपन का ही तीसरा खेल है।
चिरई उड़
कौवा उड़
तोता उड़
मैना उड़
भैंस उड़....
सब कुछ तो उंगली से ही इशारों में उड़ा देते थे,पर भैस उड़ाने पर इस खेल में शामिल सभी बच्चे मिलकर हमें सजा देते थे। यह सजा होती थी झूठ बोलने की। भैंस नहीं उड़ती पर हमने भैंस भी उड़ा दी। यह खेल हमें बोध कराता है झूठ से दूर रहो। सत्य न बोलने पर आपके साथ खेलने वाले (साथ रहने वाले) भी आपके विरोधी हो जाएंगे। आपको सजा देंगे। झूठ में कोई आपका अपना भी साथ नहीं देगा। बचपन के इस खेल को आज भी हम नहीं जान पाए। न जानने, न सीखने और न समझने की यह यात्रा आखिर कब खत्म होगी। जीवन से पहले या जीवन के बाद।
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

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