Sunday, 12 June 2016

18 अप्रैल 2014 की रचना। जब बनारस से केजरीवाल व नरेंद्र मोदी लोकसभा के प्रत्याशी थे। 


हे भाजपाइयों 



हे भाजपाइयों
केजरीवाल का क्यों
विरोध कर रहे हो।
फूलों की पंखुडिय़ों के बदले
टमाटर फेंक रहे हो।
इस तरह तो तुम
बाबा विश्वनाथ की नगरी
को बदनाम कर रहे हो।
पहले गांधी का और अब
गांधीगीरी का विरोध कर रहे हो।
क्या मान लूं कि नाथूराम गोडसे
की राह पर चल रहे हो।
कांग्रेस और सपा प्रत्याशियों का
विरोध क्यों नहीं करते
शायद तुम्हें मालूम है वहां
फूल नहीं कुछ और मिलेगा।
मेरे लाल एेसा क्यों किया
पूर्वजों को भी खलेगा।
मार इतनी पड़ेगी कि पिचके टमाटर
और फूटे अंडों सा तुम
सड़क पर बिखर जाओगे
फिर तो नमो-नमो नहीं
बाप-बाप चिल्लाओगे
मैं तो कहता हूं यह
लहर नहीं जहर है।
नीलकंठ को समर्पित कर दो।
दो शब्द प्रेम का
काशी में भी रहने दो।
-अजय पांडेय

सुहवल, गाजीपुर

ये नेता हैं 

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ये नेता हैं वोट के लिए
विष बो रहे हैं 
अब तो सेना को भी
बांटने की बात कर रहे हैं
किसका कितना योगदान है देश के लिए
हमें क्यों समझाते हो .
तुम अपना योगदान बता दो
जनता को क्यों मूर्ख बनाते हो
पहले दिलों को बांटते थे
अब देश को भी बाटने की
बात कर रहे हैं
तभी तो अपनी जुबा से बस
ज़हर उगल रहे हैं
ये जनता है समझती है
जो भाषा तुम बोल रहे हो
हमें क्या आज़म खां की
भैस समझ रहे हो
अपनी जनसभाओं में
जनता को भड़काने की
बात कर रहे हैं
इस तरह वो हमारी भावनाओं
से खेल रहे हैं
चुनाव आयोग की कार्यवाही पर
हाथ मल रहे हैं
बूथों पर वोटो की चोरी
कैसे की जाएगी
कार्यकर्ताओं को समझा रहे हैं
फिर भी खुद को शाह कह रहे हैं 
24 अप्रैल 2्14 की यह रचना। काशी में नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल लोकसभा चुनाव में सांसद प्रत्याशी थे। एक कार्यक्रम के दौरान भाजपा कार्यकर्ताओं ने केजरीवाल पर टमाटर व अंडों से हमला किया था। उसके एक दिन बाद केजरीवाल की जनसभा में उनके पार्टी के नेता सोमनाथ भारती के साथ मारपीट  की थी। 

हे भाजपाइयों 


हे भाजपाइयों
पहले टमाटर-अंडे फेंकते थे
अब खून भी बहाने लगे
तुम तो महमूद गजनवी
के रास्ते पर चलने लगे 
गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया
तुमने सोमनाथ भारती पर
उसने दौलत लूटने के लिए
और तुम वोट के लिए
अंतर सिर्फ इतना है
वह मंदिर था
यह मानुष है
तुम्हारी क्या गारंटी
कि तुम कहाँ के हो
तुम न काशी के हो
न कावा के
यकीन न हो तो इतिहास देख लो
किसी बड़े बजुर्गों से पूछ लो
लेकिन सोमनाथ सौ फ़ीसदी भारतीय है भारतीय है भारतीय है
काम से भी नाम से भी...
-अजय पाण्डेय

छोटा ही सही कलमकार बन गया


मुझे आज भी याद है वह दिन 
जब दूसरी, तीसरी कक्षा में था 
शाम को छुट्टी की घंटी बजती 
बहुत खुश होता.घर जाता 
नीम के पेड़ पर चढ़कर 
दोस्तों संग ओलापाती खेलता
सभी त्यौहार याद रहता
ऐसा नहीं की पढ़ने में तेज था
इसलिये कि उस दिन छुट्टी रहती
किताब छोड़ गुल्ली डंडा खेलता
पाठ भले न याद हो
अगली छुट्टियाँ जरुर याद रहती
बड़ा होता गया आठवी, नवी
फिर दसवीं में पहुंच गया
अब झूठ बोलकर छुट्टियाँ लेने लगा
कभी खुद बीमार होता तो कभी
माँ को भी बीमार कर देता
मामा, बुआ के यहाँ जाकर
मस्ती करता, पकवान तोड़ता
इस छुट्टी की आदत ने
पढाई में कमजोर कर दिया
गुरुजनों के निगाह से भी गिरा दिया
छोटा भाई प्रथम तो मै
मैं सेकंड से पास हुआ
ग्यारहवीं, बारहवीं और
बीए तक यही हाल रहा
अगर कोई सवाल फंसता तो
पिताजी कहते छोटे भाई से पूछ लो
अब तो घर में छोटे भाई की ही पूछ थी
पहनने, खाने की खूब छूट थी
पिताजी का सपना था
की मैं अध्यापक बनूं
पर पत्रकार बन गया
छोटा ही सही कलमकार बन गया
यहाँ भी छुट्टियां पीछा नहीं छोड़ रही
यह कैसी क़यामत ढा रही
यह मेरा साथ नहीं छोड़ती
या मैं खुद बंधा हूँ इस डोर से
अगर हाँ तो काटूँगा इस डोर को
काशी के लल्लापुरा में कुछ शोहदों ने एक लड़की को जला दिया थाा ।  27 दिसंबंर 2014  को उसकी मौत हो गई। गई थी। काशी की इस बेटी को समर्पित उसी दिन मैंने यह कविता लिखी थी। आज इसे यहां पोस्ट कर रहा हूं।  

कोई है जो यह कह सकेगायह मेरी काशी है।


आज रो रहा मैं, अश्कों के बगैर
कतरा-कतरा मेरे आंखों से टपक रहा
काशी की बेटी जला दी गई सरे मुहल्ले में
चीखती मगर जुबा पर आवाज न थी
मौत लहरा रही थी उसके चेहरे पर
वो जल्लाद अट्टहास भर रहा था
वह हर चेहरे को खुदा मान
जिंदगी की गुहार लगा रही थी
पर सभी अंगद के पांव की भांति जम गये
किसी के दिल से आह भी न निकली
आखिर आठ दिन बाद उसने
दुनियां को अलविदा कह दिया
आज से आठ दिन पहले
इसी काशी के आंगन में
धूप भरे दामन में
वह चहकती थी, खिलखिलाकर हंसती थी
पर रात में मौत का पैगाम आया
उसे अपनों ने हिलाया-डुलाया
अब वह एक लाश थी
वह अपना मृत शरीर छोड़ गई
नोचने को, खेलने को, उन जल्लादों के लिए
जो कभी उसके जज्बातों से खेलते थे
अपनी मौत के साथ एक प्रश्न छोड़ गई
आखिर यह काशी किसकी है।
जहां हैवानियत का नंगा नाच होता है
लोग दूसरे के जज्बातों से खेलते हैं
लड़कियां जलाई जातीं हैं
कोई है जो इसका श्रेय लेगा
कोई है जो यह कह सकेगा
यह मेरी काशी है, यह मेरी काशी है।
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

घर में रहकर किसे ज्ञान मिला


भूकंप ने महल वालों को भी भागना सीखा दिया, 
कुछ पल के लिए सही, आसमान के नीचे 
रहना सीखा दिया। 
मैदान में धूप के बीच युवक और युवतियां 
खडे हो माथे से पसीना पोछ रहे थे। 
न एसी, न पंखा और न ही कूलर
अगर कुछ था तो सूरज की तपिश
और साथ में भूकंप का डर
एक ने बोला, भूकंप ने भेदभाव मिटा दिया
जीवन का अर्थ समझा दिया
यहां न कोई छोटा न बडा
ईश्‍वर जब कहर बरबाता है तो
सभी उसके आगोश में होते हैं
अब उसे कौन समझाए
ज्ञान के लिए बाहर भागना पडता है
महल में रहकर अब तक किसे ज्ञान मिला
भाग-भाग कर ही तो सभी को ज्ञान मिला
चाहे वह गांधी हाें या गौतम बुद़ध।


अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

गांधी जी के साथ अखलाक को भी नमन 

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मजहब के नाम पर बने देश में इंसानों की जिन्दगी दर्दनाक अंत की ओर बढ़ने लगती है। जैसे जंगल के जीव अपने से कमजोर जीव-जंतु का शिकार कर अपनी भूख मिटाते हैं ठीक इसी प्रकार धरती के मजहबी प्राणी अपने मजहब को ज़िंदा रखने के लिए मनुष्य के साथ इंसानियत का भी कत्ल कर देते हैं।
आपके मन में भी शायद येसा विचार कभी जरुर आया होगा। दादरी में जो कुछ हुआ सारी सीमाएं तोड़ दी। इंसानियत की दीवार ढह गई। हमाम में सभी नंगे हो गये। हद तो तब हो गई जब बजीर ने कहा-यह एक हादसा था। उन्मादी मजहबी भीड़ यैसे बयान देने वाले बजीर को 24 कैरेट का नेता मानती है।
अब मंदिरों में ईश्वर भी कलंकित हो रहे हैं। मंदिर में प्रार्थना सभा नहीं इंसान को इंसान का खून पीने के लिए उकसाया जा रहा है। दादरी में जिस अखलाख की ह्त्या कर दी गई उसका गवाह वह मंदिर भी है जहां से गाय का मांस पकने का अफवाह फैलाया गया। बजीर साहब यह हादसा नहीं आतंक है। बाहरी दुनिया में तो आतंकबाद पर अच्छा बोल लेते हैं पर जब घर में होता है तो हादसा बता देते हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की आज जयंती है। यै मानवता खून करने वालों तुम्हारे कृत्यों को जानकार अहिंसा का यह पुजारी आज राजघाट पर बैठ आंसू बहा रहा होगा। अगर तुम गाँधी को माला पहनाने राजघाट जाना तो वही पर दो फूल अखलाक को भी चढाकर पश्चाताप के दो आंसूं जरुर बहा लेना। इससे तुम्हारा पाप शायद कुछ कम हो जाय।
राम हों या रहीम अगर मनुष्य में भेद पैदा करें तो दोनों ही हमारे आदर्श नहीं हो सकते। अगर मंदिर-मस्जिद से देश में अशान्ति फैलाने और खून करने की साजिश रची जाती हो तो वहां ईश्वर-अल्ला नहीं हो सकते।
गाँधी जी ने मुक्तिदूत में मनुवाद पर प्रहार करते हुए कहां था-
अगर हरिजन के छू लेने से मंदिर का है कल्याण नहीं, तो मैं कहूंगा मंदिर में सब पत्थर है भगवान नहीं।
मनुवाद पर प्रहार करने वाले गांधी अगर जाने होते कि उसी पत्थर के मंदिर से मनुष्य का खून बहाने का आह्वान किया जाएगा तो कुछ और ही लिखे होते। मनुष्य से भेदभाव करने वाले जानवरों में भी भेद कर रहे हैं। बीफ़ के मांस का तो विरोध करते हैं पर होटलों में बैठकर चिकेन और बिरयानी खाते हैं। जीव तो जीव होता है। क़त्ल तो कत्ल होता है। चाहे वह मनुष्य, गाय, सुअर, बकरी, मुर्गी और ऊंट ही कयों न हों। यह हम नहीं कह रहे गांधी जी के अहिंसा के पाठ में हमें बताया गया है।

 अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

असहिष्णु हुआ मौसम

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यह मौसम भी असहिष्णु हो गया
इतना कुहरा 
इतनी ठण्ड
इस मौसम को न गरीब की फ़िक्र
न मेरी
पुरस्कार न सही
कुछ गर्म कपडे ही लौटा दो
सरकार को नहीं
उन गरीबों को
लाचार और जरुरतमंदों को
जिनके बदन पर कपडे नहीं
काशीनाथ सिंह हों या
मुनव्वर राणा
तुम मेरे आह्वान को
अभियान बना दो
तब समझूंगा
तुम भी सहिष्णु हो गए।
अजय पाण्डेय, सुहवल गाजीपुर

