मैं अभी ज़िंदा हूँ
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लेखक और साहित्यकार
सरगना होता है
पुरस्कार वापसी का
बेइमान बन जाता है
झूठी आलोचना कर
कुख्यात हो जाता है
सत्य से मुंह मोड़कर
दलाल भी बन जाता है
सत्ता से चिपककर।
एक अपराधी के सभी गुण।
सही लेखक तो वह होता है
जो पसीने से अच्छर को
गढ़ता और बनाता है।
हथोड़े से शब्दों को
एक नया आकार देता है।
हर वाक्य होते हैं
खेतों की पगदंडी और मेढ़।
लेखक तो मजदूर होता है।
किसान होता है।
उसे सरकारें पुरस्कार नहीं देंती
सिर्फ परोपकार करतीं हैं।
फिर भी मर जाता है भूख से
मैं अभी ज़िंदा हूँ।
कुछ चोट खाने के लिए
कुछ चोट देने के लिए।।
सरगना होता है
पुरस्कार वापसी का
बेइमान बन जाता है
झूठी आलोचना कर
कुख्यात हो जाता है
सत्य से मुंह मोड़कर
दलाल भी बन जाता है
सत्ता से चिपककर।
एक अपराधी के सभी गुण।
सही लेखक तो वह होता है
जो पसीने से अच्छर को
गढ़ता और बनाता है।
हथोड़े से शब्दों को
एक नया आकार देता है।
हर वाक्य होते हैं
खेतों की पगदंडी और मेढ़।
लेखक तो मजदूर होता है।
किसान होता है।
उसे सरकारें पुरस्कार नहीं देंती
सिर्फ परोपकार करतीं हैं।
फिर भी मर जाता है भूख से
मैं अभी ज़िंदा हूँ।
कुछ चोट खाने के लिए
कुछ चोट देने के लिए।।
अजय पाण्डेय
सुहवल, गाजीपुर
सुहवल, गाजीपुर
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