हे ! नारी तुम महान हो

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बचपन में पढ़ाई के समय " इलाहाबाद के पथ पर तोड़ती पत्थर ....." कविता पढ़ा था। तभी मेरे जेहन में एक ही सवाल बार-बार कौंध रहा था। हे नारी तुम कितनी महान हो। अपने बेटे को पालने के लिए भरी दोपहरी में दो रोटी की जुगाड़ में इलाहाबाद के पथ पर पत्थर तोड़ रही थी। अब आज डाक्टर ओपी के इस चित्र को देख यह लगा कि इतने दिनों बाद भी नारी वहीँ है जहाँ पहले थी। बारिश और कीचड़ के बीच सिर पर टोकरी का बोझ .... यह रोटी का ही तो जुगाड़ है।
आज मैं लखनऊ में था। एक सज्जन मिले किसी बात पार उन्होंने एक ज्ञान की बातें कह डाली। अब आप भी सुन लीजिये। उन्होंने कहा, जब औरतों का नाक न हो तो वे मैला भी खा जायेंगी। वहां दो-तीन महिलायें भी थीं। खैर यह उनकी महानता थी कि इस बात का ज़रा सा विरोध नहीं किया। कहा भी गया है, नारी का दूसरा नाम सहनशीलता है। मुझसे रहा नहीं गया। लगा यह तो नारी दिवस पर नारी का अपमान है। मैंने अपना तर्क रखा। हाँ नारी पर कही गयी उक्त विद्वान की बात तो सही है, पर पुरुष तो नाक रहते हुए मैला खा लेता है। नारी नाक का सही उपयोग तो कर रही है। इस बात की गारंटी तो है की जब तक नाक सही सलामत है मैला नहीं खाएगी। पुरुष की क्या गारंटी?? क्या आपको नहीं लगता कि जिस नारी को शक्ति का रूप कहा गया है। जिस नारी को दुर्गा का रूप कहा गया है ... उसे हम मैला खाने की बात कह रहे हैं।। उसका हम अनादर कर रहे हैं। उसका अपमान कर रहे हैं। जिस नारी ने इलाहाबाद के पथ पर भरी दोपहरी में पत्थर तोड़कर .... पसीने से सना आंटे की रोटी खिलाकर तुम जैसा मर्द तैयार किया। तुम जैसा पौरुष तैयार किया .... और तुम... और तुम्हारी सोच ... और तुम्हारा नजरिया यह?? सौ साल पहले भी एक नारी एक अबोध बच्चे को मर्द बनाने के लिए मजदूरी करती थी। आज भी कर रही है। अबोध बालक से मर्द बन जाने के बाद सौ साल पहले नारी के बारे में पुरुष " नारी और मैला" का उदाहरण देता था। आज अब भी दे रहा है ... और इसकी क्या गारंटी कि आने वाले सौ साल बाद नहीं देगा?
हे पुरुष वर्ग अगर एक नारी के प्रति तुम्हारी यही नजरिया है। तो तुम नारी को दुर्गा कहना छोड़ दो। एक नारी को आदि शक्ति कहना छोड़ दो। एक नारी को माँ कहना छोड़ दो।
नहीं छोड़ सकते न। मैं जानता हूँ कि पुरुष वर्ग में दोहरा चरित्र होता है। एक तरफ नारी का दूध पीकर पौरुष बनते हो। नारी शक्ति का पूजा कर खुद का कल्याण चाहते हो... पर जब उसी नारी को " नाक और बिष्टा" जैसा शब्द कहकर अपमान करते हो। यही कारण है कि आज भी नारी शक्ति के बाद भी अबला है... और तुम सबला। आज भी अबला के आंचल में दूध और आँखों में पानी है। आंचल का दूध तो तुम पी जाते हो पर आंसू नारी के हिस्से छोड़ जाते हो। अब तुम ही बताओ महान किसे कहें। नारी को या तुम्हे.... हे! नारी तुम महान हो।
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

Saturday, 11 June 2016

जिंदगी जहर नहीं

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जिंदगी जहर नहीं, दुखों का कहर सही
अगर तुम्हारा साथ हो, सर पे मेरे हाथ हो
हर क्लेश छोड दूं, विरह से मुख मोड लूं
दुखों का रेला तोड दूं, सुखों का मेला जोड लूं
खुशियों का गुबार दूं, अगर तुम्हारा साथ हो ----
वक्त भले ठहर जाए, रोशनी बिखर जाए
गमों के आखियानें में, जिंदगी का अंधेरा हो
दिल जला के रोशनी दूं, अगर तुम्हारा साथ हो ---
लूटा के मैं अपनी खुशी गीत बांटता चलूं
आंसूओं के समंदर से संगीत लूटाता चलूं
नफरत को नया नाम दूं, अगर तुम्हारा साथ हो ---
कांटों का अगर माला हो, जीवन जहर का प्याला हो
दिल के कोरे कागज पर, आंसूओं की वर्णमाला से
लिखूंगा किताब तेरी, अगर तुम्हारा साथ हो ----
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

ठगते लोग बनारस को

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बहुत बार देखा है मैंने
ठगते लोग बनारस को
सबके पथ यह फूल बिछाते
इसके पथ कांटे और खार
सड़कें टूटीं, गलियां उदास हैं
कूड़ों का अंबार बहुत है
हिस्से आया खोटा सिक्का
फिर भी मन में बहुत हुल्लास है
बहुत बार देखा है मैंने, ठगते लोग बनारस को...
सखियां, सधवा, पास पड़ोसी
निर्धन, निर्मम या जग उपहासी
सबकी पूजा का व्रत है मन में
नहीं चिंता क्या होगा अग्निपथ में
बहुत बार देखा है मैंने, ठगते लोग बनारस को...
संत तुलसी हों या पंथ कबीरा
गौतम बुद्ध या कृष्ण की मीरा
सुबह-ए-बनारस सबने देखा है
दिये संग जलते किसने देखा है?
बहुत बार देखा है मैंने, ठगते लोग बनारस को...
'काशी' की थाती गंगा का आंचल
उसको भी मैला कर जाते
पुण्य लाभ का डुबकी लगाकर
इनके हिस्से पाप छोड़ जाते
बहुत बार देखा है मैंने, ठगते लोग बनारस को...
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

सो गई है सरकार जगा दो

भारत मां के वीर सपूतों
सो गई है सरकार जगा दो
सीमा के शैतानों को 
उसकी तुम औकात दिखा दो।
गाजीपुर की धरती वीरों की
अब्दुल हमीद रणधीरों की
सौ सौ प्राण गवाएं हैं
तब जाकर लाज बचाए हैं
एक और लाल शहीद हो गया
अब तो मां की लाज बचा दो
भारत मां के वीर सपूतों
सो गई है सरकार जगा दो
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

नहीं आये अच्छे दिन


दिन गये, साल गये
नहीं आये अच्छे दिन
वह जो तट को छू
चाय की प्याली में 
लहर को उछाल गया था
सिर्फ चुनावी हवा थी
मंचों से किये गये वादे
अब भूली बिसरी
कथा बन गई
किसी अकथ व्यथा की तरह
अपनों से लड़कर-भिड़कर
बूथों पर कमल खिलाई
हमें नहीं पता था उसकी तरुणाई
अब तो अच्छे दिन के इंतजार में
आंखें भी पथराई
हम जिसे समझ लिये थे मोती और मूंगा
वह निकला शंख और घोंघा
पीछे से फूंको तो तेज आवाज
अंदर से खोखला
रात में सोये तो
सपने में गांधी जी बोले
मत उदास हो बालक
अब तो तेरे शहर में दौड़ेगी मेट्रो
शहर का विकास भी उसी रफ्तार में होगा
मैंने साहस कर पूछ लिया
गांधी जी आप को गुजरात के साबरमती में रहते हो
फिर यूपी में कहां भटक रहे हो
गांधी जी बोले-नाथूराम के भक्तों से खतरा है
गुजरात से महराष्ट्र तक
हरियाणा से झारखंड तक में
इनकी ही चलती है
एक यूपी ही बचा है
जहां गांधी सुरक्षित हैं
जो मैने 'मुक्तिदूत' में कहा था
वही आज 'पीके' कह रहा है
बवाल तब भी मचा था
बवाल अब भी मचा है
अब अपनों से मत लड़ना-भिड़ना
गोडसे नहीं, गांधी के ही रास्तों पर चलना
अच्छे दिनों के चक्कर में मत पड़ना
मुझे यूपी में रहने देना, मुझे यूपी में रहने देना।
अजय पाण्डेय

बेटी ही बचाएगी

अगर न होती घर में बेटी
चंचल मन आवारा होता
ईश्वर तक अपराधी होता
अपराध बोध का मारा होता
रामायण न होती घर-घर में
गीता अबुझ पहेली होती
प्यार न होता इस धरती पर
हर-एक मन बंजर होता
अपराध बोध का मारा होता
अगर न होती घर में बेटी
गोद न भरती किसी किरण की
सारा जहां निरबंशी होता
डोली रहती बिन दुल्हन की
हर घर में बस रुदन होता
अपराध बोध का मारा होता
अगर न होती घर में बेटी
जो बात समझ जाए इतना सा
हर जवाहर के घर इंदिरा होती
सर कलम न होता जवानों का
पाक का कई बंटवारा होता
अपराध बोध का मारा होता
अगर न होती घर में बेटी
सरस्वती न खोती संगम तट पर
यमुना भी यौवन में होती
बेटा-बेटी का भेद मिटता तो
गंगा जल नहीं काला होता
अपराध बोध का मारा होता
अगर न होती घर में बेटी
कली न खिलती किसी चमन में
बगियों में बस पतझड़ होता
बेटी ही बचाएगी
कभी नहीं यह शीर्षक होता
अपराध बोध का मारा होता
अगर न होती घर में बेटी

अजय पाण्डेय
रेहाना की घर वापसी

काशी का पुराना अस्सी घाट बिजली की दूधिया रोशनी से नहा रहा था। गंगा आरती खत्म होने के बाद पंडित नीलमणि अभी कुछ आगे ही बढ़े थे कि बगल में पेड़ के पास चबूतरे पर बैठी एक महिला की ओर नजर गई। वह ठिठक गए। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह वही रेहाना है, जिससे वर्षों पहले प्रेम करता था। माथे पर सिंदूर और हिन्दू महिला के परिधान में उसे देखकर कुछ शक भी हुआ। उस महिला की गोद में एक बच्ची भी थी। बगल में हट्ठा-कट्ठा बैठा एक नौजवान पुरुष रेहाना से बातें कर रहा था। अब घाट से अधिकतर लोग जा चुके थे। इक्का-दुक्का ही लोग बैठे थे। वह साहस कर जिस चबूतरे पर रेहाना थी, जाकर बैठ गया।
रेहाना भेलपूरी खा रही थी। बगल में बैठे युवक पर जब नजर गई तो उसके हाथ कांपने लगे। वह घबरा सी गई। उसकी आंखों में जैसे धुआं भर गया हो। इसके बाद उसकी आंखें भर आईं। शायद वह अतीत की यादों को इन आंसुओं से श्रद्धांजलि दे रही थी। दोनों एक दूसरे को कभी तिरछी नजर से देखते तो कभी आंखें नीचे कर लेते। नीलमणि से बातें करने के लिए रेहाना उत्सुकथी। पास में बैठा उसका पति और किसी अनहोनी की डर से वह साहस भी नहीं जुटा पा रही थी। नीलमणि उसका पहला प्यार जो था। कभी उसके सुख-दुख का साथी था।
रेहाना का मन अब उड़ रहा था। जैसे जिंदगी इतनी कभी खूबसूरत नहीं थी जितनी आज। हवा में एक अजीब सी छुवन थी, एक अजीब सा दर्द भी। साहस करके उसने पूछ दिया। कहीं तुम नीलमणि तो नही?
हां मैं नीलमणि हूं... और तुम रेहाना?
रेहाना ने सिर हिलाकर हामी भर दी।
पास में बैठा रेहाना का पति मुकेश उसकी तरफ देखने लगा। अभी वह कुछ कहता कि इससे पहले ही रेहाना ने नीलमणि का परिचय देते हुए कहा कि यह मेरे बचपन का दोस्त है। हम एक ही मुहल्ले में रहते थे। कक्षा एक से आठवीं तक साथ पढ़े। बाद में अब्बू ने मुझे आगे नहीं पढ़ने दिया।
नीलमणि अब पंडित नीलमणि बन चुका था। उसने मुकेश को अपना विजटिंग कार्ड देते हुए कहा, कभी मेरे यहां भी जरूर आना।
मुकेश ने सिर हिलाते हुए - क्यों नहीं, जरूर आउंगा।
रेहाना अपने पति मुकेश के साथ वहां से जाने लगी। नीलमणि बहुत ध्यान से रेहाना को निहार रहा था। वह भी पीछे मुड़कर तब तक नीलमणि को देखती रखती रही, जब तक कि वह आंखों से ओझल नहीं हो गया।

मुकेश भी उधर डरा सहमा हुआ था। वह मन में ही सोच रहा था कि नीलमणि इन चार वर्षों में उससे कभी नहीं मिला था। छुट्टियों में वह रेहाना के साथ अक्सर अस्सी घाट पर जाता था। फिर अचानक आज कैसे मुलाकात हो गई। गाजीपुर के जमानियां से यहां आए हुए चार साल हो गए। यह चार साल कब गुजर गया पता ही नहीं चला। घर पर किसी की कोई खोज खबर नहीं। आखिर घर वाले कैसे होंगे। कमरे पर पहुंचने के बाद मुकेश रेहाना से नीलमणि के बारे में पूछने लगा। रेहाना भी मुकेश को अपना सब कुछ दे बैठी थी। मुकेश ने भी तो दूसरे धर्म का होते हुए भी उसे अपनाया। अब ऐसे में वह मुकेश से झूठ कैसे बोल सकती। उसने फैसला किया कि वह नीलमणि के बारे में मुकेश से सब कुछ बता देगी।
रेहाना चाय का प्याला लेकर आई। दोनों चाय पीने लगे। वह घबड़ाए हुए थी। उसके होंठ कांप रहे थे। चाय की चुश्कियों के साथ उसने अपनी बात रखनी शुरू कर दी। मुकेश भी उसकी बातों को ध्यान से सुन रहा था। नीलमणि व रेहाना में खूब दोस्ती थी। तब यह भी ज्ञान नहीं था कि लड़का और लड़की में दोस्ती का मतलब कुछ और भी होता है। कई बार जब नीलमणि के घर जाती थी तो उसके पिताजी व बड़े भाई डांट कर भगा देते थे। कहते थे कि यह ब्राह्मण का घर है। तुम मुस्लिम वर्ग से हो। मेरे घर मत
आया करो। नीलमणि का साथ भी छोड़ दो। तब मैं घर जाकर बहुत रोई थी। जब मां को यह बात पता चला तो उसने भी नीलमणि को मेरे घर आने पर प्रतिबंध लगा दिया। कहा, यह ब्राह्मण होते बड़े खतरनाक हैं। इनका टीका लंबा जरूर होता है पर विचार बहुत छोटा। ये जोड़ने की नहीं तोड़ने की बात करते हैं। अगर अल्लाह ने मुस्लिम बना ही दिया तो इसमें मेरा कौन सा पाप। पहले मैं भी तो हिन्दू परिवार से ही थी। मुस्लिम से शादी हो जाने के बाद आज मुस्लिम हूं। अल्लाह न ऐसा करे लेकिन अगर कल को रेहाना का किसी हिन्दू परिवार के साथ संबंध जुड़ जाए तो क्या यही ब्राह्मण परिवार वाले उसे अपने घर नहीं आने देंगे। उसे नकार देंगे। तब तो कहेंगे कि रेहाना की घर वापसी हुई है। पहले इसकी मां हिन्दू थी। अब उसकी बेटी फिर से हिन्दू परिवार से जुड़ गई।
रेहाना ध्यान से अपनी मां की बातंे सुन रही थी। उसने प्रण किया कि कुछ भी हो जाए वह नीलमणि का साथ कभी नहीं छोड़ेगी। अब घर की बजाय स्कूल में वह नीलमणि से मिलती रही। दोनों को जैसे घरवालों की परवाह ही नहीं। आखिर एक दिन इन दोनों के घरवालों को इस बात का पता चल ही गया कि दोनों अब घर की बजाय स्कूल में मिलते-जुलते हैं। रेहाना के घर वालों ने उसे स्कूल जाने से ही रोक दिया। उसके घरवालों का यह फैसला उसके माथे पर लगे कलंक से भी बड़ा था। आज के समय में जहां लोग बेटियों को पढ़ाने की बात करते हैं। वहीं उसे स्कूल से बेदखल कर दिया गया। उधर, नीलमणि के घर वालों ने उसे काशी में संस्कृत की पढ़ाई के लिए आश्रम में भेज दिया। बनारस आने के बाद नीलमणि यहां एक आचार्य की देखरेख में संस्कृत की पढ़ाई करने लगा।
नीलमणि के काशी आ जाने के बाद रेहाना तनहाई में रहने लगी। वह अक्सर उदास सी रहती थी। उसे लगता जैसे अब उसकी जिंदगी खत्म। अभी वह खुले आकाश में उड़ना ही चाह रही थी की उसके पंख कतर दिए गए। उसे नहीं पता था कि इस बेमेल दोस्ती की इतनी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। उसे हर वक्त लगता जैसे नीलमणि यही कहीं है। उसकी आवाज कानों में गूंज रही है। फिर वह परेशान होकर इधर-उधर देखने लगती। जब नीलमणि नहीं दिखता तो उसकी आंखों से आंसू बह उसकी गालों को धपकी देती। मानों उसे कह रही है कि रेहाना अब तुम उसे भूल जाओ। नीलमणि और तुम्हारी दोस्ती इतने ही दिनों के लिए थी। वह अपने दुपट्टा से आंसू पोछकर लंबी सांस खिंचती जैसे इस जमाने से उसे बहुत शिकायतें हों पर सुनने वाला कोई नहीं। इसी बीच उसके मन में कई विचार उमड़ घुमड़ रहे थे। अगर उससे कोई बात भी करता तो लगता कि वह उसे काट खाने को दौड़ रहा है।
रेहाना के मुहल्ले में ही एक गरीब ब्राह्मण परिवार रहता था। ब्राह्मण होते हुए भी मुस्लिम रेहाना के घर उनके परिवार के सदस्यों का आना जाना लगा रहता था। रेहाना खाते-पीते घर से थी। उसके पिता लेखपाल थे। वेतन के अलावा ऊपर से भी कुछ झटक लेते थे। वैसे झटका मुसलमान में हराम है पर झटकने में कोई पाप नहीं। गरीब ब्राह्मण परिवार से तीर्थराज तिवारी पहले पुरोहित का कार्य करता था। जब इससे तंगी दूर नहीं हुई तो पान का दुकान खोल ली। इस दुकान से भी उतनी आमदनी नहीं हो पाती कि उसके परिवार का ठीक से गुजर बसर हो जाए। जब कभी भी किसी चीज की जरूरत होती तो रेहाना के घर से मांग कर काम चलता। रेहाना की मां भी कोमल हृदय की महिला थी। मुहल्ले में किसी के घर कोई परेशानी होती तो वह तुरंत पहुंच जाती। यही रिश्ता तीर्थराज तिवारी के घर से भी था। चावल आटा से सौ- दो सौ रुपये नकदी की भी जरूरत पड़ती थी रेहाना की मां के घर तीर्थराज अपनी पंडिताइन को भेजता। वैसे भी गरीबों की कोई जाति या धर्म नहीं होती, जहां उसकी जरूरतें पूरी हों वहीं उसके लिए काबा और काशी। तीर्थराज तिवारी का साला मुकेश अपने दीदी व जीजा के घर आया -जाया करता था। इस दौरान रेहाना के संपर्क में वह आया। दोनों छुप-छुप कर मिलने लगे। इसमें मुकेश की दीदी भी उसका साथ देती थी। लेकिन उसे भी नहीं पता था कि मुकेश और रेहाना के संबंधों को वह जिस तरह से अपनी मौन स्वीकृति दे रही है उसका अंजाम उसके लिए सिरदर्द हो जाएगा। हुआ भी यही। मुकेश काशी में रहने वाले अपने एक दोस्त से बात करके रेहाना को भगा ले गया।
दूसरे दिन दोनों नीलमणि से मिलने बताये पते पर गए। रेहाना ने नीलमणि से सबकुछ बता दिया। कहा कि कोर्ट में हम लोगों ने शादी भी कर ली है। नीलमणि भी रेहाना के चेहरे की खुशी को बिखरने नहीं देना चाहता था। नीलमणि ने मुकेश और रेहाना को मंदिर में हिन्दू रीति रिवाज से शादी करने की सलाह दी। रेहाना भी तैयार थी। मुकेश ने भी गरदन हिलाकर अपनी हामी भर दी। इसके साथ ही उसने एक सलाह दी। जीवन जीने के लिए सिर्फ किसी धर्म के रिवाज की जरूरत नहीं होती। किसी रिवाज को धारण कर लेने से अस्तित्व का बोध नहीं होता। इसके लिए आश्वक्तिबोध ज्यादा जरूरी है। यह मिलेगा आभास होने में।

काशी के अस्सी घाट पर रेहाना और मुकेश के विवाह की तैयारियां शुरू हुई। कुछ हिन्दू धर्म वालों को पता चला तो वहां अपना बैनर व पोस्टर भी लगवा दिया। रेहाना की धर्म वापसी हो रही है। मुस्लिम होकर हिन्दू लड़के के साथ शादी कर रही है। यहीं से शुरू हो जाता है दोनों की हंसती-खेलती जिंदगी को बर्बाद करने का खेल। जब यह बात मुस्लिम वर्ग के लोगों को पता चली तो इसका विरोध शुरू कर दिया। दोनों के प्यार पर पहरा लग गया। इनकी पहचान वायरल न हो जाय इसके लिए दोनों ने बनारस से कहीं और भागने की योजना बनायी। हिन्दी-मुस्लिम संगठनों ने किराये के मकान की तरह इनकी जिंदगी भी किराये की बना दी। उधर, नीलमणि भी परेशान था। मामला इतना बिगड़ जाएगा इसका उसे जरा सा भी आभास नहीं था। वह मन ही मन सोच रहा था कि शायद मुकेश सच ही कर रहा था कि जीवन जीने के लिए सिर्फ किसी धर्म के रिवाज की जरूरत नहीं होती।

मुकेश और रेहाना किसी दूसरे शहर जाने के लिए घर से निकल लिए। कैंट रेलवे स्टेशन के लिए आटो रिक्शा किया। उधर, पुलिस भी किसी अनहोनी के डर से दोनों के पीछे पड़ी थी। आखिरकार पुलिस ने दोनों को हिरासत में ले लिया। यह बात शहर में आग की तरह फैल गई। धर्म के ठेकेदारों ने शहर में जुलूस निकाला। पत्थरबाजी की। हिन्दू वर्ग के लोग इस शादी को करवाने पर आमादा थे। मुसलिम वर्ग के लोग चाह रहे थे कि यह शादी न हो। भीड़ बेकाबू हो गई। इसी भीड़ में से किसी ने पत्थर मारा और मुकेश के सिर पर जा लगी। वह जख्मी हो वहीं गिर पड़ा ...। जख्म से वह जमीन पर पड़ा कराह रहा था। रेहाना दहाड़े मार रोने लगी। कभी धर्म के ठेकेदारों को कोसती तो कभी खुद को। वह चिल्ला रही थी। डॉक्टर को बुलाओ। कोई इसे अस्पताल ले चलो। हमें नहीं करनी शादी लेकिन मेरे मुकेश को तो बचा लो। रेहाना के अश्कों का उस भीड़ पर कोई असर नहीं था। तभी किसी ने एक और पत्थर मारी मुकेश के सिर पर। मुकेश के मंुह से आह की आवाज निकली। उसने जोर से चिल्लाया। मैं फिर आउंगा। एक और मजहबी दंगे का मुझे इंतजार रहेगा। मुझे कितनी बार मारोगे। एक मुकेश मारोगे कई मुकेश पैदा होंगे। एक रेहाना विधवा हो जाएगी। उसे अपनाने के लिए हजारों नीलमणि आगे आएंगे। मुकेश ने नीलमणि की ओर आशा भरी निगाह से देखा। रेहाना को अपनाने का आश्वासन चाहता था। देखो नीलमणि यह रेहाना तुम्हारी थी। तुम्हारी रहेगी। मैं तो सिर्फ एक माध्यम बनकर आया था। अब जा रहा हूं। अगर तुम इसे अपना लोगे तो समझुंगा रेहाना की अब असली घर वापसी हुई है। नीलमणि भी तैयार हो गया। मुकेश की बेटी को उसने गले लगा लिया। तपती दुपहरी की चादर ढलती शाम के आईने में एक जीवंत सच्चाई को उजागर कर रही थी। एक उड़ता परिंदा सदा के लिए खामोश होना चाह रहा था। इस दुनिया को अलबिदा कहना चाह रहा था। इतने में मुकेश के बदन ढीले पड़ गए। रेहाना और नीलमणि फूट-फूट कर रोने लगे। अब भीड़ भी वहां से छट गई थी।

अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

गौरेया तुम कहां हो

गाय चराने गई मीरा अभी आधा रास्ता ही तय कर पाई थी। उसे कोई ख़ास जल्दी नहीं थी। वह कई दिनों से घर में कैद थी। आज जब वह गाँव के सिवान में निकली तो लगा कि सारा जहाँ उसका अपना था। वह खुद से बार-बार सवाल करती, अभी वह सातवीं में ही तो पढ़ रही थी। बापू ने आखिर उसे स्कूल जाने से क्यों रोक दिया। माँ कहती कि तुम्हारी बुआ तो सिर्फ चौथी तक ही पढ़ी हैं, तुम पढ़कर क्या कलक्टर बनोगी। अब माँ-बापू को कौन समझाए कि भैया तो बीए पास कर लिए। वो कलक्टर तो नहीं बन पाए। भैया को तो बीए करा दिया और मुझे सातवीं भी नहीं। पास के तालाब में गाय पानी पीने के लिए रुक गई। पेड़ों पर गौरेया की चूं-चूं करती आवाज को सुनकर वह आकर्षित हो आगे बढ़ने लगी। दिनभर की उड़ान के बाद घोंसलों की ओर लौटते पक्षी और इन्तजार करते बच्चों बच्चों का शोर ….. मीरा का नन्हां सा दिल ख़ुशी से जोर-जोर से धड़कने लगा। उसका भी मन हुआ उनके इस खेल में शामिल हो जाय। गहरी होती साँझ ने उसने अपना कदम वापस मोड़ लिए। जब मीरा सिवान से गाय लेकर वापस आ रही थी तो उसकी सहेलियां निर्मला, गीता और नीलम स्कूल से किताबों का बस्ता लेकर घर की ओर। मन ही मन वह सोच रही थी इनके बापू कितने अच्छे। मेरी सहेलियां पढ़ लिखकर मास्टर बनेंगी। कोई डाक्टर बनेंगी और मैं गैया चराउंगी। ना ऐसा मैं होने नहीं दूंगी। मीरा ने मन ही मन प्रण कर लिया कि जब तक बापू स्कूल नहीं भेजेंगे वह अन्न का एक दाना ग्रहण नहीं करेगी।…..
घर पहुँचते ही वह अपनी माँ पर बिफर पड़ी। यह लो अपनी गैया व डंडा। हमें चरवाहा नहीं बनना। मीरा की माँ रामकली उसे सीने से लगा पुचकारने लगी, क्या हो गया मेरी दुलारी को। माँ का प्यार पा मीरा गदगद हो गई। उसे लगा जैसे सपनों से भरी मीठी नींद उसे शुभकामनाएं दे रही थी। तभी दादी उसके लिए खाना लेकर आई। मीरा ने थाली को आगे खिसका दिया। बोली-मुझे भूख नहीं। लगता है मेरी लाडली थक गई है। ठीक है चल तुझे आज मैं अपनी हाथों से खिला देती हूँ। मीरा ने अबकी साफ़-साफ़ कह दिया जबतक उसे स्कूल नहीं भेजा जाएगा वह नहीं खाएगी। अचानक! एक महीन सीटी की आवाज उसकी कानों से टकराई। माघ के महीने में उसके भीतर पूस जैसी ठंडी लहर दौड़ गई। यह किसी गौरेया की आवाज नहीं थी। यह उसकी सहेली निर्मला थी। मीरा उसके सामने नहीं पड़ना चाह रही थी। वह ताना मारेगी। पूछेगी मीरा तुम स्कूल क्यों नहीं जा रही हो। अभी वह कहीं भाग पाती कि निर्मला आंगन में दाखिल हो गई। बोली-मीरा कल से मुझे भी तुम्हारे साथ गैया चराने जाना है। काहें क्या हुआ स्कूल नहीं जाओगी? मीरा ने उत्सुकता बस सवाल किये नहीं कि सखी निर्मला का आज से स्कूल जाना बंद। बापू कह रहे थे चिठ्ठी-पत्री लिखना सीख गई। अब स्कूल जाकर क्या करोगी। घर का चौका बर्तन संभालो। एक गाय है उसे सिवान में चराने ले जाया करो। निर्मला की बातों को सुनकर मीरा जैसे शून्य में चली गई। वह कभी अपनी माँ को तो कभी दादी को निहारती। आगे बढ़कर उसने निर्मला का हाथ कसकर पकड़ लिया, फिर उसकी आँखों में आँखे डालकर – हम लड़कियों की जिन्दगी दूसरों के रहमों-करम पर आश्रित है। जब हमारे अवसरों व सपनों को माँ बाप ही मार दे रहे हैं तो आगे किसपर भरोसा करें। आज भी लड़की लड़का में इतना भेद। हे भगवान! अगले जन्म मुझे गौरेया बना देना पर लड़की नहीं। चूं-चूं करने से तो कोई नहीं रोकेगा। आसमान में जी भर के उड़ तो सकूंगी। बगैर बाल हठ किये उसे भरोसा हो गया था कि वह कभी स्कूल नहीं जा पाएगी।
दूसरे दिन चिड़ियों की चहचाहाहट बढ़ती जा रही थी। सूरज अपनी पूरी चमक के साथ सर पर चढ़ आया। मीरा घर के आंगन में बैठकर चिड़ियों को गौर से देख रही थी। इधर से उधर फुदकतीं नन्हीं सी पैरों के बल चीं-चीं की आवाज सुनने की बाद और कुछ देखने और सुनने की हसरत नहीं थी। मगर बगीचे में गौरेया के परिवार को वह कैसे भूल सकती। मीरा की पहली संवेदना तो वहीं से जगी थी। अब निर्मला भी आ चुकी थी। दोनों अपनी-अपनी गैया लेकर सिवान की और निकल गई। बगीचे में गिरे सूखे पत्ते को अपनी पैरों से दबाते हुए दोनों आगे बढ़ रही थीं। दोनों के हाथ में गाय की रस्सियाँ थीं और पीछे-पीछे गाय। गौरेया के घोसले वाले पेड़ के पास आकर मीरा के कदम ठिठक गये। उसने एक पेड़ के जमीन के ऊपर निकले एक सोर से गाय को बाँध दिया। आज चूं-चूं की आवाज उसे सुनाई नहीं दे रही थी। उधर से एक आदमी बागीचे से होकर गुजर रहा था। मीरा को घबड़ाया हुआ देखकर पूछ लिया। बेटी- तुम क्या ढूंढ रही हो। मीरा बोली-चाचा इस पेड़ पर गौरेया का घोसला है। रोज उनकी चहचहाहट से बगीचा गुलजार रहता था। आज उनकी आवाज नहीं सुनाई दे रही। बेटी तुम भी तो गौरेया ही हो। तुम्हारी भी आवाज किसी गौरेया से कम मीठी नहीं। हाँ अंकल, आप सही कह रहे हो, मैं गौरेया ही हूँ पर उड़ नहीं सकती। मैं उड़ना सीखूं उससे पहले ही मेरे पर कतर दिए गए। अब मैं सिर्फ चल सकती हूँ। आकाश नहीं नाप सकती।
आखिर गौरेया नहीं मिली। उसकी आवाज भी नहीं सुनाई दी। निर्मला बोली-मीरा हमें तो लगता है कि तुम पिछले जन्म में इन्हीं घोसले में रहती थी। तभी तो इनके लिए तुम्हारे भीतर इतनी छटपटाहट है। निर्मला तुम भूल रही हो। हम सभी लड़कियां गौरेया ही तो हैं। अगर महसूस करो तो। जब घर के आँगन में महिलायें पथार डालेंगी तभी ये दाना चूंग सकती हैं। यही हाल हमारा है। घर में रखा चीज कुछ खाने जाओ तो माँ कहेगी यह भैया के लिए रखा है। जब हाथ पर मिले तभी खा सकती हैं। …. आखिर इसे क्या कहेंगे। पथार ही तो है हम बेटियों के हिस्से।
धीरे-धीरे शाम होने को थी। दोनों सहेलियां गायों को लेकर घर आ गयीं। थका होने के बाद भी मीरा को नींद नहीं आ रही थी। और मुझे (अजय) को भी नहीं। इस कहानी को आज ही पूरी करने की जिद जो थी। गौरेया तुम कहाँ हो … कहानी की नायिका और लेखक साथ-जग रहे थे। मीरा को गौरेया की चिंता थी तो मुझे कहानी पूरी करने की। गौरेया मीरा की रोम-रोम में बस गई थी। जब भोर हुई तो मीरा दरवाजा की कुण्डी धीरे से खोली और बाहर निकल गई। सड़क, खेत पार कर कच्चे रास्ते पर सन्नाटे को चीर कर बीच-बीच में गौरेया की आवाज को थामे। ( काश! की क्षणिक और उदास जीवन में उठी ये पहली लहर सब कुछ बहा ले जाती। बागीचे की इस सूनेपन में एक ह्रदय, दूसरे ह्रदय की आहटें सुन और समझ पाता…)
चांदनी अभी भी कहीं-कहीं छितराई हुई थी। पेड़ भी नींद में थे और और पगली मीरा नंगे पैर, नसों में दौड़ते हुए गर्म-खून और दिल की कंपकंपाहट को काबू में कर पेड़ की टहनियों को पकड़े चिड़ियों की तरह ऊपर और ऊपर चढ़ती चली जा रही थी। शायद वह गौरेया के घोसले को ढूंढ रही थी। ओस में नहाई गहरी हरी पत्तियां और अलसाई टहनियां। एक चिड़िया बेवक्त मेहमान की आहट सुन फड़फाड़ाने लगी। गिलहरी सरपट नीचे दौड़ गई। कोयल सहेली को पहचानकर दूसरी टहनी पर सरक गई। मीरा के लिए सब कुछ पहचाना हुआ था। इस टहनी पर से उसने कई बार छलांग लगाई थी। उसे पता था कि यह टहनी ऊपर की शाखाओं से जाकर मिलती है। कुछ ही देर में वह गौरेया के घोसला के पास पहुँचने वाली थी।
असली कहानी अब शुरू होती है। धीमे और सधे क़दमों से आखिर वह मंजिल तक पहुँच ही गई। लेकिन यह क्या उस घोसले में तो गौरेया थी ही नहीं। घोसले में गौरेया की निशानी सिर्फ उसके पंख थे। आखिर ये कहाँ गई। मीरा घोसले में हाथ डालना चाही कि अन्दर कुंडली मार बैठा सांप ने लपक कर उसे डंस लिया। अब मीरा समझ चुकी थी कि गौरेया को खा लिया होगा। वह दर्द के मारे चीख रही थी। उसके हाथ ठीले पड़ रहे थे। कुछ ही देर बाद टहनी उसके हाथ से छुट गई। वह धरती की गोंद में जा गिरी। सांप का विष धीरे-धीरे उसके शरीर में फ़ैल रहा था। वह बेहोश हो गई। अब उसका शरीर नीला पड़ने लगा था।
अब सुबह हो चुकी थी। मीरा को घर में न देखकर उसकी मां किसी अनहोनी से घबड़ा गई। काफी खोजबीन के बाद भी उसका पता नहीं चला। निर्मला भी आ चुकी थी। घर के लोग भागे-भागे सिवान की ओर गये। साथ में निर्मला भी थी। बगीचे में पेड़ के पास उसे पड़ा देख सभी चीख पड़े। उसके शरीर में कोई कंपन भी नहीं थी। वह समाधि में लीन किसी योगी की तरह लेटी हुई थी। उसका नब्ज भी स्थिर हो गया था। उसे स्कूल जाने की जिद नहीं थी। अब उसे अपने बापू से भी कोई शिकायत नहीं थी। निर्मला उसके शरीर को झकझोर कर सवाल कर रही थी, गौरेया तुम कुछ बोल क्यों नहीं रही। तुम अपने निर्मला को अकेली छोड़कर क्यों चली गई। आखिर मैं गैया चराने किसके साथ जाउंगी। पर जो सवाल मीरा छोड़कर इस दुनिया से विदा हो गई उसका जवाब किसी के पास नहीं था। लोगों का शोरगुल सुनकर सांप घोसले से जैसे भगा। घोसला मीरा के बदन पर आ गिरा। लोगों ने देखा उसमें भी गौरेया नहीं थी।
अजय पाण्डेय, सुहवल
गाजीपुर

थपकी

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किसी भी तस्वीर को देखकर लोग अलग-अलग तरह से विचार व्यक्त करते है। हर विचार व्यक्तिगत होता है। अगर किसी को पसंद आ जाए तो अपना लेता है। हर किसी का सपना होता है कि उसकी जिन्दगी सूरज की तरह हो। दुःख हो या सुख एकरूपता बना रहे। मेरे साथ उल्टा है। मेरे लिए तो जिन्दगी ही सबसे बड़ा सपना है। सबसे बड़ा प्रेरणाश्रोत है। इसके सामने रात में आने वाले सपने भी बहुत छोटे हैं.... अधूरे हैं....।
महज तीन साल की उम्र में थपकी की माँ नहीं रही। अब उसका देखभाल कौन करता। बाप भी शराबी। थपकी की मौसी रंजना उसे अपने साथ जबलपुर लेते गई। उसका लालन-पालन अब रंजना ही कर रही थी। धीरे-धीरे थपकी बड़ी होने लगी। वह रंजना को ही अपनी माँ समझती। रंजना कहती कि मैं तो तेरी मौसी हूँ। तब मेरी माँ कहाँ है- बता न मौसी। 
तुम्हारी माँ आसमान में है। चाँद-तारों के साथ। 
वह वहां क्या कर रही है। मेरे साथ क्यों नहीं है। 
वह वहीं से तुझे देख रही है। तेरा देखभाल करने के लिए मेरे पास छोड़ गई है। 
पर उस माँ को मैं तो नहीं देख सकती न। वह मेरे पास कब आएगी। मेरी माँ को जल्दी बुलाओ न मौसी। उससे कह देना कि अगर वह नहीं आई तो मैं खुद उसके पास जाउंगी। थपकी के इस तरह के सवालों से रंजना घबडा जाती। उसे समझाने का प्रयास करती। रंजना की बातों से संतुष्ट हो थपकी फिर अपने कामों में लग जाती।
रंजना काफी धार्मिक महिला थी। पूजा-पाठ किये बगैर अन्न का एक दाना भी मुंह में नहीं डालती। एक दिन घर के आंगन में वह सूर्य देव को जल दे रही थी। थपकी भी वहीं पास कड़ी था। रंजना को जल गिराते देख थपकी भी सूर्य देव की और मुंह कर जल गिराने लगी। थपकी की चंचलता देख रंजना का भी बाल मन उमड़ने घुमड़ने लगता। 
रंजना ने थपकी से पूछा की सूर्य देव से तुमने क्या माँगा है। यही सवाल थपकी ने रंजना से किया। रंजना ने तपाक से कहा-तुम्हारी और तुम्हारी माँ की सलामती। अबोध थपकी में मन में यह बात अन्दर तक समा गई। अब वह प्रतिदिन सूर्य देव को जल देने लगी। सूरज को प्रणाम करते हुए कहती मेरी माँ आकाश में चाँद तारों के पास है। उसे सलामत से रखना। मेरी माँ से कहना थपकी तुम्हे बहुत याद करती है। उसे मेरे पास कब भेजेंगे। माँ तुम बहुत याद आती हो। अब तो थपकी को पूर्ण विश्वास हो चूका था कि सूर्य देव एक दिन उसकी माँ से जरुर मिलवा देंगे। 
धीरे-धीरे थपकी बड़ी होती गई। इसके साथ ही समझदारी भी आने लगी। 16 वसंत देख चुकी थपकी आत्म विश्वास से भरी थी। थपकी की माँ नहीं आई पर उसने सूर्य को जल देना नहीं छोड़ा। 
थपकी को बड़ा होता देख उसकी मौसी रंजना भी शादी को लेकर परेशान रहती। समय से कोई अच्छा लड़का मिल जाय बस झट से हाथ पीले कर दूँ। वह मन ही मन सोच रही थी। जब रंजना दसवीं में थी तभी शादी हो गई थी। इसके बाद वह बनारस से जबलपुर आ गई। थपकी तो 12वीं में पढ़ रही है। रंजना ने अपने अध्यापक पति अनिल से थपकी के लिए लड़का ढूंढने के लिए बोली। अनिल इसके लिए तैयार नहीं था। वह चाहता था कि थपकी आगे की पढ़ाई जारी रखे। जब उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद पैरों पर खड़ी हो जायेगी तब शादी करना ठीक रहेगा।
रंजना की जिद के आगे अनिल को झुकना पडा। क्या सच में लड़कियां बोझ होती है? क्या लडकियों को पढने का कोई अधिकार नहीं? अगर थपकी की माँ होती तो क्या उसे पढ़ाई पूरी करने नहीं देती?तमाम तरह के सवाल अनिल के मन में उमड़-घुमड़ रहा था। आखिर उसका बाप तो है। इतने दिन हो गये। अबतक थपकी की खोज खबर भी लेने नहीं आया...और हाँ थपकी भी उसे कभी याद नहीं करती। याद करती भी कैसे रंजना ने उसे सब बताया था कि उसके बापू उसकी माँ को जरा सी बातों पर कैसे पिटाई करते थे। उसकी माँ ने बहुत जुल्म सहे। हे भगवान! किसी महिला को यैसा बेरहम पति मत देना। 
थपकी को जब पता चला कि उसकी शादी के लिए लड़का देखा जा रहा है तो वह परेशान हो गई। वह रंजना के कमरे में गई। अनिल भी वहीँ बैठा हुआ था। 
थपकी तपाक से बोली-मौसी क्या मैं तुम्हारी बेटी नहीं हूँ इसलिए मुझे जल्दी से विदा कर देना चाहती हो। क्या मेरी माँ के आने का इन्तजार नहीं करोगी। क्या तुम नहीं चाहती कि मेरी माँ इस आंगन से मुझे ख़ुशी-ख़ुशी विदा करे। थपकी ने रंजना के सामने सवालों की झड़ी लगा थी। उसकी इन बातों पर रंजना को जैसे काठ मार गया। थपकी की तरफ देखी तो बस देखती रह गयी। इन सवालों का उत्तर न पाकर थपकी की आँखों में आंसूं आ गये। थपकी को रोता देख रंजना और अनिल की आँखे भी नम हो गई। रंजना ने दौड़कर थपकी को गले से लगा लिया। उसे समझाने का प्रयास करती। हम औरतों की किस्मत ही यैसी है। अपना कोई घर नहीं। बचपन में माँ और बापू का घर। जब थोड़ी समझदारी आई तो पति का घर... और बुढापे में .. अब बस भी कर मौसी। तपाक से थपकी बोल उठी। मुझे ज्ञान की बातें न बता। अगर मैं तेरे लिए बोझ हो गई तो जल्दी से कर दे मेरी शादी।
मौसी मुझे अब पता चला कि लड़कियां पराई होतीं हैं। मैं कितना मूर्ख कि 21वीं सदी में जी रही हूँ।। मैं सचमुच घर से निकालने योग्य हो गयी हूँ। मुझे पढ़ा-लिखाकर क्या करोगी। अब कर दो मुझे दूसरे के हवाले।। मुझे अब यह भी पता है कि मेरी माँ नहीं है। अगर रहती भी तो क्या करती। वही करती जो आज तुम कर रही हो। 
किसी मृत अपनों से अटूट भावनात्मक संबंधों को जीने के भाव पर भी थपकी प्रहार करती है। उसका विवेक रंजना के तर्कसंगत को पूरी तरह नकार नहीं पाता। 
अनिल थपकी को समझाते हुए कहता है-तुम एक लड़की होने से पहले मनुष्य हो। मनुष्य न तो सिर्फ पुरुष है और न सिर्फ स्त्री ही... दोनों मिलकर एक होते हैं। 
लेकिन मैं अबतक माँ के सहारे ज़िंदा थी। बचपन में जैसा की मौसी ने बताया था कि मेरी माँ आकाश में चाँद-तारों के साथ है। बड़ी हुई तो यह एहसास हुआ कि कोई मनुष्य चाँद-तारों पर कैसे रह सकता है। माँ शब्द से मेरा भावनात्मक लगाव हो गया। अब वह माँ मेरे ह्रदय में, मेरी साँसों में भावनातमक रूप से रहने लगी। मौसी ने भी माँ का प्यार दिया....पर ज़िंदा रही आशा के सहारे। वह आशा भी मुझे मौसी ने ही दी। माँ के आने की आशा। 
असमय अगर बादलों की ओट में सूर्य अस्त हुआ सा लगे तो क्या अन्धकार ही सत्य हो जाएगा? अगर प्रभात में, आकाश में अरुण प्रकाश छा जाए तो क्या आँखों को बंद कर हम कह सकेंगे कि अब भी अन्धकार है? मैं तो प्रभात पर ही विश्वास कर अबतक रातें बिताते आई हूँ। 
अब अपने जीवन का फैसला मौसी और मौसा पर छोडती हूँ।
आखिर वह दिन आ ही गया। जिसका रंजना को इन्तजार रहा। थपकी के लिए लड़का मिल गया। सुन्दर, सुशील के साथ प्राइवेट नौकरी वाला। वेतन इतना कि एक परिवार का गुजर-बसर आराम से हो जाय। दान-दहेज़ की कोई माग भी नहीं। बस क्या था। रंजना यह मौक़ा खोना नहीं चाहती थी। बस चट मंगनी पट विवाह। दोनों तरफ विवाह की तैयारियां होने लगी। घर में मंगल गीत की गूंज थी। इधर थपकी के आँखों के आंसूं रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था। विवाह के हर रश्म पर उसे माँ की याद आती। मुंह से गर्म सांस भरते हुए.... बापू को माँ से झगड़ा था। आखिर मैं उनकी ही तो बेटी हूँ। मुझे उन्होंने क्यों भुला दिया। माँ तो इस दुनियां में नहीं है। बापू रहते हुए भी नहीं हैं। आज मैं अनाथ और दुनियां की सबसे अभागिन लड़की। आखिर जब दूसरों के हालत पर ही छोड़ना था तो पैदा क्यों किया? 
31 मई को शादी का दिन था। मई के अंतिम दिन साल के सबसे लम्बे दिन होते हैं। बैंड बाजों के साथ बरात आ गई। पहले मंत्रोचार के बीच द्वारपूजा फिर शादी की रश्म पूरी हुई। सुबह जब विदाई का समय हुआ तो लड़का एक शर्त रख दी। पहले वह थपकी से मिलेगा फिर विदाई होगी। थपकी के मौसा-मौसी परेशान हो गये। आखिर बात क्या है। अगर पहले से कोई शर्त थी तो शादी के पहले लड़के (मनीष) ने बताया क्यों नहीं?
थपकी को मनीष उसके जीवन का सबसे बड़ा उपहार देना चाहता था। वह चाहता था कि जब उसकी थपकी यहाँ से विदा हो तो उसे लगे कि वह ससुराल नहीं बल्कि अपने घर जा रही है। 
वह थपकी से मिलने उसके कमरे में गया। वह लाल जोड़े में सिर झुकाए बैठी थी। मनीष के साथ रंजना और अनिल भी था। उसके पीछे मनीष के माता-पिता। 
मनीष अपनी माँ का हाथ पकड कर थपकी के पास ले आया। थपकी खड़ी हो गयी। मनीष ने अपनी माँ की तरफ इशारा करते हुए कहा- थपकी यही तुम्हारी माँ है। समझो तुम्हारी माँ चाँद तारों को छोड़कर तुम्हारे पास आ गई। सूर्य देव ने तम्हारी सुन ली। इसलिए तो तुम्हारी माँ को वापस तुम्हारे पास भेज दिया। इस आंगन से तुम्हारी माँ तुम्हे विदा करेगी। यह माँ अब सदा तुम्हारे साथ रहेगी। थपकी का हाँथ पकड कर अपने बापू के हाँथ में देते हुए मनीष ने कहा... और ये हैं तुम्हारे बापू।
फिर क्या था, थपकी अपनी माँ से लिपट कर रोने लगी। माँ तुम मुझे छोड़कर क्यों चली गई थी? मैंने 16 साल बिना माँ के कैसे बिताये तुम्हे क्या पता। थपकी की माँ भी रो रही थी। बेटी थपकी अब मैं कभी तुम्हे अपनों से दूर नहीं होने दूंगी। एक माँ और बेटी का बिरह मिलन देख वहां मौजूद सभी की आँखे भर आई।
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

Friday, 10 June 2016

उड़ता गाजीपुर

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मेरे शुभ चिन्तक व बड़े भाई जैसा सुधीर कुमार जी के साथ आज रात करीब 12.30 बजे बनारस कैंट पर चाय पी रहा था। सुधीर जी बनारस हिन्दुस्तान टाइम्स के ब्यूरो चीफ हैं। वे मुझे अपने साथ बरेली घुमाने को कह रहे थे। मैंने धीरे से मुस्कुराकर हाँ में जवाब दे दिया। अब उन्हें कैसे बताऊँ कि मैं बनारस में रहता ही नहीं बनारस में जीता हूँ। एक तरह से समाहित हो चुका हूँ। जो समाहित है उसे कहीं ले जाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। पाठकगण मैंने यहाँ यह बातें क्यों लिखी आप भले न समझें पर मेरे अग्रज सुधीर जी समझ गये होंगे।
बचपन में एक खेल हम लोग खेला करते थे। इस खेल के लिए न बैट बाल की जरूरत थी न ही फ़ुटबाल की। स्टेडियम और ग्राउंड की भी जरूरत नहीं। बस चार मित्रों के साथ जहाँ बैठ गये वहीं खेल शुरू। चिड़िया उड़.... तोता उड़.... मैना उड़.... भैंस उड़.... भैंस जैसे ही उड़ाया की फंस गये। सजा के तौर पर सभी मित्रों के हाथों मार खानी पड़ती। आज उल्टा है। चाहे जितनी भैंस उड़ा लो कोई सजा नहीं। हाँ रामपुर की भैंस मत उड़ाना। भैंस तो क्या मुर्गी भी नहीं। अनुराग कश्यप ने तो पूरा पंजाब ही उड़ा दिया। सेंसर बोर्ड समझा रहा है कि भाई पंजाब के पंख नहीं है कि उड़ेगा। अब पूरा बालीबुड एकजुट। पंजाब उड़ेगा। वह भी तय समय 17 जून को। इस उड़ने उड़ाने के खेल में दिल्ली के मुख्यमंत्री भी कूद पड़े हैं। पंजाब के पास नशे का पंख है। पंजाब नशे में उड़ रहा है। यह मैं नहीं अनुराग कश्यप कह रहे हैं।
उड़ता पंजाब के बाद अनुराग कश्यप को उड़ता दादरी, उड़ता मुजफ्फरनगर और उड़ता मथुरा का जवाहर बाग़ पर भी एक फिल्म बनाना चाहिए। अगर गलती से किसी ने मेरी सलाह मानकर यह फिल्म बना भी डाली तो क्या केजरीवाल उसे रिलीज कराने के लिए उतना ही समर्थन करेंगे जितना कि उड़ता पंजाब के लिए हाथ पाँव मार रहे हैं।
60 के दशक का एक गीत- चल उड़ जा रे पंक्षी की अब ये देश हुआ वीराना.. यह देश वीरान हो चुका है इमानदारी से... यह देश वीरान हो चुका है वफादारों से... यह देश वीरान वीरों से। कोई कांग्रेस मुक्त भारत की बात कर रहा है तो कोई आरएसएस और भाजपा मुक्त भारत की बात कर रहा। भ्रष्टाचार मुक्त और गरीबी मुक्त भारत की बात करने वाला कोई नहीं। क्या फिल्म बनाने के लिए यह एक विषय नहीं हो सकता। यह सीधा और सपाट सा विषय है। बालीबुड को विवादित विषय चाहिए। अगर इसी तरह का विषय चाहिए तो यूपी के गाजीपुर में अनुराग कश्यप जैसे लोगों का स्वागत है। गाजीपुर उड़ रहा। सत्ता के नशें में उड़ रहा है। झूठ के पंखों से उड़ रहा है। इसे उड़ा रहे हैं यहाँ के जनप्रतिनिधि। इसे उड़ा रहें हैं कुछ तथाकथित समाजसेवी।
पंजाब से ज्यादा तबाह है गाजीपुर। यहाँ के कितने युवाओं को नौकरी मिली? कितनी सड़कें चमचमा रही है? किसका विकास हुआ? कितना विकास हुआ? अब यहाँ पंजाब और गाजीपुर के दो विपरीत सिरों को यहाँ जोड़ने की सिर्फ कोशिश भर नहीं है। यह एक प्रश्न है उनसे जिसने यूपी के साथ गाजीपुर का चमका दिया? यह प्रश्न है उनसे जो रोज नारे गढ़ रहे हैं। वादे हुए पूरे...। जब भयावह, कांटेदार, बदसूरत काला पंजा यहाँ के युवाओं के कैरियर को बर्बाद करता चला जा रहा है। टूटी-फूटी सड़कें खूनी हो चुकी है। फिर भी कोई आहट नहीं है... सन्नाटा नहीं टूट रहा। इस सन्नाटे को तोड़ने के लिए उड़ता गाजीपुर को कोई पर्दे पर लाएगा? कोई कहेगा यह लेख असीम उलझाव से एक धारदार मुठभेड़ है, पर इस मुठभेड़ की पहचान के लिए हम एक दूसरे क्षेत्र में जाना चाहेंगे। अश्वेत लेखिका टोनी मारियन ने अपने उपन्यास "बिलवेड" में लिखा है कि जहाँ शिक्षा का अभाव है... जहाँ के लोग जागरूक नहीं हैं सिर्फ नारों से प्रभावित होकर वहां की जनता सरकारें बना देती है... और राजनितिक पार्टियाँ सत्ता में आने के बाद खुद को मजबूत करती है। जनता के हिस्से टूटी-फूटी सड़कें और बेरोजगारी भत्ता। यहाँ रोजगार के लिए नहीं भत्ता के लिए सरकारें बनती है। यहाँ कोई अनुराग कश्यप भी नहीं आयेंगे। दिल्ली, बिहार, यूपी और गाजीपुर को न उड़ाने के लिए उन्हें भत्ता मिलता है... और पंजाब को उड़ाने के लिए भत्ता मिलता है।
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

रेहन हो गई जिन्दगी

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नंदू की जिन्दगी खुबसुरत थी, लेकिन लिखने वाले ने उसके भाग्य में बहुत दुश्वारियां लिख दी थी। भूखे पेट को भरने से लेकर ठण्ड में कांपते बदन को ढकने के लिए उसे जद्दोजहद करनी पड़ती। ' भगवान् जाने क्या होगा हमारा। हमारा भाग्य कभी भी इन दुश्वारियों से उबरने नहीं देगा। नंदू अक्सर उखड़ जाता।
' बडबडाने से परेशानियां कम नहीं होती', पत्नी उसे समझाती। हालांकि पति से ज्यादा ख्याल उसे पड़ोसियों का होता था, उसे मालूम था की उनके कान इधर लगे होंगे। वह नहीं चाहती थी कि उसके घर की हालत किसी को पता चले। वह अपने पति नंदू की ही तरह स्वाभिमानी थी। नंदू के विचारों के साथ खुद को ढाल ली थी। यही कारण था कि दोनों एक दूसरे को बहुत चाहते थे। लाख परेशानियों के बाद भी जिन्दगी खूबसूरत थी। गरीबी आखिर कैसे दूर होती। न रोजी-न रोजगार। वह खेतों में हाड़तोड़ मेहनत करता। कभी बाढ़ तो कभी सूखा से फसलें बर्बाद हो जाती। इस तरह कि परेशानियां देख नंदू की वीबी मीरा ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, कहो तो तुम्हारी नौकरी के लिए अपने भाई से बात करें। मुंबई में वह रोजी रोजगार करता है कहीं जरुर व्यवस्था करा देगा। मैं भी तुम्हारे साथ वहीं चल चलूंगी। अपने बूढ़े हो चले माँ-बाप की भी चिंता थी। उन दोनों के चले जाने के बाद उन्हें कौन देखेगा। मीरा ने झुझलाते हुए कहा-तो क्या यैसे कब तक जिन्दगी कटेगी। यहीं से मीरा और नंदू के बीच एक नई बहस और झगड़े की शुरुआत हुई।
बूढ़े हो चुके माँ-बाप का सेवा ही नंदू लिए दुनिया का सबसे बड़ा सुख था। अब तो मीरा की झगड़े की आवाजें नंदू के कानों से टकराकर वैसे ही वापस हो जाती जैसे खाली मकान से दस्तक वापस हो जाती है। दोनों के बीच अक्सर झगड़ों के बाद दो-तीन दिन तक घर में तनाव का माहौल रहता था।
आज मीरा बहुत खुश थी। उसे इतना खुश देख नंदू भी परेशान हो गया। परेशान हो भी क्यों नहीं। जो हमेशा पतझड़ के सामान उदास रहती हो उसके चेहरे पर अचानक इतना फगुनहट का आखिर राज क्या है? नंदू दुआरे में अपने बाबूजी के पैरों का मालिश कर रहा था। तभी मीरा तेज आवाज में, अजी सुनते हो।
हाँ बताओ क्या हुआ?
देखो न भईया की मुम्बई से चिठ्ठी आई है। वो अगले रविवार को भाभी और बच्चों के साथ कुछ दिन के लिए घुमने आ रहे हैं...।चिठ्ठी के अंत में भैया ने लिखा है कि ज्यादा ' परेशान' होने की जरूरत नहीं। हम बस कुछ ही दिन के लिए आ रहे हैं। इस हिस्से को मीरा ने कई बार पढ़ा। नंदू की आँखें भर आई। मीरा ने मुंह बिचकाकर कहा, देखो नंदू रोओ मत। मेरे भाई के आने से तुम इतना दुखी हो तो चिठ्ठी लिखकर मना कर देती हूँ। कह देती हूँ की तुम्हारा सेवा सत्कार करने की औकात हमारे में नहीं है।
मीरा की बातें सुन नंदू उखड़ पड़ा। आखिर तुम मेरी खुशियों की शोभायात्रा रोज-रोज क्यों निकालना चाहती हो। मैं किसी मेहमानबाजी से घबराने वाला नहीं, पर तुम्हारे और तुम्हारे भाई की नियत में जो खोट है उससे जरुर आहत हूँ।
बहुत खूब... मेरा भाई इतने समय बाद हमसे मिलने आ रहा है और मैं एक समय उसे अच्छा खाना भी नहीं खिला सकती? तुम शायद जानते नहीं उसकी वीबी को। वो सारे खानदान में गाती फिरेगी कि हम कितने कंगाल हैं। मीरा बच्चों की तरह खुश होते हुए रविवार के बारे में सोचने लगी। भाई के सेवा भगत के लिए पैसा आखिर कहाँ से आये। किससे मांगा जाय। अगर किसी ने कर्ज दे भी दिया तो इतना सूद हो जाएगा कि भरना मुश्किल होगा। मीरा के मन में एक उपाय सुझा। गाय बेचने का फैसला उसने नंदू को सूना दिया। मीरा का यह फैसला नंदू को मंजूर नहीं था। कारण बूढ़े माँ-बाप को दूध की जरूरत थी जिसे गाय ही पूरा करती थी। अब इसे भी बेच देंगे तो.... नहीं-नहीं हम यैसा नही होने देंगे। गाय नहीं बिकेगी।
अब गाय झगड़े की जड़ बन गई। इसे लेकर दोनों के बीच तकरार शुरू हो गई। घर का माहौल आशान्त हो गया। जब यह बात नंदू के पिता अजित को पता चली तो उसने भी बहु के निर्णय पर मुहर लगा दिया। अजित ने नंदू से कहा, बेटा हमें दूध मिले या न मिले पर घर में आया मेहमान ईश्वर होता है। उसकी सेवा भगत में कमी नहीं होनी चाहिए। आज गाय बिक जायेगी तो कल हालात अच्छे होने पर हम फिर से खरीद लेंगे।
अपने ससुर अजित की बातें सुनकर मीरा के चेहरे पर और फगुनाहट फ़ैल गई। नंदू तो समझ गया था कि घर में करकर न हो इसलिए पिताजी मीरा की बातों का समर्थन कर रहे हैं।
आखिर दुखी मन से गाय को बेचनी पड़ी। थुलथुल और कमजोर हो चुके अजित के शरीर के लिए अब गाय का दूध भी नहीं था।
रविवार को मुम्बई से मीरा के भईया और भाभी आ गये। वह उनकी सेवा में लग गई। रोज छेना की सब्जी, खोये का हलवा और पनीर का पकोड़ा बनता। सभी छककर खाते, पर नंदू को कुछ नहीं सुहाता। उसे पता था कि आखिर यह सब कितने दिन चलने वाला। फिर तो बाद में वही सुखी रोटी, चटनी और अरवा चावल का भात। रोज शाम को संदूक वाले बक्से से कडकडा नोट निकालर मीरा नंदू को देती और वह झोला लेकर साइकिल से बाजार जाकर फरमाइश का सामान लाता। अब संदूक में भी कुछ ही पैसे बचे थे। मीरा के भाई ने मुम्बई चलने की इजाजत मांगी। मीरा और नंदू ने इजाजत दे दी। कारण पैसे भी लगभाग ख़त्म हो चुके थे। उनके चले जाने के बाद नंदू मीरा से पैसे का हिसाब मांगने लगा। कुल तीन हजार रूपये बचे थे, पर मीरा देने के लिए तैयार नहीं थी। मीरा ने नंदू से कहा, देखो जी हमारे शादी को 7 साल हो गये। इन 7 साल में सिंदूर दान के समय जो तुमने 7 बचन लिया था। एक का भी पालन नहीं किया। अब जो पैसे बच गए हैं उसका पायल और बिछुआ मेरे लिए बनवा दो।
नंदू फिर उखड़ गया। तुमने भी तो साथ बचन लिया था। मेरी गाय बिक गई। क्या यह भी तुम्हारे बचन में शामिल था? बस इतनी सी बात पर मीरा ने 3 हजार रूपये नंदू के हाथ पर पटक दिया। इसके बाद वह अपने कमरे में जाकर जोर-जोर से रोने लगी। खुद के जीवन से थका हारा नंदू भी इन हालातों से समझौता कर लिया था। मीरा को मनाकर उसी दिन उसे साइकिल पर बैठाकर बाजार ले गया। आखिर पायल और बिछुआ लेकर मीरा घर आ गई।
एक दिन नंदू के पिता अजित और माँ गुलाबो की हालत साथ-साथ बिगड़ गई। डाक्टर ने बताया अब इनका अंतिम समय है। जितना हो सके सेवा कर लो। नंदू खुद को कोस रहा था... जिस माँ ने मुझे खुद का दूध पिलाकर बचपन में ज़िंदा रखा। जब बड़ा हुआ तो पिताजी ने मेरे लिए गाय खरीदी और आज जब दोनों कमजोर हो गये। इस दुनिया से चलने का समय आ गया तो उन्हें गाय का दूध नसीब नहीं। आखिर मैं कैसा उनका बेटा? थोड़ा सा जब मैं बीमार पड़ जाता माँ घबड़ा जाती थी। एक बार तो जब उनके पास पैसे नहीं थे तो अपना पायल बेचकर मेरा इलाज कराया था। आज जब वह बीमार हैं तो मैं पैसे के अभाव में किसी अच्छे डाक्टर को भी नहीं दिखा पा रहा हूँ। अगर एक बेटा होने का भी फर्ज नहीं निभा पाया तो खुद को कैसे माफ़ कर पाउँगा। उसने अपने खेत को रेहन पर रखना चाहा, पर उसर भूमि होने के कारण किसी ने लेने से इनकार कर दिया। गाँव के ही एक धनासेठ ने नंदू को 50 हजार रुपये देने के लिए तैयार हो गया लेकिन कुछ शर्तों पर। शर्त यह था कि वह नन्दू को ही रेहन पर लेना चाहता था। नंदू भी तैयार हो गया। उसके पास दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं था।
नंदू धनासेठ से 50 हजार रूपये लेकर शाम के पहर घर आया। सोचा सुबह ही हाट जाकर एक गाय खरीदेगा। बाकी जो पैसे बच जायेंगे उससे माँ और पिताजी का इलाज कराएगा। ख़ुशी के मारे उसे नीद नहीं आ रही थी। उधर बीमार अजित व उसकी पत्नी गुलाबो को दर्द व घबडाहट से नींद गायब थी। नंदू अपने माता-पिता के पास ही सोया था। नंदू को आधी रात के बाद भी जगा देखकर उसका पिता अजित और परेशान हो गया। उसे लगा शायद नंदू किसी परेशानी में है। परेशानी का कारण पूछने पर भी नंदू बात को इधर-उधर घुमाने लगता। अपने लाडले नंदू की हालत देख अजित की तबियत और बिगड़ने लगी। नंदू दौड़कर गाँव के डाक्टर को बुला लाया। जुबान बंद ही चुकी थी। जोर-जोर से खर्राटे ले रहा था। उल्टी गिनती की तरह उल्टी सांस चलने लगी। यह पल देख नहीं लग रहा था कि कठिनाइयों में भी सिना भुलाए खड़ा रहने वाला जीवन का योद्धा इस तरह जीवन का अंतिम लड़ाई हार रहा है। नंदू रोने लगा। बाबूजी! आप चिंता न करें। आप ठीक हो जायेंगे। उसे क्या पता था की हर आश्वासन को स्वीकार लेने वाले उसके बाबूजी इस बार अनसुना कर देंगे। कम्बल ज़रा सा हिला। कमजोर सी हथेलियाँ जोर-जोर से नाक को रगड़ रही थी। थोड़ी देर बाद फिर से कम्बल में हरकत हुई। नंदू को भरोसा नहीं हुआ... उसके पिता अजित रो रहे थे। पलकों पर बहते आंसू गालों पर निशान बनाते हुए गर्दन की तरफ लुढ़क रहे थे। वह सचमुच रो रहा था अपनी खाली आँखों से पर क्यों?? क्या वह इसलिए रो रहा था कि मेरा बेटा इस गरीबी में अपना बाकी के दिन कैसे काटेगा?? या अपनी पत्नी गुलाबो को लेकर चिंतित था।
उसकी आँखों में झाकना मुश्किल था... और मुश्किल था उसके आंसुओं को समझना। पता नहीं इस आखिरी समय में वह क्या कह देना और सुन लेना चाहता था। मगर अफ़सोस! वह इस काबिल नहीं था। जिन्दगी भी कैसी है। जब अजित नंदू से कुछ कहता था तो उसे वह सुनता नहीं था आज जब वह सुनना चाह रहा है तो अजित कुछ कह नहीं सकता। कुछ ही देर में कम्बल में एक बार फिर हरकत हुई ...और अजित सदा के लिए अपने भरेपूरे परिवार को अलबिदा कह गया।
nandu is better then writer.
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

पानी की जगह बीयर.. और बोदका

दूनिया में पानी संकट ने मुझे भी कुछ लिखने के लिए मजबूर कर दिया। बीसीसीआई ने महाराष्ट्र सरकार से पूछा है कि सौ करोड़ रुपये चाहिए या पानी? यही प्रश्न अगर एक प्यासे से पूछा जाए तो शायद वह पानी को प्राथमिकता देगा। अगर सिर्फ पैसा मिले पानी न मिले तो वह मर जाएगा। पानी पीने के बाद वह जिंदा तो रहेगा।
रविवार को मैं मिर्जापुर की यात्रा पर था। मेरे साथ काशी के मित्र मनोज सिंह चंचल और धमेंद्र जी भी थे। गर्मी बहुत थी। इस कारण मनोज ने कहा कि अजय जी आप अपनी बाइक मेरे यहां ही रख दीजिए। हम लोग कार से चलते हैं। सुबह के दस बज रहे थे। तेज धूप के साथ ही गाड़ी भी हाइबे पर फर्राटे भर रही थी। हम लोग अंदर थे फिर भी इतनी गर्मी। बीच रास्ते में प्यास लगी। हाइबे के इधर-उधर ताक झांक करने के बाद भी कोई दुकान दिखाई नहीं दी। अगर पहले ही पानी का बोतल रख लिए होते तो शायद इतनी परेशानी नहीं होती। कुछ दूर आगे बढने के बाद धमेंद्र ने गाड़ी रोकी। कहा- प्यास बहुत लगी है अब आगे नहीं बढ़ा जा रहा। गाड़ी को बाइपास के रास्ते हाइबे से नीचे उतारते हैं। जब बाइपास के रास्ते हम लोग आगे बढे़ तो एक दूकान दिखाई दी। मनोज ने वहीं गाड़ी रोक दी। जब बोर्ड पर मेरी नजर गई तो वह बीयर की दुकान थी। 37 डिग्री तापमान में मेरे शरीर के साथ दिमाग भी उबल रहा है। मैंने कहा, यार यह क्या मजाक है। कह रहे थे प्यास लगी है यहां पानी कहां मिलेगा। यह तो बीयर की दुकान है। मनोज मुस्कराने लगा.. यार पाण्डेय जी अब इतना भी नादानी ठीक नहीं। पानी नहीं मिला तो क्या हुआ बीयर तो है। इसी से प्यास बुझा लेते हैं। मुझे लगा ये दोनों तो अजीब आदमी हैं। बीयर से कहीं प्यास बुझती है क्या? मनोज ने अपने पर्स से पांच सौ के नोट निकाले और दुकानदार को देते हुए कहा, तीन बीयर देना। प्यास के मारे मेरे होठ भी सूख रहे थे। ठीक से आवाज भी नहीं निकल पा रही थी। मैंने धीरे से कहा, मुझे नहीं बीयर पीना। अगर पानी का कहीं इंतजाम हो जाए तो करा दो। दुकानदार ने मेरी बातें सुन ली। झट से उसने पानी का बोतल मुझे पकड़ा दिया। एक प्यासे को इससे अधिक चाहिए भी क्या? एक ही बार में पानी की आधी बोतल खत्म। मनोज और धर्मेंद्र ने बीयर पीने के बाद कहा, अब बुझ गई प्यास। मैंने प्रश्न किया क्या बीयर से प्यास भी बुझती है। मनोज का उत्तर था जल संकट को देख तो लग रहा है अब प्यास बूझाने के लिए लोगों को बीयर ही नहीं बोदका का भी सहारा लेना पड़ेगा।
पहले रहीम दास जी लिख गए थे-
रहीमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून
पानी गए न उबरे मोती, मानुष, चून।
अब हन्नी सिंह लिखते हैं-
चार बोतल बोदका, काम मेरा रोज का...
पानी तो हम लोग नहीं बचा पाए। शायद यही कारण है कि नदियां जहरीली हो गई। कई नदियों ने तो दु:खी होकर खुद ही आत्महत्या कर ली तो कई को कल-कारखाने वालों ने मार डाला। पानी के लिए मारपीट, पानी के लिए हत्या, पानी के लिए पलायान... और अब पानी के लिए बीसीसीआई का महराष्ट्र सरकार का व्यंगबाण। अगर अपने दोस्तों के बताए रास्तों पर चलूं तो बीसीसीआई का सलाह उचित भी है। तब के रहीम और आज के हन्नी सिंह। जैसे लोग आज रहीम दास जी को याद करते हैं वैसे ही हन्नी सिंह को याद करेंगे। रहीम दास को लोग भले न अपना सके, पर आज के लोगों ने हन्नी सिंह जल्दी अपना लिया। मेरे जैसे हजारों लोग हैं जो अब भी हन्नी सिंह को नहीं अपना सके। इस पानी के संकट को देखते हुए उन्हें मंगल की ओर पलायन करना पड़ सकता है। सरकार कह रही है कि वैज्ञानिकों ने मंगल पर पानी की खोज कर ली है।
वहां कुछ देर आराम करने के बाद हम लोग आगे बढ़ते गए। लगा जैसे रास्ता ही खत्म नहीं होगा। वैसे भी जिंदगी के सफर में मंजिलें कहां मिलती है। पूरी जिंदगी इम्तिहानों के दौर में गुजर जाती है। कभी-कभी तो समय इतना खराब आता है कि जिसे आपने उड़ना सीखाया हो। वही आपको नसीहते देने लगता हैं। एक जख्म भरता है तो दूसरा जख्म देता है। इस तरह से जीवन का पूरा सफर शिकवा और शिकायतों में गुजर जाता है। मेरा मिर्जापुर यात्रा सिर्फ एक दिन का था। इसी एक दिन में रहीम और हन्नी सिंह दोनों को समझ लिया। रहीम को खुद समझा तो हन्नी सिंह को दोस्तों ने समझाया।
बनारस के लहरतारा से करीब 100 किलोमीटर की यात्रा तय करने के बाद हम लोग मिर्जापुर-रावर्ट्सगंज मार्ग पर विंडमफाल पहुंचे। वहां चारो तरफ पहाड़। पानी का दूर-दूर तक अता-पता नहीं। पहाडि़यों पर हम लोग आगे बढ़ते गये। वहां कुछ मजदूर मिले। वे पत्थरों को तोड़ रहे थे। वहां के कुछ लोगों से पूछने पर पता चला कि यहां बरसात के दिनों में पहाड़ों से जलप्रपात होता है। मिर्जापुर के पहले डीएम पी विंडम ने वहां कई पार्कों का निर्माण कराया था। कई विकास कार्य हुए थे। इसी कारण उस जगह का नाम विंडमफाल के नाम से जाना जाता है। अब वहां चारो तरफ पानी का संकट। इसके कारण वहां के लोग पलायन कर गए। वहां पर खुद की आंखों से जो सच देखा। मैं तो क्या कोई भी टूट जाएगा। बरात में भी लोग जाते हैं तो पानी का इंतजाम खुद करते हैं। बोतलों में पानी भर के ले जाते हैं। पानी के इस संकट के बाद भी जंगलों की कटाई जारी है। पहाड़ों को तोड़े जाने का काम जारी है। पत्थरों पर जब हथौड़ों के चोट पड़ रहे थे तो उसकी आवाज तेज हवारों से टकराकर मेरे कानों तक बार-बार पहुंचती। जैसे लगता यह पहाड़ चीख-चीख कह रहे हों-
शौकसे तोड़ो मुझे, मैं क्यू परवाह करूं।
तुम ही रहते हो इसमें,अपना ही घर उजाड़ोगे।
मिर्जापुर की यात्रा से जब वापस बनारस के लहरतारा अपने आवास पर लौटा तो घर में प्रवेश करते ही देखा बाथरूम में बाल्टी भर जाने के बाद भी टोटी से पानी गिर रहा था। दौड़कर पानी बंद किया। धर्मपत्नी जी से कहा, यह ठीक नहीं। कैरियर की तलाश में जैसे मैं इधर-उधर भटका करता था आज लोग पानी के लिए भटक रहे हैं। उन्होंने कहा कितना पानी चाहिए। लाइये बाल्टी, भर देती हूं। ले जाकर दे दीजिए। अब मैं उन्हें कैसे समझाऊं। फिर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, बगल में पड़ोसी के यहां भी पानी गिर रहा है जाकर बंद करा दीजिये। मेरे पड़ोसी प्राथमिक स्कूल में अध्यापक हैं। रविवार होने के कारण वे घर पर ही थे। मैंने उनका दरवाजा खटखटाया। उन्होंने दरवाजा खोलते ही मेरा स्वागत किया। आइये बैठिये। पड़ोसी होकर भी आप नहीं मिलते। कितने दिनों बाद मुलाकात हुई। मैंने सकुचाते हुए कहा, शायद आपके बाथरूम में पानी गिर रहा है। अगर जरूरत न हो तो उसे बंद कर दीजिए। वे मेरे तरफ नीचे-उपर झांकने लगे। फिर बोले, तो आपको क्या परेशानी हो गई। पानी मेरे यहां गिर रहा है। मैं पानी का पैसा देता हूं। अब इसके बाद मेरे पास कोई जवाब नहीं था। आज पता चला मास्टर साहब की पत्नी मुहल्ले में कहतीं फिर रहीं हैं कि पत्रकार साहब को कोई गंभीर बीमारी हो गई है। पानी मेरे घर में गिर रहा है परेशानी उन्हें हो रही है। मुंबई के हाईकोर्ट के जज की तरह अब पाण्डेय जी भी सठिया गए हैं।
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर

Thursday, 9 June 2016

राधा और गंगा

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गरीबों की जिन्दगी दुखों की एक दीवार है, जिसका पलस्तर वह नाखूनों से खुरचता रहता है। कभी उसके मन में भाव आता कि उसकी तमाम इंटे उखाड़ फेंकेगा....और इस मलवे के ढेर पर वह ख़ुशी की एक नई इमारत खड़ी कर देगा। इसी उधेड़बुन में लगा रहता है। वह इतना सोचता रहता है कि दिमाग के साथ वह खुद भी थक जाता है। उसकी स्थाई थकावट उसके ऊपर हाबी हो जाती है और उसे कुछ करने नहीं देती। उसके ख्यालात बिखर जाते हैं....सपने टूट जाते हैं। बरसात के पतंगों की तरह उसका दिमाग भी उड़ने लगता है। अगर...मगर... करते हुए एक दिन वह खुद को लाचार पाता है लालबिहारी की तरह ... पर एक बात और है कि उसके जैसा भाग्य भी हर गरीबों के कहाँ होते हैं। अब आपका परिचय करवाते हैं राधा, गंगा और इन दोनों बेटियों के बाप लाल बिहारी से।



राधा और गंगा दोनों जुड़वा बहनें थीं। जितना चंचल राधा थी उतना ही नटखट गंगा। गाँव में हैजा क्या आया की जैसे इनकी दूनियाँ ही उजड़ गयी। माँ की मौत के बाद दोनों उदास रहतीं। जैसे किसी घर का देखरेख करने वाला और संझा दिखाने वाला भी कोई न हो तो वह घर खंडहर बन जाता। राधा और गंगा की कहानी भी यैसी ही हो गई थी। आखिर इनका देखभाल कौन करता। इन दोनों का बाप लाल बिहारी 12-12 घंटे ओवर टाइम ड्यूटी करता। घर आने के बाद इतना थक जाता कि खाना खाने के बाद उसे तुरंत नींद आ जाती और वह सो जाता। इन दोनों बहनों के लिए तो दिन और रात दोनों पहाड़। माँ की मौत के बाद पिता का भी प्यार ठीक से नहीं मिलता।

चैत का एक दिन। राधा और गंगा खेलते-खेलते गंगा नदी के किनारे चली गईं। गर्मी के कारण गंगा का पानी भी किनारे से दूर जा चुका था। दोनों बहनें पानी में खेलने लगीं। जैसे लगा वर्षों बाद एक आनंद की अनुभूति हो रही है। मन के कोरे पृष्ठ पर अनयास ही.... जैसे किसी महाकाव्य की रचना माँ गंगा के हाथों रची जा रही हो। गंगा की गोंद में बैठी दोनों बहनों को लगता जैसे माँ की गोंद में बैठी हों। पानी की लहरों में तैरता जब अपना प्रतिबिम्ब देखतीं तो एक कसक...ब्याकुलता और मन में बेचैनी। कसक माँ की मौत का। ब्याकुलता माँ से एक बार मिल लेने का और बेचैनी बादलों की ओट में सूर्य के छिप जाने की।
राधा दौड़ती हुई पानी से बाहर आई। देख गंगा अब शाम हो चली। अब हमें घर चलना चाहिए। बापू भी अब आते ही होंगे। खाना नहीं बना तो क्या खायेंगे। दिन भर कितना काम करते हैं। माँ कितना उनका ख्याल रखती थी... गंगा ने राधा की बातों को बीच में ही काटते हुए.. और हम लोगों का भी।

उधर, लाल बिहारी आज जल्द घर आ गया था। दरवाजे पर बाहर से ताला बंद देख परेशान था। परेशान हो भी क्यों न सुगिया की मौत के बाद मीरा और गंगा ही उसकी जिन्दगी थी। दिनभर हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद जब घर आता और दोनों बेटियों को देख लेता तो उसे काफी सकून मिलता। लेकिन आज व्याकुल था। वह पडोस में भी पता किया पर सभी ने कहा कि राधा और गंगा को नहीं देखा। घर के बाहर चबूतरे नुमा बेदी पर दोनों बेटियों के इन्तजार में बैठा था। कुछ देर बाद राधा और गंगा जब आईं तो उन्हें देख लालबिहारी खुश हुआ, लेकिन दोनों बहनें डरी हुई थी।। उन्हें लग रहा था कि बापू डांटेंगे। जब दोनों नजदीक आईं तो लालबिहारी ने उन्हें गले लगा लिया। पिता का इतना प्यार-दुलार पाकर कौन बेटी नहीं इतराएगी। दोनों पिता की सेवा में लग गई।

तभी बाहर दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। लालबिहारी यैसे चौंक गया जैसे कोई पुलिस वाला छापेमारी करने के लिए आ रहा हो। जब बाहर जाकर देखा तो कोई नहीं था।। उसे लगा कि हवा से दरवाजा खड्का हो। अब वह वापस कमरे में आ गया। रसोई घर में गया तो देखा राधा और गंगा खाना बनानें की तैयारी में लगी थीं। फिर वह उस कमरे में गया जहाँ उसकी पत्नी सुगिया और उसका बेडरूम हुआ करता था। बेड पर बिछा लालरंग की चटख चादर जिस पर सफेद और पीले रंग की फुल और पत्तियाँ। अगर कुछ नहीं थी तो उसकी पत्नी सुगिया। जिस कमरे में दोनों कभी प्रेम की दो बातें करते थे अब उसी घर की दीवारों से नफरत की गंध उठ रही थी। वह अचानक बिस्तर पर लेट गया। लगा जैसे एक मृत शरीर लेटा दिया गया हो। तभी राधा दौड़ी हुई आई। बापू खाना बन गया, चलकर खा लो। एक लम्बी सांस खींचते हुए लाल बिहारी ने कहा, हाँ चलो आ रहा हूँ।

काठ के पीढ़े पर बैठा लालबिहारी अभी रोटी का एक कौरा ही तोड़ा था कि किसी ने एक बार फिर दरवाजे पर दस्तक दी। वह फिर डर गया। सुगिया जब बीमार थी तो अस्पाताल में भर्ती कराने के लिए गाँव के अनंत ठाकुर से उसने कर्ज लिया था। कर्ज भरने के लिए ही वह 12-12 घंटे डयूटी करता। हर महीने जो उसे जो पगार मिलती उसमे सूद भी ठीक से नहीं भर सकता। दरवाजा जब भी खड़कता उसे लगता अपना उधार लेने के लिए गाँव का ठाकुर आया है। उसने बाहर जाकर देखा तो इस बार भी कोई नहीं था। अब वह और परेशान हो गया। आखिर कौन बार-बार दरवाजे पर दस्तक दे रहा है।

लालबिहारी जब खाना खा रहा था तो उसकी दोनों बेटियां टुकुर टुकुर उसे देख रहीं थी। वह समझ गया कि कुछ कहना चाह रहीं हैं।
लालबिहारी का इशारा पाते ही राधा और गंगा एक स्वर में बोलीं, बापू , माँ की मौत के बाद हम लोगों ने स्कूल जाना छोड़ दिया था।.अब फिर से पढ़ाई जारी रखना चाहते हैं। दोनों ने ऐसे ठंठे और बेजान स्वर में बोला कि लालबिहारी आहत हो गया। उसे लगा कि उसकी बेटियां अपने बाप से नहीं बल्कि किसी और से निवेदन कर रहीं हैं।
"तुम दोनों से मैंने कब कहा कि स्कूल मत जाओ। पढ़ाई तो जारी रखनी चाहिए। ठीक है कल से ही स्कुल जाओ।
दोनों सोच में डूब गईं। कितना अच्छा लगता था जब माँ दोनों को स्कूल तक छोड़ने के लिए जाती थी। स्कूल का छुट्टी होने से पहले ही हम दोनों को लेने के लिए पहुँच जाती थी। अब स्कूल तक हमें कौन छोड़ने जाएगा। छुट्टी होने के बाद कौन लाने जाएगा। माँ तो है नहीं। बापू भी ड्यूटी में रहेंगे। तभी लालबाबू ने एक और रोटी मांगी। राधा और गंगा दोनों चुप कोने में बैठी थी।। एक बार फिर जोर से चिल्लाया, तुम दोनों आजकल कहाँ खोयी रहती हो। कब से रोटी मांग रहा हूँ। गंगा ने रोटी लाकर दी।

दूसरे दिन: राधा और गंगा स्कूल जा रही थी। रास्ते में मिली सहेलियों ने व्यंग कसा। अब तो तुम दोनों अकेली स्कूल जाओगी। अब कहाँ गया तुम दोनों की माँ का प्यार? तुम दोनों तो कहती थी कि माँ बहुत प्यार करती है। अगर प्यार करती तो क्यों मरती?
सहेलियों के व्यंग से आहत हो राधा और गंगा ने आँखों में छलछलाते आंसुओ को बमुश्किल पलकों पर रोक लिया।

सहेलियों के व्यंग की परवाह न करते हुए। दोनों रोज स्कूल जातीं। घर पर भी खूब पढ़ाई करतीं। जब रिजल्ट आया तो राधा और गंगा ने आठवीं में टॉप किया। बेटियों का रिजल्ट देख लालबिहारी भी खुश हुआ।
इसी तरह दोनों ने कब हाईस्कूल, इंटर और बीए कर लिया पता ही नहीं चला।। हर बार टॉप किया। दोनों बेटियों को एक साथ जवान होते देख लाल बिहारी परेशान था। कहा जाता है जब बेटियां जवान हो जाय तो बोझ बन जातीं हैं... और बोझ तो बोझ होता है। कोई कितना भी समर्थवान व्यक्ति हो ज्यादा दिन नहीं ढो सकता। लालबिहारी भी चाहता था कि यह बोझ जल्द से जल्द सिर से उतार दे। कोई अच्छा लड़का देखकर शादी कर दे। उधर ठाकुर के कर्ज से भी परेशान था। मूल तो दूर सूद भी ठीक से नहीं भर पाता था।

आखिर वह दिन आ ही गया। लालबिहारी के साथ में फैक्ट्री में काम करने वाले लोचन शर्मा के दोनों लड़कों के साथ बेटियों की शादी तय कर दी। शादी तो तय हो गई पर दहेज के पैसे कहाँ से आयेंगे। आखिर उसने पुस्तैनी जमीन बेचने की सोची। जब इस बात की जानकारी ठाकुर अनंत सिंह को हुई तो वह दौड़े हुए लालबिहारी के घर आये। उन्होंने लालबिहारी को हिदायत देते हुए कहा, तुम्हारी जमीन तो मैं ही खरीदूंगा। दाम भी मैं ही लगाउंगा। मेरा कर्ज तुम्हारे उपर है। दूसरे को जमीन दी तो बेटियों को विदा नहीं कर पाओगे। ठाकुर के जाने के बाद लाल बिहारी परेशान था।
वह जानता था की ठाकुर अनंत को जमीन बेचने का मतलब कौड़ियो के भाव दे देना। आखिर करता भी क्या? उसे वही करना पड़ा जो ठाकुर चाहता था। तीन लाख की जमीन मात्र एक लाख में बेचनी पड़ी। मगर इतना तो उसे सिर्फ दहेज़ देना था। बाकी के खर्च वह कहाँ से लाएगा।
अब इस चिंता में लाल बिहारी एकदम उदार हो गया था। कर्ज ने उसे और उदार बना दिया था। ड्यूटी से घर आने के बाद अब वह मुहल्ले में भी किसी से बात नहीं करता। बिस्तर पर लेटे-लेते उदास और पस्त।

लाल बिहारी दहेज के एक लाख रुपया में से 50 हजार तो दे आया। लड़के वाले को इस शर्त पर राजी कर लिया कि बाकी के 50 हजार रूपये शादी के दिन दे देगा। बचे हुए 50 हजार रूपये में से वह शादी की तैयारी में लग गया। उसे इस बात कि चिंता सताए जा रही थी कि आखिर वह वादे के मुताबिक़ 50 हजार रुपया लड़के वाले को कहाँ से देगा। कई लोगों से कर्ज भी मांगी, पर सभी ने देने से इनकार कर दिया। शायद लोगों को पता था कि अगर दे भी दिया तो कहाँ से भरेगा। वह दिन भर मेहनत जरुर करता पर वेतन कम होने से परेशान रहता...और अब तो लालबिहारी की चिंता को देख राधा और गंगा भी परेशान रहने लगीं। उन्हें लगता कि उनकी वजह से ही बापू परेशान हैं।। उन दोनों की शादी के लिए दहेज़ ने परेशान कर रखा है।

तभी दरवाजे पर एक बार फिर किसी ने दस्तक दी।। अब लाल बिहारी के साथ दोनों बेटियां भी परेशान हो गईं। इतनी रात को कौन आया होगा। डरते हुए उसने दरवाजा खोला। सामने एक लम्बी खुबसुरत महिला को देख और घबड़ा गया। आखिर यह कौन है? क्या काम है? महिला ने जैसे कहा मैं ठाकुर अनंत सिंह की पत्नी हूँ... अब लाल बिहारी को मानों काटो तो खून नहीं।

लाल बिहारी अभी कुछ कहता कि इससे पहले ही ठकुराइन घर में प्रवेश कर गईं। राधा और गंगा को गले लगा लिया... जैसे दोनों खुद की बेटी हों। राधा और गंगा भी ठाकुरान से गले मिल अघा गईं... जैसे धरती और आकाश का मिलन हो। लालबिहारी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर यह हो क्या रहा है। वह बस टुकुर-टुकुर देखे जा रहा था।
लाल बिहारी तुम इस तरह क्या देख रहे हो।। आखिर यह दोनों मेरी भी बेटियां हैं। राधा और गंगा की माँ सुगिया और हम साथ पढ़े थे। सुगिया की शादी तुम्हारे साथ हो गई और मेरी ठाकुर के साथ। शादी के बाद मैं सुगिया से भले न मिली...पर उसकी मौत का सबसे बड़ा सदमा मुझे ही लगा था। उसकी मौत के बाद बेटियों से मिलने के लिए एक बार इससे पहले और भी मैं आई थी। दरवाजा खडका के चली जाती थी। हिम्मत करके आती पर ठाकुर के डर से वापस हो जाती।।

मैं माँ भले नहीं बन सकी पर एक औरत होने के नाते माँ की ममता तो है। अगर दहेज़ के लिए इन दो बेटियों की शादी रुक गई तो मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाउंगी।
जैसे लगा ठकुराइन ही इन दोनों बेटियों की माँ है। कितनी भोली और असाधारण अभिव्यक्ति थी...एक औरत के भीतर गंगा की लहरों की भांति उठ रहे ममत्व की। वर्षों बाद ठकुराइन को एहसास हुआ था एक औरत होने का।
इधर लालबिहारी आंगन के एक कोने में खड़े होकर नियति नदी के तट का खेल देख रहा था। जैसे भाग्य के पौरुष का अकथ संघर्ष की गौरव गाथा सुन रहा हो...देख रहा हो...और ह्रदय तल से महसूस कर रहा हो।
ठकुराइन के हाथों में एक पोटली थी। दोनों बेटियों के हाथ में रखते हुए कहा,मैं तुम दोनों की माँ नहीं हूँ तो क्या हुआ? माँ जैसी तो हूँ। एक माँ होने के नाते बेटियों को एक छोटा सा उपहार दे रही हूँ। यह कहते हुए ठकुराइन की आँखे भर आई। अपनी माँ न सही पर एक माँ का प्यार पाकर राधा और गंगा गदगद थी। उन्हें लगा जैसे सूर्य रश्मियों ने निर्मल जल की सतह पर असंख्य सितारे उतार दिए हों। जीवन के प्रति अदम्य आशा और विश्वास के प्रतिबिंब।
अब ठकुराइन अपने घर जा चुकी थी। लालबिहारी ने बेटियों को दिए उपहार को कांपते हाथों से खोला तो उसकी आँखे चौंधिया गईं...और राधा व गंगा भी एक टक देखती रह गई। सभी खामोश थे। कुछ देर के लिए सन्नाटा फ़ैल गया। उस पोटली में एक लाख रूपये नगदी और राधा और गंगा के लिए जेवर थे। उसे लगा इतने पैसों में तो वह बचा हुआ दहेज़ के पैसा भी दे देगा और ठाकुर का कर्ज भी भर देगा।

लालबिहारी के आँगन से राधा और गंगा विदा हो रहीं थीं। बेटियों के विदा होने का दर्द उसे था तो उसके दिल के आगन में खुशियाँ भी बरस रही थी। कहा जाता है कि गरीब बाप के घर से बेटियां विदा होतीं हैं तो कर्ज छोड़ जातीं हैं। लालबिहारी के साथ उल्टा था। उसकी पुस्तैनी जमीन भले बिक गई हो पर ठाकुर का कर्ज भरकर खुद को खुशनसीब समझ रहा था।

अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर